अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में आई सुस्ती और कच्चे तेल की कीमतों पर बने दबाव के चलते भारतीय रुपये को कुछ राहत मिली है। पिछले सत्रों में रिकॉर्ड निचले स्तरों के करीब संघर्ष करने के बाद घरेलू मुद्रा में सुधार देखा गया। यह बदलाव ऐसे समय आया है जब अमेरिकी बॉन्ड यील्ड दो दशक के उच्चतम स्तर 5.36% को छूने में नाकाम रहने के बाद फिसलने लगी है। वित्तीय बाजारों के बुनियादी नियमों के तहत जब अमेरिकी प्रतिभूतियों पर मिलने वाला प्रतिफल घटता है, तो वैश्विक पूंजी का रुझान उभरते बाजारों और भारतीय रुपये जैसी जोखिम वाली संपत्तियों की ओर सकारात्मक होने लगता है।
अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में गिरावट और भू-राजनीतिक परिदृश्य
दस वर्षीय अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड 0.23% टूटकर 5.22% के करीब आ गई। इस नरमी के पीछे का तात्कालिक कारण अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का बयान रहा, जिसमें उन्होंने मध्यावधि चुनावों से पहले ईरान के खिलाफ सैन्य आक्रामकता की चिंताओं को खारिज किया। उनके इस कूटनीतिक रुख से कच्चे तेल की कीमतों में दर्ज की जा रही तेजी थम गई, जिससे ट्रेजरी यील्ड पर भी दबाव बना। जब तक वैश्विक बॉन्ड बाजार में दोबारा तेजी का रुख जोर नहीं पकड़ता, तब तक उभरते बाजारों की मुद्राओं के लिए यह माहौल सहारा देने वाला साबित हो सकता है।
हालांकि बॉन्ड बाजार के दीर्घकालिक परिदृश्य को लेकर वित्तीय विश्लेषकों का नजरिया सतर्क बना हुआ है। डैनस्के बैंक के विश्लेषकों ने इस सप्ताह जारी एक विश्लेषण नोट में स्पष्ट किया है कि अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में जारी दीर्घकालिक तेजी केवल सरकारी ट्रेजरी की आपूर्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें हाइपरस्केलर्स द्वारा बड़े पैमाने पर बॉन्ड जारी करने का भी बड़ा हाथ है। डैनस्के बैंक ने आगाह किया कि निवेशक लंबी अवधि के कागजात पर अधिक प्रीमियम की मांग कर रहे हैं, जिससे 10-वर्षीय और 30-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड के 6% तक पहुंचने का जोखिम बना हुआ है। इसका सीधा मतलब यह है कि आगामी निर्गमों को खपाने के लिए टर्म प्रीमियम में और वृद्धि की आवश्यकता पड़ सकती है।
घरेलू मोर्चे पर महंगाई की चुनौती और केंद्रीय बैंक की भूमिका
विदेशी कारकों से राहत के बीच घरेलू स्तर पर आर्थिक आंकड़े रुपये की स्थिरता के लिए एक नई परीक्षा पेश कर रहे हैं। बाजार सहभागियों का ध्यान अब भारत के आगामी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आंकड़ों पर केंद्रित हो गया है। सोसिएते जेनेराल के अनुमानों के मुताबिक सितंबर 2026 में भारत का मुद्रास्फीति परिदृश्य तेजी से बिगड़ सकता है। बैंक का अनुमान है कि हेडलाइन खुदरा महंगाई अगस्त के 4.8% से तेजी से उछलकर 5.6% वार्षिक स्तर पर पहुंच सकती है, जिसका मुख्य कारण खाद्य मुद्रास्फीति का 7.5% तक चढ़ना है।
सोसिएते जेनेराल ने आगे बताया कि यह मूल्य वृद्धि केवल मौसमी घटकों तक सीमित नहीं है, बल्कि कोर सीपीआई महंगाई भी 4.5% के स्तर को छूने की संभावना है। कमजोर व्यापक मांग के बावजूद बुनियादी मूल्य दबावों का गहराना नीति निर्धारकों के लिए चिंता का विषय बन सकता है। उच्च मुद्रास्फीति देश के निर्यात को महंगा बनाती है और आयात बिल चुकाने के लिए अधिक रुपये बेचने पड़ते हैं, जिससे घरेलू मुद्रा के अवमूल्यन का दबाव बढ़ता है।
इस बीच भारतीय रिज़र्व बैंक की ओर से बाजार में सक्रिय हस्तक्षेप की संभावना जताई गई है। मुद्रा को ऐतिहासिक निचले स्तरों पर गिरने से बचाने के लिए केंद्रीय बैंक ने डॉलर की बिक्री कर रुपये को आवश्यक तरलता समर्थन प्रदान किया। भारतीय रिज़र्व बैंक व्यापार संतुलन और विदेशी विनिमय दरों को स्थिर बनाए रखने के उद्देश्य से सीधे फॉरेक्स बाजार में दखल देता है और ब्याज दरों के माध्यम से 4% के महंगाई लक्ष्य को नियंत्रित करने का प्रयास करता है।
तकनीकी विश्लेषण: चार्ट्स पर यूएसडी/आईएनआर की चाल
दैनिक चार्ट पर यूएसडी/आईएनआर (USD/INR) 96.55 के स्तर पर कारोबार कर रहा था, जबकि लाइव मार्केट डेटा के अनुसार यह भाव 96.61 पर पहुंच गया है, जो पिछले बंद स्तर 96.76 से 0.15% की हल्की गिरावट दर्शाता है। चार्ट पर 20-दिवसीय एक्सपोनेंशियल मूविंग एवरेज (EMA) 96.04 के आसपास स्थित है। जब तक हाजिर भाव इस अल्पकालिक ट्रेंड गेज के ऊपर बना रहता है, तब तक डॉलर के पक्ष में बुनियादी मांग बनी रहने के संकेत मिलते हैं।
तकनीकी संकेतकों में रिलेटिव स्ट्रेंथ इंडेक्स (RSI) 61 के स्तर पर स्थित है, जो सकारात्मक क्षेत्र में तो है लेकिन अभी ओवरबॉट जोन से दूर है। यह स्थिति दर्शाती है कि तेजी का रुझान बना हुआ है लेकिन यह अत्यधिक चरम पर नहीं पहुंचा है। यदि दैनिक आधार पर भाव 20-दिवसीय ईएमए से नीचे बंद होता है, तो यह तेजी के दबाव के कमजोर होने का संकेत देगा और सुधारात्मक गिरावट को गहरा कर सकता है। वहीं ऊपरी स्तरों पर 52-सप्ताह का उच्चतम स्तर 97.05 और 97.00 का दायरा एक मजबूत बाधा बना हुआ है। लाइव स्तरों के मुताबिक मुख्य पिवट 96.63 पर है, जिसमें पहला सपोर्ट 96.48 व दूसरा 96.35 पर है, जबकि रेजिस्टेंस 96.76 और 96.91 पर देखा जा रहा है।
भारतीय रुपये को संचालित करने वाले व्यापक आर्थिक घटक
भारतीय रुपया विदेशी कारकों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील मुद्राओं में गिना जाता है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों के लिए आयात पर भारी निर्भर रहता है और अधिकांश अंतरराष्ट्रीय व्यापार डॉलर में ही संपन्न होता है। जब कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आती है या अमेरिकी डॉलर में नरमी दिखती है, तो रुपये पर आयात बिल का दबाव कम हो जाता है। इसके विपरीत वैश्विक स्तर पर जब डॉलर मजबूत होता है या ब्याज दरें ऊंची बनी रहती हैं, तो पूंजी की निकासी से घरेलू मुद्रा कमजोर होने लगती है।
रुपये के मूल्य निर्धारण में आर्थिक वृद्धि दर (जीडीपी), व्यापार संतुलन और प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई व एफआईआई) की निर्णायक भूमिका होती है। उच्च जीडीपी वृद्धि दर अधिक विदेशी पूंजी को आकर्षित करती है, जिससे रुपये की मांग बढ़ती है। वहीं बेहतर व्यापार संतुलन रुपये को शक्ति प्रदान करता है। कैरी ट्रेड के तहत जब भारत में वास्तविक ब्याज दरें अनुकूल रहती हैं, तो अंतरराष्ट्रीय निवेशक कम ब्याज वाले देशों से उधार लेकर भारतीय संपत्तियों में निवेश करते हैं, जिसका सीधा फायदा घरेलू मुद्रा को मिलता है।
वैश्विक मुद्रा और कमोडिटी बाजारों की स्थिति
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में गिरावट का असर अन्य प्रमुख मुद्राओं और परिसंपत्तियों पर भी देखा गया। एशियाई कारोबारी सत्र में ऑस्ट्रेलियाई डॉलर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 0.7000 के स्तर की ओर बढ़ने की कोशिश में रहा। ट्रेजरी यील्ड में नरमी ने डॉलर को 18 महीने के उच्चतम स्तर से नीचे बनाए रखा, जिससे ऑस्ट्रेलियाई डॉलर को बल मिला। इसके अलावा रिज़र्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया से जुड़ी सख्त मौद्रिक नीति की उम्मीदों ने भी इस मुद्रा को मजबूती दी।
दूसरी तरफ जापानी येन के मुकाबले अमेरिकी डॉलर 158.00 के करीब बना रहा। जापान में घरेलू खर्च के आंकड़ों में लगातार नौवें महीने गिरावट दर्ज की गई, जिससे येन पर दबाव बना रहा। हालांकि अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में आई गिरावट ने फेडरल रिजर्व की सख्त नीति और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बीच डॉलर की बढ़त को सीमित करने का काम किया। कमोडिटी बाजार में सोना दो महीने के निचले स्तर से उबरते हुए $4,200 प्रति औंस की ओर अग्रसर हुआ। डॉलर इंडेक्स, कच्चे तेल की कीमतों और ट्रेजरी यील्ड में एक साथ आई नरमी ने सोने की मांग को सहारा दिया, हालांकि दैनिक चार्ट पर सोने का आरएसआई अब भी कुछ सतर्कता का संकेत दे रहा है।






















