गोदावरी के किनारे बसे प्रसिद्ध भद्राचलम श्री सीता रामचंद्र स्वामी मंदिर की प्रतिष्ठा पूरे भारत में विख्यात है, पर इस पावन धाम की नींव रखने वाले महान साधक का पैतृक गांव आज भी श्रद्धालुओं के दिलों में विशेष स्थान रखता है। तेलंगाना के खम्मम जिले में मौजूद नेलकोंडपल्ली वही ऐतिहासिक बस्ती है, जहां सत्रहवीं सदी के विख्यात वाग्गेयकार और संगीत शिरोमणि कंचर्ला गोपन्ना का प्राकट्य हुआ था। आध्यात्मिक और संगीत जगत में उन्हें सभी भक्त रामदास के आदरणीय नाम से पहचानते हैं। इस पैतृक स्थल की व्यवस्था से जुड़े लोगों के अनुसार, गोलकोंडा रियासत के तत्कालीन कुतुब शाही सुल्तान अबुल हसन तानिशा के दौर में कंचर्ला गोपन्ना को पालवंचा परगने का तहसीलदार पद सौंपा गया था।
प्रभु सेवा के लिए सहा 12 वर्षों का कड़ा कारावास
प्रशासनिक जिम्मेदारी संभालते समय उन्होंने भद्राचलम की धरती पर भगवान राम के भव्य देवालय की स्थापना करवाई और विग्रहों को अलंकृत करने के लिए नक्काशीदार आभूषण तैयार करवाए। इस पुनीत कार्य में शाही राजकोष की धनराशि उपयोग में लाने का आरोप लगाकर उन्हें बंदी बना लिया गया। नतीजतन, गोलकोंडा दुर्ग की अंधेरी कोठरियों में उन्हें पूरे 12 साल तक बेहद कठोर कैद की यातनाएं झेलनी पड़ीं। उस असहनीय शारीरिक और मानसिक पीड़ा के बीच भी उनकी आस्था तनिक भी नहीं डिगी। कारागार की चहारदीवारी में उन्होंने अनगिनत हृदयस्पर्शी भजनों का सृजन किया, जिन्हें कर्नाटक संगीत के समृद्ध संसार में रामदास कीर्तनालु के शीर्षक से अमर माना जाता है।
श्री भक्त रामदास ध्यान मंदिरम् की अनूठी छटा
उनके इस पैतृक गांव में मौजूद जन्मस्थान को बेहद मनोहर और शांत स्मारक के रूप में संवारा गया है, जिसे वर्तमान में श्री भक्त रामदास ध्यान मंदिरम् के नाम से जाना जाता है। इस पूरे पवित्र क्षेत्र के संरक्षण और संचालन का जिम्मा भद्राचलम मंदिर देवस्थानम संभाल रहा है। स्मारक के मुख्य द्वार से भीतर कदम रखते ही हाथों में तानपूरा थामे संत की एक भव्य मूर्ति भक्तों का स्वागत करती है, जो प्रभु के प्रति उनकी अनन्य निष्ठा और संगीत साधना को दर्शाती है।
पारिवारिक कुआं और वार्षिक आयोजनों की परंपरा
इस स्मारक परिसर में मौजूद एक पुरातन कुआं लोगों के कौतूहल का मुख्य केंद्र है, जिसके बारे में मान्यता है कि यह संत के पारिवारिक समय से जुड़ा हुआ जल स्रोत है। इस ऐतिहासिक धरोहर को मूल स्वरूप में सुरक्षित रखा गया है। परिसर के भीतर साधना के इच्छुक लोगों के लिए एक शांत ध्यान कक्ष और सभाओं के आयोजन हेतु एक बड़ा सभागार भी तैयार किया गया है। हर साल रामदास जयंती और श्रीरामनवमी के पावन अवसर पर यहां भावपूर्ण संकीर्तन और शास्त्रीय गायन के भव्य उत्सव आयोजित होते हैं। नेलकोंडपल्ली का यह कोना आज भी दक्षिण भारत की भक्ति धारा और सांस्कृतिक विरासत को सजीव बनाए हुए है।



















