अंतरराष्ट्रीय मुद्रा विनिमय बाजार में अमेरिकी डॉलर की चाल पर इस समय दोतरफा दबाव साफ दिखाई दे रहा है। एक तरफ जहां अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस में दोनों दलों के बीच संभावित बंटवारे और राजनीतिक खींचतान के चलते नीतिगत फैसलों की रफ्तार धीमी पड़ने के आसार हैं, वहीं दूसरी तरफ केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व के आगामी ब्याज दर फैसले और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने मुद्रास्फीति की चिंताओं को हवा दे दी है। इस पूरे परिदृश्य के बीच वित्तीय संस्थान टीडी सिक्योरिटीज की रणनीतिकार जयति भारद्वाज का मानना है कि एक विभाजित कांग्रेस व्यापक आर्थिक बुनियादी कारकों को ही मुद्रा बाजार का प्रमुख संचालक बनाए रखेगी, जिसके चलते साल के अंत तक डॉलर में हल्का मंदी का रुख बना रह सकता है।
अमेरिकी कांग्रेस में राजनीतिक परिदृश्य और डॉलर पर उसके प्रभाव
अमेरिकी संसद के दोनों सदनों में राजनीतिक नियंत्रण किस दल के पास रहता है, यह बात आने वाले महीनों में अमेरिकी डॉलर के लिए दिशा तय करने में बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। राजनीतिक गतिरोध की स्थिति में सरकार के लिए किसी बड़े नए राजकोषीय प्रोत्साहन पैकेज को मंजूरी दिलाना बेहद मुश्किल हो जाता है। इस तरह के विधायी ठहराव से अमेरिका और बाकी दुनिया के बीच आर्थिक वृद्धि दर तथा ब्याज दरों का अंतर कम होने की संभावना बनती है। हालांकि, संस्थागत संतुलन और राजकोषीय अनुशासन की वजह से डॉलर में बहुत भारी गिरावट का जोखिम सीमित रह सकता है।
चुनावी परिदृश्यों के विश्लेषण के अनुसार, यदि संसद में डेमोक्रेटिक पार्टी का पूर्ण बहुमत यानी क्लीन स्वीप देखने को मिलता है, तो शुरुआती दौर में इसे डॉलर के लिए सकारात्मक माना जा सकता है। वित्तीय बाजार ऐसे परिणाम को फेडरल रिजर्व की स्वतंत्रता और मजबूत संवैधानिक संतुलन के रूप में देख सकते हैं, जिससे अमेरिकी संपत्तियों में मौजूद राजनीतिक जोखिम प्रीमियम में कमी आ सकती है। इसके विपरीत, यदि रिपब्लिकन पार्टी का नियंत्रण बरकरार रहता है, तो उसे डॉलर के लिए सबसे अधिक मंदी वाला परिदृश्य आंका गया है। ऐसी स्थिति में अतिरिक्त कर रियायतों, उच्च रक्षा खर्च और ओबीबीबीए के प्रावधानों को स्थायी बनाने की संभावनाओं से अमेरिका के वित्तीय घाटे और राजकोषीय स्थिरता पर गंभीर सवाल खड़े हो सकते हैं।
बॉन्ड यील्ड में तेजी और ऑस्ट्रेलियाई डॉलर पर दबाव
मुद्रा बाजार के दैनिक कारोबार पर नजर डालें तो बुधवार के एशियाई कारोबारी सत्र में ऑस्ट्रेलियाई डॉलर यानी AUD/USD की जोड़ी लगातार तीसरे कारोबारी दिन गिरावट के दायरे में रही। ऑस्ट्रेलियाई डॉलर ने 0.7100 के मनोवैज्ञानिक स्तर की रक्षा तो की, लेकिन यह अपने एक महीने के निचले स्तर के बेहद करीब कारोबार करता नजर आया। अमेरिकी डॉलर अपने दो हफ्ते के उच्चतम स्तर के करीब मजबूती से टिका रहा, क्योंकि फेडरल रिजर्व की ओर से नीतिगत दर में बढ़ोतरी की आशंका और तेल की कीमतों से उपजी महंगाई ने अमेरिकी बॉन्ड यील्ड को कई वर्षों के उच्च स्तर पर पहुंचा दिया है।
इसके अलावा, पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने भी जोखिम वाली संपत्तियों पर दबाव बनाया है। निवेशक अनिश्चितता के दौर में सुरक्षित पनाहगाह के तौर पर अमेरिकी डॉलर को तरजीह दे रहे हैं, जिससे ऑस्ट्रेलिया जैसी संसाधन आधारित और वैश्विक जोखिम से जुड़ी मुद्राओं को बिकवाली का सामना करना पड़ रहा है।
जापानी येन और बैंक ऑफ जापान की नीतिगत बैठक
एशियाई सत्र में ही USD/JPY जोड़ी ने तेज उछाल दर्ज किया और यह 155.00 के स्तर को पार करते हुए एक हफ्ते के नए शिखर पर पहुंच गई। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने अमेरिकी डॉलर को दुनिया की प्राथमिक आरक्षित मुद्रा के रूप में अतिरिक्त मजबूती प्रदान की है। हालांकि, कारोबारियों की सतर्कता के चलते यह जोड़ी 155.00 के मध्य स्तर से नीचे बनी रही, क्योंकि निवेशक फेडरल रिजर्व के ताजा निर्णय और गुरुवार से शुरू होने वाली बैंक ऑफ जापान की अहम नीतिगत बैठक के नतीजों का इंतजार कर रहे हैं।
जापान की दशकों पुरानी अत्यंत नरम ब्याज दर नीति ने ऐतिहासिक रूप से दुनिया भर में खरबों डॉलर के निवेश को वित्तपोषित करने में मदद की है, जिसने जापानी येन को वैश्विक स्तर पर सबसे सस्ते वित्तपोषण स्रोतों में से एक बना दिया था। अब जब बैंक ऑफ जापान द्वारा अपनी मौद्रिक नीति को और कड़ा करने की उम्मीद जताई जा रही है, तो दशकों पुरानी यह विशिष्ट स्थिति एक नए दौर में प्रवेश कर रही है। जब दुनिया की लगभग सभी प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं ब्याज दरों में आक्रामक बढ़ोतरी कर रही थीं, तब भी जापान वैश्विक अपवाद बना हुआ था।
सोने की कीमतों में ठहराव और आर्थिक आंकड़े
यूरोपीय कारोबारी सत्र के पहले हिस्से में सोने की कीमतों में मामूली इंट्राडे बढ़त देखी गई, लेकिन इसमें लगातार खरीदारी का अभाव रहा और यह 4,350 डॉलर प्रति औंस के नीचे ही सीमित रहा। डॉलर इंडेक्स में दो हफ्ते के उच्च स्तर से मुनाफावसूली की वजह से आई मामूली नरमी ने सोने को निचली सतह पर सहारा जरूर दिया, लेकिन व्यापारी केंद्रीय बैंकों के बड़े फैसलों से पहले किसी भी दिशा में बड़े सौदे करने से बचते दिखे।
इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में फेडरल रिजर्व का निर्णय है। इस बैठक से पहले आए अमेरिकी अगस्त रोजगार आंकड़ों ने श्रम बाजार की मजबूती को रेखांकित किया था, जिसने ब्याज दर बाजारों में नीति को सख्त रखे जाने की उम्मीदों को फिर से जगा दिया था। हालांकि, विश्लेषकों का मानना है कि रोजगार आंकड़ों के मुकाबले हाल ही में जारी हुए अमेरिकी अगस्त उपभोक्ता मूल्य सूचकांक यानी सीपीआई मुद्रास्फीति के आंकड़ों ने केंद्रीय बैंक की नीतिगत दिशा के लिए अधिक निर्णायक भूमिका निभाई है।



















