अमेरिकी अर्थव्यवस्था में उपभोक्ता मांग ने एक बार फिर गति पकड़ी है, जिससे अगस्त के महीने में खुदरा बिक्री के आंकड़ों में जोरदार सुधार देखने को मिला। बुधवार को जारी सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अगस्त के दौरान देश में कुल खुदरा बिक्री बढ़कर 773.9 अरब डॉलर तक पहुंच गई। मासिक आधार पर यह 1.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाती है, जिसने पिछले महीने दर्ज की गई 0.5 प्रतिशत की गिरावट को पूरी तरह पलट दिया है। बाजार विशेषज्ञ इस अवधि में महज 0.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी का अनुमान लगा रहे थे, जिसके मुकाबले यह प्रदर्शन काफी बेहतर रहा। इसके साथ ही वार्षिक आधार पर तुलना की जाए तो खुदरा बिक्री में 6.0 प्रतिशत की ठोस बढ़त दर्ज की गई है।
अमेरिकी सांख्यिकी ब्यूरो (यूएस सेंसस ब्यूरो) के आधिकारिक आंकड़ों में पूर्व अवधि के आंकड़ों का संशोधन भी शामिल किया गया है। जून 2026 से अगस्त 2026 की तीन महीने की समयावधि के दौरान कुल बिक्री बीते वर्ष की इसी अवधि के मुकाबले 6.0 प्रतिशत (±0.5 प्रतिशत) अधिक रही। इसके अतिरिक्त, जून 2026 से जुलाई 2026 के बीच के मासिक बदलाव को पहले के 0.6 प्रतिशत गिरावट (±0.4 प्रतिशत) से संशोधित करके 0.5 प्रतिशत गिरावट (±0.2 प्रतिशत) निर्धारित किया गया है। इन आंकड़ों के सामने आने के बाद विदेशी मुद्रा बाजार में अमेरिकी डॉलर ने अपनी हालिया तेजी को बरकरार रखते हुए मामूली बढ़त दर्ज की और अमेरिकी डॉलर इंडेक्स (DXY) 99.70 के दायरे में मजबूती से कारोबार करता नजर आया।
सकल घरेलू उत्पाद और मुद्रा मूल्यांकन के अंतर्संबंध
किसी भी देश की आर्थिक प्रगति और गतिविधियों का सबसे प्रमुख पैमाना उसका सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) होता है, जो आमतौर पर तिमाही आधार पर आर्थिक वृद्धि दर को मापता है। आर्थिक आकलन में सबसे प्रासंगिक आंकड़े वे माने जाते हैं जो जीडीपी की तुलना ठीक पिछली तिमाही से करते हैं, जैसे 2023 की दूसरी तिमाही बनाम 2023 की पहली तिमाही, अथवा पिछले वर्ष की समान तिमाही के साथ तुलना, जैसे 2023 की दूसरी तिमाही बनाम 2022 की दूसरी तिमाही। कई बार तिमाही आंकड़ों को वार्षिक दर में बदलकर भी प्रस्तुत किया जाता है, जो यह दर्शाता है कि यदि पूरे वर्ष इसी दर से विकास जारी रहा तो वार्षिक परिणाम क्या होगा। हालांकि यह वार्षिक अनुमानित तरीका कई बार भ्रामक हो सकता है, विशेषकर तब जब किसी तिमाही में अल्पकालिक झटकों के कारण तीव्र उतार-चढ़ाव आया हो, जैसा कि 2020 की पहली तिमाही में वैश्विक महामारी की शुरुआत के वक्त देखा गया था जब वृद्धि दर अचानक गिर गई थी।
सकल घरेलू उत्पाद में होने वाली मजबूत वृद्धि अमूमन संबंधित देश की मुद्रा के लिए सकारात्मक मानी जाती है। जब किसी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था तेजी से फैलती है, तो वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन बड़े पैमाने पर बढ़ता है जिससे निर्यात की संभावनाएं खुलती हैं और विदेशी निवेशकों की पूंजी आकर्षित होती है। इसके विपरीत, जब उत्पादन घटता है और आर्थिक विकास मंद पड़ता है, तो मुद्रा पर नकारात्मक दबाव बनता है। जब लोग और कंपनियां अधिक खर्च करती हैं, तो बढ़ती मांग मुद्रास्फीति को जन्म देती है। ऐसी स्थिति में केंद्रीय बैंक को कीमतों को स्थिर रखने के लिए ब्याज दरों में बढ़ोतरी का सहारा लेना पड़ता है। ऊंची ब्याज दरें वैश्विक निवेशकों को आकर्षित करती हैं, जिससे विदेशी पूंजी का प्रवाह बढ़ता है और स्थानीय मुद्रा की विनिमय दर में मजबूती आती है।
ब्याज दरें और सोने की कीमतों का समीकरण
आर्थिक वृद्धि, मुद्रास्फीति और केंद्रीय बैंक की मौद्रिक नीति का सीधा असर कीमती धातुओं के मूल्य पर पड़ता है। जब आर्थिक पहिया तेजी से घूमता है और उपभोक्ता खर्च में उछाल आता है, तो कीमतों में तेजी को नियंत्रित करने हेतु नीति निर्माताओं के लिए ब्याज दरों में वृद्धि करना आवश्यक हो जाता है। ऊंची ब्याज दरों का माहौल सोने जैसी गैर-उपज वाली संपत्तियों के लिए आमतौर पर मंदी का संकेत माना जाता है। ब्याज दरों के उच्च स्तर पर होने से सोने में पूंजी लगाए रखने की अवसर लागत (अपॉर्चुनिटी कॉस्ट) बढ़ जाती है, क्योंकि निवेशक सुरक्षित बैंक नकद जमा या सरकारी बॉन्ड पर मिलने वाले आकर्षक ब्याज की ओर आकर्षित होते हैं। इस कारण जब सकल घरेलू उत्पाद की दर ऊंची बनी रहती है, तो यह सोने के भाव के लिए प्रतिकूल कारक बन जाती है।
बुधवार के कारोबारी सत्र में यूरोपीय बाजार के पहले हिस्से के दौरान सोने की कीमतों में हल्की बढ़त दर्ज की गई, लेकिन इसमें लगातार खरीदारी का अभाव दिखा और यह 4,350 डॉलर प्रति औंस के स्तर से नीचे ही सीमित रहा। डॉलर में दो सप्ताह के उच्चतम स्तर से मुनाफावसूली के कारण सोने को थोड़ी मदद जरूर मिली, लेकिन कारोबारी प्रमुख केंद्रीय बैंक की घोषणा से पहले कोई बड़ा दांव लगाने से बचते हुए सतर्क रुख अपनाए रहे।
मुद्रा बाजारों में उतार-चढ़ाव और भू-राजनीतिक तनाव
अमेरिकी खुदरा आंकड़ों, बॉन्ड यील्ड और वैश्विक अनिश्चितताओं ने विभिन्न मुद्रा जोड़ों को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित किया है। एशियाई सत्र में ऑस्ट्रेलियाई डॉलर बनाम अमेरिकी डॉलर (AUD/USD) में लगातार तीसरे दिन कमजोरी का रुख देखा गया और यह 0.7100 के स्तर का बचाव करते हुए अपने मासिक निचले स्तर के करीब कारोबार कर रहा था। फेडरल रिजर्व द्वारा संभावित ब्याज दर वृद्धि की उम्मीदों और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से उपजी महंगाई की चिंताओं ने अमेरिकी बॉन्ड यील्ड को कई वर्षों के उच्चतम स्तर पर पहुंचा दिया है। इसके साथ ही मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव ने सुरक्षित निवेश के रूप में अमेरिकी डॉलर की मांग को बल दिया है, जिससे जोखिम वाली मुद्राओं जैसे ऑस्ट्रेलियाई डॉलर पर दबाव बना हुआ है।
दूसरी ओर, अमेरिकी डॉलर बनाम जापानी येन (USD/JPY) जोड़ी एशियाई सत्र में तेजी के साथ 155.00 के स्तर को पार कर एक सप्ताह के नए उच्चतम स्तर पर पहुंच गई। कच्चे तेल से संचालित मुद्रास्फीति और बॉन्ड यील्ड में तेजी ने इस जोड़ी को सहारा दिया। इसके अलावा अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने आरक्षित मुद्रा के रूप में अमेरिकी डॉलर की साख को और सुदृढ़ किया है। हालांकि, यह मुद्रा जोड़ी 155.00 के मध्य क्षेत्र से नीचे बनी रही, क्योंकि निवेशक बुधवार को आने वाले फेडरल रिजर्व के फैसले और गुरुवार से शुरू होने वाली बैंक ऑफ जापान की बैठक को लेकर संकोच में दिखे।
फेडरल रिजर्व और बैंक ऑफ जापान की आगामी नीतियां
वित्तीय बाजारों की पूरी निगाहें इस समय केंद्रीय बैंकों के नीतिगत निर्णयों पर टिकी हैं, जिनमें फेडरल रिजर्व का आगामी फैसला सबसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस बैठक से पहले आए अगस्त के अमेरिकी रोजगार आंकड़ों ने श्रम बाजार में मजबूती दिखाई थी, जिसने ब्याज दरों के बाजार में फेडरल रिजर्व की ओर से सख्त रुख अपनाए जाने की अटकलों को हवा दी थी। हालांकि विश्लेषकों का मानना है कि इसके बाद जारी हुए अगस्त के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) के आंकड़ों ने केंद्रीय बैंक के नजरिए को तय करने में कहीं अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
वहीं दूसरी तरफ जापान की वित्तीय नीति में एक बड़े मोड़ के संकेत मिल रहे हैं। पिछले एक दशक से अधिक समय तक जापान की अत्यधिक कम ब्याज दरों ने दुनिया भर में खरबों डॉलर के वैश्विक निवेश को वित्तपोषित करने में मदद की थी, जिससे जापानी येन वैश्विक स्तर पर फंडिंग का सबसे सस्ता स्रोत बन गया था। जहां अधिकांश प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं महंगाई से लड़ने के लिए अपनी ब्याज दरों में तीव्र वृद्धि कर रही थीं, वहीं जापान ने अपनी ढीली नीति को जारी रखकर एक अलग राह पकड़ी थी। अब जबकि बैंक ऑफ जापान द्वारा इस सप्ताह अपनी मौद्रिक नीति को और कड़ा करने की उम्मीद जताई जा रही है, यह ऐतिहासिक लाभ एक नए और जटिल चरण में प्रवेश कर सकता है।



















