भारतीय पूंजी बाजार नियामक ने क्लोजिंग ऑक्शन सेशन से जुड़े महत्वपूर्ण नियमों में बड़े बदलावों की घोषणा की है। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड द्वारा जारी किए गए ताजा परिपत्र के बाद शुक्रवार, 16 अक्टूबर के कारोबारी सत्र में दोनों प्रमुख स्टॉक एक्सचेंजों के शेयरों में नरमी दर्ज की गई। इस नए नियामक कदम का सीधा असर डेरिवेटिव अनुबंधों के एक्सपायरी दिवस पर तय होने वाले निपटान मूल्य की प्रक्रिया और बड़े संस्थागत ऑर्डर्स के प्रबंधन पर पड़ने जा रहा है। नियामक द्वारा यह सर्कुलर गुरुवार देर शाम सार्वजनिक किया गया था, जिसका असर अगले दिन सुबह से ही बाजार की गतिविधियों में देखने को मिला।
एक्सचेंज शेयरों पर दिखा नियामक बदलाव का असर
सर्कुलर के सार्वजनिक होने के बाद बाजार में सूचीबद्ध और गैर-सूचीबद्ध दोनों प्रमुख एक्सचेंजों के शेयरों में दबाव देखा गया। बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के शेयरों में शुक्रवार के कारोबारी सत्र के दौरान 1.82 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। एक समय बीएसई का शेयर कमजोर होकर 3,370.80 रुपये के स्तर पर कारोबार कर रहा था। वहीं दूसरी तरफ, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के शेयरों में भी 0.50 प्रतिशत की कमी देखी गई और इसका भाव गिरकर 1,765 रुपये प्रति शेयर पर आ गया। सत्र के दौरान एनएसई के शेयर और नीचे फिसलते हुए 1,761 रुपये प्रति शेयर के स्तर तक पहुंच गए थे। निवेशकों और बाजार सहभागियों ने नियमों में हुए इस तकनीकी बदलाव के संभावित वित्तीय और परिचालन प्रभावों का आकलन करना शुरू कर दिया है।
डेरिवेटिव एक्सपायरी सेटलमेंट के लिए नई गणना विधि
नियामक द्वारा पेश किए गए इस नए ढांचे में सबसे बड़ा संशोधन एक्सपायरी के दिन इंडेक्स और सिंगल स्टॉक डेरिवेटिव्स के निपटान मूल्य यानी सेटलमेंट प्राइस तय करने की व्यवस्था में किया गया है। नए नियमों के मुताबिक, इंडेक्स डेरिवेटिव्स के लिए सेटलमेंट प्राइस अब उस इंडेक्स में शामिल शेयरों के वॉल्यूम वेटेड एवरेज प्राइस के आधार पर निकाला जाएगा। यह वीडब्ल्यूएपी सतत ट्रेडिंग सत्र यानी कंटीन्यूअस ट्रेडिंग सेशन के आखिरी 30 मिनट के दौरान हुए सौदों से तैयार किया जाएगा। यह व्यवस्था पिछले प्रस्तावित क्लोजिंग ऑक्शन सेशन फ्रेमवर्क से पूरी तरह अलग है, जिसमें एक्सपायरी सेटलमेंट की गणना के लिए क्लोजिंग ऑक्शन की कीमतों का सीधे उपयोग करने का सुझाव दिया गया था।
नियामक ने स्पष्ट किया है कि यह नया तंत्र न केवल इंडेक्स डेरिवेटिव्स पर लागू होगा, बल्कि एक्सपायरी के दिन स्टॉक डेरिवेटिव अनुबंधों के सेटलमेंट के लिए भी समान रूप से प्रभावी रहेगा। इस व्यवस्था को देश के सभी मान्यता प्राप्त स्टॉक एक्सचेंजों पर एक समान रूप से लागू किया जाएगा ताकि किसी भी प्रकार की विसंगति या आर्बिट्राज की गुंजाइश न बचे। जानकारों का मानना है कि कंटीन्यूअस ट्रेडिंग सेशन के अंतिम 30 मिनट के वीडब्ल्यूएपी का उपयोग करने से एक्सपायरी के अंतिम क्षणों में कृत्रिम उतार-चढ़ाव को रोकने में मदद मिलेगी।
दस मिनट का होगा क्लोजिंग ऑक्शन सत्र, तय हुई समय सारिणी
सेबी ने क्लोजिंग ऑक्शन सेशन की पूरी प्रक्रिया को संचालित करने के लिए 10 मिनट की एक विशेष समय सीमा निर्धारित की है। यह समर्पित सत्र दोपहर 3:30 बजे से शुरू होकर 3:40 बजे तक चलेगा। सत्र के सुचारू संचालन को सुनिश्चित करने के लिए नियामक ने इसे अलग-अलग चरणों में विभाजित किया है, जिससे सामान्य ट्रेडिंग से ऑक्शन की ओर सहज बदलाव हो सके और कीमतों का पारदर्शी निर्धारण किया जा सके।
संशोधित समय सारिणी को निम्नलिखित चरणों में बांटा गया है
- दोपहर 3:30 बजे से 3:31 बजे तक: यह एक मिनट का संक्रमण काल यानी ट्रांजिशन पीरियड रहेगा, जिसके दौरान संदर्भ मूल्य अथवा रेफरेंस प्राइस का निर्धारण किया जाएगा।
- दोपहर 3:31 बजे से 3:36 बजे तक: इस पांच मिनट की समयावधि में बाजार सहभागी लिमिट ऑर्डर और मार्केट ऑर्डर दोनों दर्ज करा सकेंगे।
- दोपहर 3:36 बजे से 3:40 बजे तक: इस चरण में बाजार सहभागियों को केवल लिमिट ऑर्डर देने की अनुमति होगी, मार्केट ऑर्डर स्वीकार नहीं किए जाएंगे।
- दोपहर 3:38 बजे से 3:40 बजे तक: इस दो मिनट की अवधि में क्लोजिंग प्राइस यानी अंतिम समापन मूल्य की गणना और निर्धारण की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।
क्लोजिंग ऑक्शन सेशन के लिए जो रेफरेंस प्राइस तय किया जाएगा, उसकी गणना कंटीन्यूअस ट्रेडिंग सेशन के अंतिम 15 मिनट में हुए सौदों के वॉल्यूम वेटेड एवरेज प्राइस के जरिए की जाएगी। यह व्यवस्था कीमतों में स्थिरता बनाए रखने के लिए आधार का काम करेगी।
आइसबर्ग ऑर्डर्स के ट्रांसफर पर भी स्पष्ट हुए नियम
नए दिशानिर्देशों में नियामक ने इस बात को भी पूरी तरह स्पष्ट किया है कि जब सामान्य कंटीन्यूअस ट्रेडिंग सेशन समाप्त होगा, तब अनिष्पादित यानी अनएग्जीक्यूटेड आइसबर्ग ऑर्डर्स का क्या होगा। आइसबर्ग ऑर्डर्स वे बड़े ऑर्डर्स होते हैं जिन्हें सार्वजनिक ऑर्डर बुक में पूरी मात्रा छिपाने के लिए छोटे और क्रमिक लिमिट ऑर्डर्स में बांटकर भेजा जाता है। सेबी के नए नियमों के तहत, यदि किसी निवेशक या संस्थान का आइसबर्ग ऑर्डर कंटीन्यूअस ट्रेडिंग सत्र के अंत तक निष्पादित नहीं हो पाता है, तो उसे रद्द न किए जाने की स्थिति में पूरी तरह प्रदर्शित लिमिट ऑर्डर के रूप में क्लोजिंग ऑक्शन सेशन में आगे स्थानांतरित कर दिया जाएगा।
प्राथमिकता के क्रम को लेकर भी सर्कुलर में सख्त नियम तय किए गए हैं। इन आगे ले जाए गए आइसबर्ग ऑर्डर्स को कंटीन्यूअस ट्रेडिंग सत्र के दौरान डाले गए सामान्य लिमिट ऑर्डर्स की तुलना में कम समय वरीयता मिलेगी। हालांकि, क्लोजिंग ऑक्शन सत्र के दौरान नए सिरे से डाले जाने वाले ऑर्डर्स की तुलना में इन पुराने ऑर्डर्स को पहले वरीयता दी जाएगी। इससे ऑर्डर बुक की निष्पक्षता और तरलता का संतुलन बना रहेगा।
लागू होने की समय सीमा
नियामक द्वारा अधिसूचित अधिकांश नए नियम इसी वर्ष 7 दिसंबर से प्रभावी हो जाएंगे। सभी स्टॉक एक्सचेंजों को अपने तकनीकी और परिचालन प्रणालियों को इस समय सीमा से पहले तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं। हालांकि, कंटीन्यूअस ट्रेडिंग सेशन से अनिष्पादित आइसबर्ग ऑर्डर्स को क्लोजिंग ऑक्शन सेशन में स्थानांतरित करने से जुड़े जटिल प्रावधानों के लिए बाजार सहभागियों को लंबा समय दिया गया है। आइसबर्ग ऑर्डर्स के ट्रांजिशन से जुड़े ये विशिष्ट नियम 8 फरवरी 2027 से प्रभाव में आएंगे।

















