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1858 के संग्राम में हमशक्ल झलकारी बाई ने कैसे रानी लक्ष्मीबाई का रूप लेकर ब्रिटिश सेना को उलझायाउत्तर प्रदेश
26 सित॰ 2026, 10:27 am (33 दिन पहले)· 1

1858 के संग्राम में हमशक्ल झलकारी बाई ने कैसे रानी लक्ष्मीबाई का रूप लेकर ब्रिटिश सेना को उलझाया

साल 1858 में झांसी पर अंग्रेजों के हमले के दौरान, रानी लक्ष्मीबाई की हमशक्ल और विश्वासपात्र झलकारी बाई ने रानी का वेश धारण कर ब्रिटिश सेना को गुमराह किया था, जिससे असली रानी को किले से सुरक्षित बाहर निकलने का मौका मिला।

झांसी के संघर्ष और 1858 की ऐतिहासिक लड़ाई का जब भी जिक्र होता है, तो रानी लक्ष्मीबाई की वीरता की तस्वीर तुरंत आंखों के सामने आ जाती है। लेकिन इस गौरवशाली इतिहास में एक और महिला का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है, जिनका नाम झलकारी बाई है। झलकारी बाई को रानी लक्ष्मीबाई की सबसे भरोसेमंद सेविका, सहेली और सहयोगी माना जाता है। जब रानी लक्ष्मीबाई विवाह के बाद झांसी आईं, तब झलकारी बाई भी उनके संपर्क में आईं और अपनी निष्ठा के बल पर धीरे-धीरे रानी का अटूट विश्वास हासिल कर लिया। झांसी के स्वतंत्रता संग्राम में उनकी भूमिका केवल एक सहयोगी तक सीमित नहीं थी, बल्कि उन्होंने युद्ध के मैदान में भी अपनी बहादुरी का परिचय दिया।

दुर्गा दल और सैन्य तैयारियों में झलकारी बाई की भूमिका

झलकारी बाई का जुड़ाव झांसी की सेना से बहुत गहरा था। उनके पति, पूरन कोरी, झांसी की सेना में एक सैनिक के रूप में कार्यरत थे। झलकारी बाई को खुद भी बचपन से ही हथियार चलाने और युद्ध कला का बेहतरीन अभ्यास था। उनकी इसी वीरता और युद्ध कौशल को देखते हुए उन्हें रानी लक्ष्मीबाई द्वारा गठित की गई महिलाओं की विशेष सैन्य टुकड़ी, 'दुर्गा दल' में शामिल किया गया था। इस दल में रहकर उन्होंने सैन्य रणनीतियों और युद्ध की तैयारियों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और महिला सैनिकों को प्रेरित किया।

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साल 1858 में जब अंग्रेजी सेना ने झांसी के किले पर चौतरफा हमला बोल दिया, तो स्थिति बेहद नाजुक हो गई थी। किले के बाहर ब्रिटिश फौज का दबाव लगातार बढ़ रहा था और रानी लक्ष्मीबाई के सामने अपनी प्रजा और बची हुई सेना को सुरक्षित रखने की एक बड़ी चुनौती थी। इसी भीषण संकट के समय झलकारी बाई की वह योजना काम आई जो आज भी झांसी के लोकजीवन में बड़े आदर के साथ सुनाई जाती है। झलकारी बाई की शक्ल और चेहरे की बनावट काफी हद तक रानी लक्ष्मीबाई से मिलती-जुलती थी। इस समानता का फायदा उठाते हुए झलकारी बाई ने रानी लक्ष्मीबाई जैसा वेश धारण कर लिया और खुद को झांसी की रानी के रूप में अंग्रेजों के सामने पेश कर दिया। इस साहसिक कदम से ब्रिटिश सेना का पूरा ध्यान झलकारी बाई पर केंद्रित हो गया। इसी बीच, असली रानी लक्ष्मीबाई को सुरक्षित रूप से किले से बाहर निकलने का सही समय और रास्ता मिल गया।

इतिहास और लोककथाओं के नजरिए से झलकारी बाई का मूल्यांकन

झलकारी बाई के इस अप्रतिम योगदान को समझने के लिए ऐतिहासिक दस्तावेजों और लोक परंपराओं दोनों का गहराई से अध्ययन करना जरूरी है। इतिहासकार तरुण कुमार का कहना है कि झलकारी बाई की भूमिका को समझने के लिए लिखित इतिहास और पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही लोककथाओं को अलग-अलग करके देखना चाहिए। उनके अनुसार, झलकारी बाई निश्चित रूप से रानी लक्ष्मीबाई की सहयोगी थीं और 1858 के ऐतिहासिक संघर्ष में उनकी सक्रिय भागीदारी रही थी। लेकिन रानी का रूप धरकर अंग्रेजों को चकमा देने वाली इस घटना के कई प्रसंग ऐतिहासिक दस्तावेजों से ज्यादा यहां की समृद्ध लोक परंपराओं में मिलते हैं। इसलिए इस पूरी घटना को पक्के ऐतिहासिक प्रमाणों के साथ-साथ लोक आस्था के रूप में भी समझा जाना चाहिए। इसके बावजूद, झांसी के इस महान संघर्ष में झलकारी बाई का नाम साहस, निष्ठा और नारी शक्ति के प्रतीक के रूप में हमेशा अमर रहेगा।

सवाल-जवाब

झलकारी बाई कौन थीं?
झलकारी बाई रानी लक्ष्मीबाई की एक अत्यंत भरोसेमंद सहयोगी, सेविका और महिला सैनिक थीं, जिन्होंने 1858 में झांसी की जंग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
झलकारी बाई के पति की झांसी में क्या भूमिका थी?
उनके पति पूरन कोरी झांसी की सेना में एक सैनिक के रूप में कार्यरत थे।
झलकारी बाई ने 1858 में रानी लक्ष्मीबाई की मदद कैसे की थी?
रानी लक्ष्मीबाई से अपनी शक्ल मिलने का फायदा उठाकर, उन्होंने रानी का वेश धारण किया और ब्रिटिश सेना को गुमराह किया, जिससे असली रानी को किले से सुरक्षित बाहर निकलने का मौका मिल गया।
'दुर्गा दल' क्या था?
'दुर्गा दल' झांसी की सेना की महिला टुकड़ी थी, जिसमें झलकारी बाई शामिल थीं और उन्हें वहां हथियार चलाने तथा युद्ध की तैयारी का अभ्यास कराया गया था।
इतिहासकार झलकारी बाई के वेश बदलने की कहानी को किस तरह देखते हैं?
इतिहासकार तरुण कुमार के अनुसार, 1858 के संघर्ष में उनकी सक्रिय भूमिका सच है, लेकिन रानी का रूप धरकर अंग्रेजों को चकमा देने का विवरण लिखित इतिहास की तुलना में स्थानीय लोककथाओं और मौखिक परंपराओं में अधिक मिलता है।
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टिप्पणियाँ 5

Carlos Mendoza@carlos-mendoza·32 दिन पहले

पूरन कोरी जैसे गुमनाम सैनिकों और झलकारी बाई के पतियों का जिक्र इतिहास में कम ही मिलता है, पर असली ताकत तो ऐसे ही लोगों से बनती है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·32 दिन पहले

झलकारी बाई जैसी वीरांगनाओं के बारे में स्कूल की किताबों में और पढ़ाया जाना चाहिए। उनकी बहादुरी और बलिदान को जिस तरह लोककथाओं ने जिंदा रखा, वह सचमुच कमाल है।

Ravikash Gupta@ravikash·32 दिन पहले

अर्जुन, बिल्कुल सही कहा आपने। उनके पति पूरन कोरी भी सेना में थे, यह बात कई लोगों को पता ही नहीं होती।

Rohan Verma@rohan-verma·32 दिन पहले

झांसी की इस लड़ाई में झलकारी बाई के अलावा क्या और भी ऐसी महिलाएं थीं जिन्होंने अंग्रेजों को इस तरह छकाया था?

Karan Malhotra@karan-malhotra·32 दिन पहले

रोहन, पूरन कोरी का नाम पढ़कर अच्छा लगा; अक्सर पतियों का जिक्र छूट जाता है।

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