भारत में पोलैंड के राजदूत पियोत्र एंटोनी स्विटाल्स्की ने आतंकवाद के विरुद्ध भारत की सख्त कार्रवाइयों की सराहना की है। इसके साथ ही उन्होंने वर्ष 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के समय भारत के प्रति पोलैंड के मजबूत समर्थन को भी याद किया। उस दौरान पूर्वी पाकिस्तान में उत्पन्न हुए मानवीय और सैन्य संकट में वारसॉ ने न केवल भारत के कूटनीतिक रुख का समर्थन किया था, बल्कि भारतीय सशस्त्र बलों को महत्वपूर्ण सैन्य उपकरण भी उपलब्ध कराए थे। दोनों देशों के बीच बने इस सहयोग ने दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक परिदृश्य को बदलने में एक विशेष भूमिका निभाई थी।
1971 का मुक्ति संग्राम और मानवीय संकट
बांग्लादेश का स्वतंत्रता संग्राम 25 मार्च 1971 को तब शुरू हुआ, जब पाकिस्तानी सशस्त्र बलों ने पूर्वी पाकिस्तान की नागरिक आबादी पर व्यापक दमनकारी सैन्य कार्रवाई की। इस भारी हिंसा के कारण इस क्षेत्र में एक गंभीर मानवीय संकट उत्पन्न हो गया, जिसके फलस्वरूप लगभग 1 करोड़ अर्थात् 10 मिलियन शरणार्थियों ने सीमा पार करके भारत में शरण ली। शरणार्थियों के इस अभूतपूर्व आगमन ने भारत पर भारी आर्थिक और सामाजिक दबाव डाला। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए भारत दिसंबर 1971 में प्रत्यक्ष रूप से युद्ध में शामिल हुआ और स्थानीय मुक्ति वाहिनी के लड़ाकों के साथ मिलकर संयुक्त अभियान चलाए। आखिरकार 16 दिसंबर 1971 को ढाका में पाकिस्तानी सेना के बिना शर्त आत्मसमर्पण के साथ बांग्लादेश एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में आया। इस दौरान पोलैंड ने इस संघर्ष को केवल भारत और पाकिस्तान के बीच के सैन्य टकराव के रूप में देखने के बजाय पूर्वी पाकिस्तान के नागरिकों की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं को पूरा करने वाले राजनीतिक समाधान पर जोर दिया।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पोलैंड का कूटनीतिक रुख
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पोलैंड का सबसे निर्णायक कूटनीतिक कदम दिसंबर 1971 के दौरान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में देखा गया। पोलैंड ने सुरक्षा परिषद में एक महत्वपूर्ण मसौदा प्रस्ताव पेश किया, जिसमें पूर्वी पाकिस्तान के चुने हुए जनप्रतिनिधियों को तुरंत सत्ता सौंपने की वकालत की गई थी। इस प्रस्ताव में तत्काल युद्धविराम लागू करने तथा उस क्षेत्र से सभी पाकिस्तानी सैन्य बलों की वापसी की मांग भी शामिल थी। पोलैंड का यह कदम बेहद मायने रखता था क्योंकि इसने वर्ष 1970 में आयोजित पाकिस्तान के आम चुनावों के जनादेश को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया था, जिसमें शेख मुजीबुर रहमान के नेतृत्व वाली अवामी लीग ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया था। यद्यपि पोलैंड का यह प्रस्ताव सुरक्षा परिषद से पारित नहीं हो पाया, लेकिन इसने चुनाव परिणामों की वैधता और पाकिस्तानी सेना की वापसी की आवश्यकता को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित कर दिया।
युद्ध के मैदान में पोलिश सैन्य हथियारों की भूमिका
इस संघर्ष में पोलैंड के रक्षा सहयोग की एक बेहद व्यावहारिक और प्रभावी भूमिका भी रही। युद्ध के मैदान में भारतीय सेना ने पोलैंड में निर्मित सैन्य उपकरणों और बख्तरबंद वाहनों का व्यापक प्रयोग किया। राजदूत पियोत्र एंटोनी स्विटाल्स्की के अनुसार, "भारतीय सेना ने बांग्लादेश को आज़ाद कराने के लिए पोलिश टैंकों का इस्तेमाल किया था।" भारतीय सेना ने पूर्वी पाकिस्तान के चुनौतीपूर्ण इलाकों में अपने अभियानों के दौरान मुख्य रूप से PT-76 एम्फीबियस टैंकों का प्रयोग किया था। यह बख्तरबंद वाहन जल और थल दोनों स्थानों पर चलने में पूरी तरह सक्षम थे, जो पूर्वी पाकिस्तान की अनगिनत नदियों, नालों और दलदली क्षेत्रों को पार करने के लिए सबसे उपयुक्त साबित हुए। भारत और पोलैंड के बीच सैन्य उपकरण आपूर्ति का यह रिश्ता युद्ध शुरू होने से पहले ही स्थापित हो चुका था, जिसके कारण 1971 का युद्ध शुरू होने तक पोलिश उपकरण भारतीय रक्षा तैयारियों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके थे।
बांग्लादेश को कूटनीतिक मान्यता और शीत युद्ध का संदर्भ
पाकिस्तानी सशस्त्र बलों द्वारा ढाका में आत्मसमर्पण करने के एक महीने से भी कम समय के भीतर, 12 जनवरी 1972 को पोलैंड ने आधिकारिक रूप से बांग्लादेश को एक स्वतंत्र संप्रभु राष्ट्र के रूप में मान्यता दे दी। इस त्वरित निर्णय के साथ पोलैंड नए गठित देश को मान्यता देने वाले शुरुआती अंतरराष्ट्रीय देशों में शामिल हो गया, जिससे वारसॉ और ढाका के बीच औपचारिक राजनयिक संबंधों का मार्ग प्रशस्त हुआ। यह मान्यता पोलैंड के उस बुनियादी दृष्टिकोण के अनुरूप थी, जो पूर्वी पाकिस्तान के निर्वाचित प्रतिनिधियों को लोकतांत्रिक अधिकार देने और राजनीतिक समाधान निकालने की वकालत करता रहा था। इसके अलावा, 1971 में पोलैंड का यह रुख तत्कालीन वैश्विक शीत युद्ध की परिस्थितियों से भी गहराई से प्रभावित था। सोवियत संघ के नेतृत्व वाले पूर्वी गुट के एक अहम सदस्य के रूप में वारसॉ के मॉस्को के साथ बेहद घनिष्ठ संबंध थे। उसी समय भारत ने भी 1971 की भारत-सोवियत शांति, मित्रता और सहयोग संधि के माध्यम से सोवियत संघ के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को मजबूत किया था। इसके परिणामस्वरूप भारत के लिए पोलैंड का यह रुख उस व्यापक अंतरराष्ट्रीय राजनयिक और रक्षा नेटवर्क का हिस्सा बना जिसने एक अत्यंत संवेदनशील दौर में भारत का समर्थन किया।























