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AI फ़िल्टर से अलग: देहरादून के फोटोग्राफर्स ने बताया 80 के दशक की लाल रोशनी और केमिकल्स का असली जादूउत्तराखंड
14 सित॰ 2026, 4:19 pm (8 दिन पहले)· 0

AI फ़िल्टर से अलग: देहरादून के फोटोग्राफर्स ने बताया 80 के दशक की लाल रोशनी और केमिकल्स का असली जादू

सोशल मीडिया पर 80 के दशक के एआई फ़िल्टर ट्रेंड के बीच जानिए कि उस दौर में डार्क रूम, तीखे केमिकल्स और मैन्युअल कलाकारी के दम पर कैसे एक फोटो तैयार होती थी।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस वाले फोटो जनरेटर इन दिनों सोशल मीडिया पर 80 के दशक जैसी पुरानी तस्वीरों का ट्रेंड चला रहे हैं। लोग एक क्लिक में विंटेज लुक पाकर खुश हो रहे हैं, लेकिन देहरादून के अनुभवी फोटोग्राफर याद करते हैं कि उस दौर में एक फोटो तैयार करना किसी तपस्या से कम नहीं था। स्मार्टफोन और तुरंत फोटो देखने की सुविधा से दशकों पहले फोटोग्राफी का असली जादू पूरी तरह बंद और घुप अंधेरे डार्क रूम में मद्धम लाल रोशनी के बीच हुआ करता था।

डार्क रूम का माहौल और तीखे केमिकल्स की गंध

80 के दशक में फोटो तैयार करने के लिए फोटोग्राफर को एक खास तरह के माहौल में काम करना पड़ता था। फोटोग्राफिक पेपर और रील को खराब होने से बचाने के लिए कमरे में सिर्फ एक लाल बल्ब की मद्धम रोशनी रखी जाती थी। इस बंद कमरे में डेवलपर, स्टॉप बाथ और फिक्सर जैसे केमिकल्स की तीखी गंध भरी रहती थी। जब केमिकल्स के लिक्विड ट्रे में डूबे फोटोग्राफिक पेपर पर धीरे-धीरे तस्वीर उभरकर सामने आती थी, तो वह पल किसी चमत्कार जैसा लगता था, हालांकि इसके लिए बहुत ज्यादा सब्र की जरूरत होती थी।

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घंटों तक घुप अंधेरे और केमिकल्स के बीच काम करने से फोटोग्राफरों की आंखों पर गहरा असर पड़ता था। जब वे डार्क रूम से बाहर तेज धूप में निकलते थे, तो सूरज की रोशनी आंखों में बहुत तेज चुभती थी। अपनी आंखों को नुकसान से बचाने के लिए फोटोग्राफरों को काम खत्म करने के बाद तीन से चार घंटे तक काला चश्मा पहनकर रहना पड़ता था। समय के साथ दिन में भी काला चश्मा पहनने की यह मजबूरी ही फोटोग्राफरों की पहचान और उनका सिग्नेचर स्टाइल बन गई।

मैन्युअल रोल प्रोसेसिंग और कैमरों का दौर

आज के डिजिटल दौर की तरह उस समय ऑटोमैटिक सेटिंग्स नहीं होती थीं। सब कुछ मैन्युअल तरीके से ही करना पड़ता था। उस दौर में ऊपर से देखकर फोटो खींचने वाले क्लिक 3 जैसे कैमरे और 120 नंबर वाले ब्लैक एंड व्हाइट रोल बहुत लोकप्रिय थे। बाद में 135 एमएम के कैमरों का चलन बढ़ा। फोटोग्राफर के साथ उसका एक मददगार हेल्पर भी होता था, जो केमिकल्स के घोल बनाने और फोटो डेवलपमेंट के काम में मदद करता था।

फिल्म रोल को डेवलप करते समय पूरी सावधानी बरती जाती थी। अगर डार्क रूम में बाहर की जरा सी भी रोशनी प्रवेश कर जाती, तो पूरा का पूरा फिल्म रोल तुरंत खराब हो जाता था। इससे घंटों की मेहनत और असाइनमेंट बेकार हो जाते थे। नेगेटिव सही तरीके से तैयार होने के बाद ही उसकी टचिंग और फिनिशिंग का हाथ से किया जाने वाला बारीक काम शुरू होता था।

हाथ से टचिंग और इंलार्जर से प्रिंटिंग का काम

डिजिटल स्मूथिंग या एडिटिंग सॉफ्टवेयर न होने के कारण फोटो की फिनिशिंग नेगेटिव पर ही हाथ से की जाती थी। फोटोग्राफर एक खास लाल रंग का केमिकल नेगेटिव पर बारीक ब्रश से लगाते थे। इस लाल केमिकल से तस्वीरों में चेहरे की बनावट सॉफ्ट हो जाती थी और कमियां छिप जाती थीं। टचिंग और फिनिशिंग पूरी होने के बाद नेगेटिव रोल को सूखने के लिए टांग दिया जाता था।

अंतिम चरण में सूखे हुए नेगेटिव से फोटो प्रिंट करने के लिए डार्क रूम में इंलार्जर नामक मशीन का इस्तेमाल किया जाता था। इंलार्जर में लगे पीले रंग के बल्ब की रोशनी से नेगेटिव की इमेज नीचे रखे फोटोग्राफिक पेपर पर छपती थी। एक्सपोजर टाइम को सही तरीके से नियंत्रित करके ही सही कंट्रास्ट और ब्राइटनेस हासिल की जाती थी। इस पूरी बहुस्तरीय मैन्युअल प्रक्रिया से एक बेहतरीन फोटो बनाने में घंटों का समय लगता था, जो आज के इंस्टेंट डिजिटल फोटो से बिल्कुल अलग अनुभव था।

सवाल-जवाब

80 के दशक में फोटो तैयार करने के लिए डार्क रूम में लाल रोशनी क्यों इस्तेमाल होती थी?
फोटोग्राफिक पेपर और बिना डेवलप हुआ फिल्म रोल सामान्य सफ़ेद रोशनी में खराब हो जाता था, इसलिए केवल लाल रंग की मद्धम रोशनी ही सुरक्षित मानी जाती थी।
फोटोग्राफरों को काम करने के बाद काला चश्मा क्यों पहनना पड़ता था?
घंटों घुप अंधेरे और केमिकल्स के बीच रहने के बाद बाहर तेज रोशनी से आंखों को होने वाले तनाव से बचाने के लिए फोटोग्राफर 3 से 4 घंटे काला चश्मा पहनते थे।
80 के दशक में किस प्रकार के कैमरे और रोल का उपयोग होता था?
उस समय ऊपर से देखकर क्लिक करने वाले क्लिक 3 कैमरे और 120 ब्लैक एंड व्हाइट रोल का प्रयोग अधिक होता था, जिसके बाद 135 एमएम फॉर्मेट आया।
डार्क रूम में फोटो डेवलप करने के लिए कौन से केमिकल्स उपयोग किए जाते थे?
फोटो को प्रोसेस करने के लिए डेवलपर, स्टॉप बाथ और फिक्सर जैसे केमिकल्स का इस्तेमाल किया जाता था।
डिजिटल सॉफ्टवेयर के बिना उस दौर में फोटो की टचिंग कैसे की जाती थी?
फोटोग्राफर सूखे हुए नेगेटिव पर लाल रंग का केमिकल हाथ से लगाकर त्वचा की बनावट को सॉफ्ट और बेदाग बनाते थे।
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