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आकृति चौधरी एनएसए मामले में सुप्रीम कोर्ट की राहत, क्या सिर्फ नोएडा डीएम मेधा रूपम जिम्मेदार?उत्तर प्रदेश
23 सित॰ 2026, 4:23 pm (35 दिन पहले)· 0

आकृति चौधरी एनएसए मामले में सुप्रीम कोर्ट की राहत, क्या सिर्फ नोएडा डीएम मेधा रूपम जिम्मेदार?

सुप्रीम कोर्ट ने छात्र कार्यकर्ता आकृति चौधरी की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत मामले में सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि बहुस्तरीय प्रशासनिक प्रक्रिया के बाद लिए गए फैसले में गौतमबुद्ध नगर की डीएम को अकेले जिम्मेदार ठहराना ठीक नहीं है।

गौतमबुद्ध नगर की डीएम मेधा रूपम को छात्र कार्यकर्ता आकृति चौधरी की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी एनएसए के तहत की गई हिरासत के मामले में शीर्ष अदालत से बड़ी मौखिक राहत मिली है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि यदि किसी प्रशासनिक आदेश को जारी करने से पहले कई अधिकारियों की गहन जांच और सहमति शामिल थी, तो केवल जिले की जिलाधिकारी को ही इसका एकमात्र जिम्मेदार नहीं बनाया जा सकता। न्यायमूर्ति एससी शर्मा और न्यायमूर्ति एनके सिंह की पीठ ने दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।

हाईकोर्ट के आदेश और वेतन कटौती की चुनौती

इस पूरे कानूनी विवाद की शुरुआत इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक आदेश से हुई थी। हाईकोर्ट ने छात्रा आकृति चौधरी को एनएसए के तहत हिरासत में भेजे जाने की कार्रवाई को पूरी तरह अनुचित मानते हुए रद्द कर दिया था। इसके साथ ही अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए आदेश दिया था कि डीएम मेधा रूपम के वेतन से 5 लाख रुपये काटकर पीड़िता आकृति चौधरी को मुआवजे के तौर पर दिए जाएं। व्यक्तिगत वेतन से कटौती और जिम्मेदारी थोपे जाने के इसी निर्देश को डीएम मेधा रूपम ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष याचिका दायर कर चुनौती दी है।

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प्रशासनिक जांच के पांच स्तर और अदालत में दलीलें

शीर्ष अदालत में उत्तर प्रदेश सरकार की पैरवी करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने पीठ को पूरी प्रक्रिया से अवगत कराया। उन्होंने स्पष्ट किया कि हिरासत में लेने का कदम जिलाधिकारी द्वारा अचानक या सीधे अपने स्तर पर नहीं उठाया गया था। पुलिस तंत्र के भीतर पहले थाना प्रभारी यानी एसएचओ, फिर पुलिस उपायुक्त यानी डीसीपी और उसके बाद पुलिस कमिश्नर के स्तर पर पूरी रिपोर्ट तैयार की गई थी। इसके अतिरिक्त, कानून के प्रावधानों के अनुरूप गठित सलाहकार बोर्ड ने भी इस पूरे प्रकरण की समीक्षा की थी।

मेधा रूपम की तरफ से अदालत में पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मजबूती से पक्ष रखते हुए बताया कि डीएम के हस्ताक्षर से पहले यह फाइल पांच स्तरों की औपचारिक प्रक्रिया से गुजरी थी। जिलाधिकारी का मुख्य दायित्व प्राप्त कानूनी दस्तावेजों और रिकॉर्ड के आधार पर निर्णय लेने का था। इन तर्कों पर सहमति जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि जब एक फैसला नीचे से ऊपर तक कई अधिकारियों की श्रृंखला से होकर गुजरा हो, तो अकेले डीएम को अलग कर 5 लाख रुपये के जुर्माने का भागीदार बनाना उचित नहीं होगा।

प्रशासनिक पृष्ठभूमि और मेधा रूपम का सफर

मेधा रूपम गौतमबुद्ध नगर जिले में बतौर पहली महिला जिलाधिकारी के रूप में तैनात हैं। वह वर्ष 2014 बैच की भारतीय प्रशासनिक सेवा यानी आईएएस अधिकारी हैं। मूल रूप से आगरा में जन्मीं मेधा रूपम ने अपनी प्रारंभिक स्कूली शिक्षा केरल से पूरी की और इसके बाद दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंट स्टीफंस कॉलेज से अर्थशास्त्र में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। उन्होंने वर्ष 2014 की संघ लोक सेवा आयोग यानी यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा में ऑल इंडिया रैंक 10 हासिल की थी। मौजूदा जिम्मेदारी संभालने से पूर्व उन्होंने उत्तर प्रदेश के मेरठ, बरेली, हापुड़ और कासगंज जनपदों में विभिन्न प्रशासनिक पदों पर सेवाएं दी हैं।

सवाल-जवाब

सुप्रीम कोर्ट में किस मामले को लेकर सुनवाई चल रही थी?
छात्र कार्यकर्ता आकृति चौधरी को एनएसए के तहत हिरासत में लेने और इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा डीएम मेधा रूपम के वेतन से 5 लाख रुपये काटने के आदेश के खिलाफ सुनवाई चल रही थी।
सुप्रीम कोर्ट ने डीएम मेधा रूपम की भूमिका पर क्या टिप्पणी की?
कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि अगर फैसला कई स्तरों की प्रशासनिक जांच और मंजूरी के बाद लिया गया था, तो सिर्फ डीएम को अलग करके 5 लाख रुपये के जुर्माने के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
डीएम के समक्ष रिपोर्ट किन अधिकारियों के स्तर से होकर पहुंची थी?
अदालत को बताया गया कि यह मामला एसएचओ, डीसीपी, पुलिस कमिश्नर और एनएसए सलाहकार बोर्ड जैसे पांच स्तरों की कानूनी प्रक्रिया से होकर गुजरा था।
मेधा रूपम कौन हैं?
मेधा रूपम 2014 बैच की आईएएस अधिकारी हैं, जिन्होंने यूपीएससी में ऑल इंडिया रैंक 10 हासिल की थी और वह वर्तमान में गौतमबुद्ध नगर की पहली महिला डीएम हैं।
मामले में सुप्रीम कोर्ट का मौजूदा रुख क्या है?
जस्टिस एससी शर्मा और जस्टिस एनके सिंह की पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Rohan Gupta@rohan-gupta·35 दिन पहले

प्रशासनिक फाइलों में डिजिटल साइन करना इतना जोखिम भरा हो सकता है, यह देखकर हैरानी होती है। जब पूरा पुलिस तंत्र और कई अधिकारी फाइल पास कर चुके हों, तो सारा ठीकरा अकेले डीएम पर फोड़ना बिल्कुल गलत है।

Ravikash Gupta@ravikash·35 दिन पहले

अरे भाई, मान लिया कि फ़ाइल कई टेबल से होकर गुजरी, पर आख़िर में दस्तखत तो डीएम साहब के ही थे ना? जब ज़िम्मेदारी की कुर्सी पर बैठे हो, तो आँख बंद करके साइन थोड़ी न कर दोगे।

Arjun Mehta@arjun-mehta·35 दिन पहले

@Ravikash Gupta भाई, पाँच अलग-अलग स्तरों पर जाँच होने के बाद भी क्या डीएम को पूरी फाइल फिर से खंगालनी चाहिए थी?

Rohan Verma@rohan-verma·35 दिन पहले

अधिकारियों की पूरी चेन को दरकिनार करके अकेले डीएम पर जुर्माना ठोकना सही नहीं था, वरना ज़मीन पर काम करना मुश्किल हो जाएगा।

Karan Malhotra@karan-malhotra·35 दिन पहले

रोहन जी, बात सही है कि चेन होती है, पर आखिर में दस्तखत तो डीएम के ही थे ना? जिम्मेदारी पूरी तरह से नकारना भी थोड़ा मुश्किल लगता है।

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