न्यूयॉर्क शहर में आयोजित एक बड़े वैश्विक धर्मगुरु सम्मेलन के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने धार्मिक विविधता और मानवीय एकता पर अपनी बात रखी। इस अंतरराष्ट्रीय आयोजन में विभिन्न परंपराओं के आध्यात्मिक नेता उपस्थित रहे। अपने संबोधन के दौरान मोहन भागवत ने इस बात पर जोर दिया कि भले ही उपासना के तौर-तरीके और अनुष्ठान अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन परम सत्य और संपूर्ण मानवता केवल एक ही है।
भारत की प्राचीन वैचारिक परंपरा
अपने विचार रखते हुए उन्होंने रेखांकित किया कि भारतीय संस्कृति में यह मान्यता सदियों पुरानी है कि रास्ते भले भिन्न हों, पर मनुष्यता हमेशा से एक ही रही है। उन्होंने कहा कि सत्य केवल एक है और मानवता उसी शाश्वत सत्य की एक जीवंत अभिव्यक्ति है। उनके अनुसार, संघ का मुख्य कर्तव्य पूरी दुनिया में जाकर लोगों को यह याद दिलाना है कि बाहरी भिन्नताओं के बाद भी सारा मानव समाज मूल रूप से एक ही सूत्र में बंधा हुआ है।
हिंदुत्व और आपसी सामंजस्य पर रुख
संबोधन के एक अहम हिस्से में उन्होंने हिंदुत्व को लेकर वर्षों पहले उठी एक शंका का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि वर्ष 2018 में कुछ मुस्लिम नागरिकों ने उनसे संघ के हिंदू राष्ट्र के स्वरूप को लेकर सीधा सवाल किया था। इस पर अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि यदि कोई हिंदू यह मानता है कि भारत में मुसलमानों का कोई स्थान नहीं होना चाहिए, तो वह व्यक्ति हिंदुत्व के वास्तविक अर्थ से पूरी तरह अनजान है। उन्होंने समझाया कि भारतीय जीवन-दर्शन के अनुसार सत्य तक पहुँचने के मार्ग अनेक हो सकते हैं, किंतु सबका गंतव्य एक ही होता है।
मानव गरिमा और विविधता का सम्मान
उन्होंने आगे कहा कि इंसानों के बीच किसी भी प्रकार का मौलिक अंतर नहीं होना चाहिए तथा हर नागरिक को पूरे सम्मान और प्रतिष्ठा के साथ जीने का पूरा अधिकार प्राप्त है। उनके मुताबिक, विभिन्नताओं को खुले दिल से स्वीकार करना और फिर भी आपसी सद्भाव बनाए रखना ही हमारी महान परंपरा की असली पहचान है। धर्म और कर्मकांडों के संबंध में चर्चा करते हुए उन्होंने माना कि आध्यात्मिक यात्रा के शुरुआती चरण में अनुशासन और पूजा-पद्धतियाँ सहायक हो सकती हैं, लेकिन धर्म का अंतिम पड़ाव सत्य की प्राप्ति ही है।
ऐतिहासिक चुनौतियाँ और संवाद की अहमियत
इतिहास का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि देश ने अनगिनत बाहरी आक्रमणों और विकट परिस्थितियों का डटकर मुकाबला किया है, फिर भी हमारी सभ्यता ने हमेशा वसुधैव कुटुंबकम का संदेश पूरी दुनिया को दिया है। इसके साथ ही उन्होंने भारत की धरती पर मुस्लिम और ईसाई समुदायों के साथ चलाए जा रहे संवाद कार्यक्रमों का भी उल्लेख किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि संवाद तो केवल एक शुरुआत है, और इसके साथ-साथ सेवा कार्यों को भी पूरी तन्मयता से चलाया जाना चाहिए।
सेवा कार्य और भ्रांतियों का निवारण
मोहन भागवत ने इस बात का दावा किया कि संघ की ओर से चलाए जाने वाले सेवा अभियानों में कभी किसी प्रकार का पक्षपात नहीं किया जाता है। उन्होंने स्वीकार किया कि संगठन के कार्यों को लेकर अक्सर समाज में गलत धारणाएँ और भ्रामक नैरेटिव फैला दिए जाते हैं, लेकिन जब लोग खुद करीब आकर जमीनी हकीकत देखते हैं तो वे भ्रम तुरंत दूर हो जाते हैं। उन्होंने यह भी जोड़ा कि संघ प्रचार-प्रसार से दूर रहकर धरातल पर काम करने में अधिक विश्वास रखता है।
राजनीति की भूमिका और जनमत का प्रभाव
अपने वक्तव्य के अंत में उन्होंने समकालीन राजनीति और जनता की राय के अंतर्संबंधों पर भी विचार रखे। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में राजनेता हमेशा जनभावनाओं से संचालित होते हैं और आम राय के विरुद्ध जाना किसी के लिए भी आसान नहीं होता। यदि वैश्विक स्तर पर संघर्षों को रोकना है और सकारात्मक बदलाव लाने हैं, तो राजनीतिक तंत्र को भी प्रभावित करना होगा, बशर्ते वह प्रभाव सत्ता के बजाय जनहित के लिए हो। उन्होंने चेताया कि आज की राजनीति में स्वार्थ की भावना बढ़ गई है, जिससे उबरकर हम और हमारा की भावना को अपनाना ही एकमात्र समाधान है।





















