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आंगन में 40 पौधों से भरपूर पैदावार, बस्तर के चेतन सिंह ने दिखाया भिंडी उगाने का आसान तरीकाछत्तीसगढ़
19 सित॰ 2026, 11:58 am (6 दिन पहले)· 1

आंगन में 40 पौधों से भरपूर पैदावार, बस्तर के चेतन सिंह ने दिखाया भिंडी उगाने का आसान तरीका

बस्तर के चेतन सिंह ने घर की बाड़ी में महज 40 पौधे लगाकर नियमित ताजी भिंडी की उपज हासिल की है। गोबर खाद और डिब्बी विधि से तैयार यह फसल हर तीसरे दिन दो से तीन किलो तक पैदावार दे रही है।

घर के खाली पड़े आंगन या बाड़ी का सही इस्तेमाल करके ताजी सब्जियां उगाना अब बेहद आसान हो गया है। बस्तर के ग्रामीण परिवेश में रहने वाले चेतन सिंह ने इस दिशा में एक बढ़िया मिसाल पेश की है। उन्होंने अपनी घरेलू बाड़ी में भिंडी की बुवाई की, जिसके बाद उन्हें हर तीसरे से चौथे दिन परिवार के लिए दो से तीन किलो एकदम ताजी भिंडी मिल रही है। बरसात के मौसम में ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक बाड़ी पद्धति से सब्जियां उगाने का चलन काफी पुराना है, लेकिन सुनियोजित तरीके से की गई यह कोशिश घर की जरूरतों को पूरा करने में काफी मददगार साबित हो रही है।

जमीन तैयार करने और बुवाई का आसान तरीका

इस पूरी प्रक्रिया में मिट्टी की प्राथमिक तैयारी सबसे अहम चरण मानी जाती है। चेतन सिंह के अनुसार, भिंडी की रोपाई से पहले जमीन की फावड़े से अच्छी तरह गहरी खुदाई की जाती है ताकि मिट्टी भुरभुरी और हवादार हो सके। इसके बाद मिट्टी में डिब्बी का आकार बनाकर गड्ढे तैयार किए जाते हैं। इन गड्ढों में बीजों की बुवाई के साथ ही देशी गोबर की खाद डाली जाती है। पौधों के सही विकास और पोषण संतुलन को बनाए रखने के लिए बुवाई के कुछ दिनों बाद थोड़ी मात्रा में पोटाश का भी इस्तेमाल किया जाता है, जिससे पौधों को मजबूती मिलती है और पैदावार बढ़ती है।

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फसल का चक्र और नियमित पैदावार

चेतन सिंह ने अपनी बाड़ी में भिंडी के कुल 40 पौधे लगाए हैं। सामान्य तौर पर भिंडी के ये पौधे रोपाई के लगभग डेढ़ महीने बाद फल देना शुरू कर देते हैं। एक बार पैदावार शुरू होने पर यह सिलसिला करीब दो महीने तक लगातार जारी रहता है। वर्तमान में हर तीन दिन के अंतराल पर इन पौधों से दो से तीन किलोग्राम भिंडी की तुड़ाई आराम से हो जाती है। बारिश के मौसम का प्राकृतिक पानी मिलने से पौधों की सिंचाई के लिए अतिरिक्त मेहनत नहीं करनी पड़ती, जिससे देखभाल का समय और खर्च दोनों बच जाते हैं।

देखभाल और कीट प्रबंधन की सावधानियां

बरसात के दिनों में इस फसल में बीमारियां आमतौर पर काफी कम लगती हैं, जिससे इसे संभालना बेहद आसान होता है। हालांकि, कई बार पत्ता छेदक कीड़ों का खतरा बन जाता है, जिसके नियंत्रण के लिए आवश्यकता पड़ने पर कीटनाशक का हल्का छिड़काव करना पड़ता है। जगह की कमी का सामना कर रहे लोग इस तकनीक को केवल जमीन पर ही नहीं, बल्कि बड़े गमलों या छत पर भी सफलतापूर्वक अपना सकते हैं और ताजी हरी सब्जियों का नियमित लाभ उठा सकते हैं।

सवाल-जवाब

चेतन सिंह ने अपनी बाड़ी में भिंडी के कितने पौधे लगाए हैं?
चेतन सिंह ने अपनी बाड़ी में भिंडी के कुल 40 पौधे लगाए हैं।
इन पौधों से कितने दिनों में और कितनी पैदावार मिल रही है?
हर तीन से चार दिन के अंतराल में लगभग दो से तीन किलो ताजी भिंडी की तुड़ाई हो रही है।
भिंडी के पौधे कितने समय में फल देना शुरू करते हैं?
भिंडी के पौधे रोपाई के लगभग डेढ़ महीने बाद फल देना शुरू करते हैं और करीब दो महीने तक फसल देते हैं।
बुवाई के समय कौन सी खाद और विधि का उपयोग किया गया?
फावड़े से जमीन की खुदाई कर डिब्बी बनाई गई और उसमें गोबर की खाद के साथ बीज बोए गए, बाद में पोटाश भी डाला गया।
फसल में किस कीट का खतरा रहता है और बचाव कैसे होता है?
फसल में पत्ता छेदक कीड़े का खतरा हो सकता है, जिससे बचाव के लिए कीटनाशक का छिड़काव किया जा सकता है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Rajesh Kumar@rajesh-kumar·5 दिन पहले

बस्तर के ग्रामीण इलाकों में चेतन सिंह द्वारा अपनाया गया यह मॉडल केवल घरेलू स्तर पर पोषण सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और आजीविका मिशन के लिए भी एक प्रेरक उदाहरण है। यदि ऐसे छोटे और वैज्ञानिक कृषि प्रयासों को सरकारी योजनाओं के माध्यम से व्यापक स्तर पर बढ़ावा दिया जाए, तो यह ग्रामीण परिवारों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक प्रभावी कदम साबित हो सकता है।

Ravikash Gupta@ravikash·5 दिन पहले

बस्तर के चेतन सिंह द्वारा अपनाई गई यह घरेलू कृषि पद्धति सूक्ष्म और मध्यम स्तर पर खाद्य सुरक्षा और आजीविका का एक बेहतरीन मॉडल प्रस्तुत करती है। ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में इस तरह की टिकाऊ और कम लागत वाली बागवानी से परिवारों का मासिक घरेलू बजट सीधे तौर पर सुधरता है। यदि इस प्रकार के स्थानीय किचन गार्डन स्टार्टअप मॉडलों को डिजिटल सामुदायिक मंचों और कृषि-तकनीक से जोड़ दिया जाए, तो यह न केवल पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करेगा, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सूक्ष्म उद्यमिता को भी एक नया आयाम देगा।

Arjun Mehta@arjun-mehta·5 दिन पहले

चेतन सिंह का यह प्रयास खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण नीति के लिहाज से एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। जब घरेलू स्तर पर ऐसी कम लागत वाली और प्राकृतिक पद्धतियों को बढ़ावा मिलता है, तो यह शासन तंत्र पर पोषणीय निर्भरता को कम करता है और स्थानीय स्तर पर आत्मनिर्भरता की मजबूत नींव रखता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·5 दिन पहले

बस्तर के ग्रामीण इलाकों में इस प्रकार के घरेलू बागवानी मॉडल सार्वजनिक स्वास्थ्य और घरेलू अर्थशास्त्र के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण हैं। खाली पड़ी ज़मीन का ऐसा सुनियोजित उपयोग ग्रामीण परिवारों को पोषण सुरक्षा प्रदान करता है और बाजार पर उनकी निर्भरता कम करता है। कानून-व्यवस्था और स्थानीय अपराध की खबरों के बीच ऐसी सकारात्मक और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने वाली पहलें समुदाय के भीतर स्थिरता और आर्थिक सुदृढ़ता का एक मजबूत संदेश देती हैं, जो दीर्घकालिक सामाजिक सुरक्षा के लिए आवश्यक है।

Rohan Verma@rohan-verma·5 दिन पहले

करण मल्होत्रा के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, बस्तर जैसे आकांक्षी और आदिवासी बहुल क्षेत्रों में इस तरह की आत्मनिर्भर पहलें न केवल घरेलू पोषण सुरक्षा मजबूत करती हैं, बल्कि शासन और प्रशासनिक योजनाओं के धरातल पर क्रियान्वयन का एक प्रभावी विकल्प भी पेश करती हैं। जब ग्रामीण अपनी उपजाऊ बाड़ियों और पारंपरिक डिब्बी विधि का उपयोग करके स्थानीय स्तर पर खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं, तो इससे राज्य की सार्वजनिक वितरण प्रणालियों पर से अनावश्यक दबाव कम होता है। इस प्रकार की सामुदायिक और पारिवारिक स्तर की कृषि पद्धतियां क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को गति देने के साथ-साथ सुशासन के उस एजेंडे को भी मजबूती देती हैं, जिसमें基层 स्तर पर स्वावलंबन और सतत विकास को प्राथमिकता दी जाती है।

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