सैन्य मर्यादा और अनुशासन के कड़े मानकों के बीच भारतीय सेना के एक सेवारत अधिकारी पर लगे गंभीर आरोपों ने प्रशासनिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। 11 आर्मर्ड रेजिमेंट से ताल्लुक रखने वाले और वर्तमान में 23 ग्रेनेडियर्स से संबद्ध एक मेजर के खिलाफ अन्य साथी सैन्य अफसरों की पत्नियों से अनैतिक संबंध रखने, मादक पदार्थों का सेवन करने और अपने कर्तव्यों के प्रति गंभीर लापरवाही बरतने के आरोपों की जांच चल रही है। इन मामलों की संवेदनशीलता और सैन्य गरिमा को देखते हुए थल सेनाध्यक्ष की ओर से अधिकारी को सीधे सेवा समाप्ति का कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। सेना का स्पष्ट रुख है कि इस तरह के संवेदनशील प्रकरण में सामान्य कोर्ट मार्शल चलाने के बजाय सीधे प्रशासनिक प्रक्रिया के जरिए निष्कासन का कदम उठाना अधिक उपयुक्त है। इस कार्रवाई के खिलाफ राहत पाने के लिए अधिकारी ने आर्म्स फोर्सेस ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन ट्रिब्यूनल ने अंतरिम रोक लगाने की मांग खारिज कर दी और उन्हें तय नोटिस का औपचारिक उत्तर देने का निर्देश सुनाया है।
साथी अधिकारियों के परिवारों से जुड़े आरोपों की शुरुआत
इस पूरे मामले की जड़ें अगस्त 2023 में दर्ज हुई एक आधिकारिक शिकायत से जुड़ी हैं। उस दौरान मेजर की तत्कालीन पत्नी ने रक्षा मंत्रालय के सेना मुख्यालय स्थित अनुशासन एवं सतर्कता निदेशालय में एक विस्तृत शिकायत सौंपी थी। इस शिकायत में आरोप लगाया गया था कि अधिकारी कुल चार महिलाओं के साथ विवाहेतर संबंधों में लिप्त रहे हैं, जिनमें से दो महिलाएं सेना के ही अन्य सेवारत अधिकारियों की पत्नियां थीं। इसके अतिरिक्त, प्रार्थना पत्र में यह भी आरोप लगाया गया था कि अधिकारी नशीले पदार्थों के आदी हैं और वे सैन्य सेवा से जुड़े अपने अनिवार्य दायित्वों की लगातार अनदेखी कर रहे हैं। हालांकि, ट्रिब्यूनल ने अपने हालिया आदेश में यह स्पष्ट रूप से रेखांकित किया है कि ये बिंदु वर्तमान में केवल आरोप हैं और न्यायिक अथवा प्रशासनिक तौर पर अभी तक इनमें से किसी भी आरोप को दोष सिद्ध या प्रमाणित नहीं माना गया है।
कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी का गठन और आरोपों की रूपरेखा
अगस्त की शिकायत पर संज्ञान लेते हुए सेना के उच्चाधिकारियों ने प्राथमिक जांच की रूपरेखा तैयार की। इसके तहत अक्टूबर 2023 में 55वीं मैकेनाइज्ड ब्रिगेड मुख्यालय ने पूरे घटनाक्रम की आधिकारिक पड़ताल के लिए औपचारिक कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी गठित की। जांच का मुख्य दायरा यह तय करना था कि क्या अधिकारी ने साथी अफसरों की पत्नियों के साथ अनुचित संबंध रखकर एक सैन्य अधिकारी के लिए निर्धारित नैतिक आचरण का उल्लंघन किया है। प्राथमिक जांच पूरी होने के बाद आवश्यकतानुसार अतिरिक्त जांच भी कराई गई। लगातार चली इस प्रक्रिया के बाद सेना ने मार्च 2025 में आर्मी एक्ट की धारा 45 और धारा 63 के तहत संभावित आरोप तैयार किए। धारा 45 एक अधिकारी के अशोभनीय आचरण से जुड़ी है, जबकि धारा 63 सैन्य व्यवस्था और अनुशासन के प्रतिकूल किए गए कृत्यों से संबंधित है। इसके पश्चात गवाहों और साक्ष्यों को रिकॉर्ड करने की कानूनी प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया।
जांच प्रक्रिया की निष्पक्षता पर अधिकारी की आपत्तियां
आरोपों का सामना कर रहे मेजर ने सेना द्वारा की गई जांच के तौर-तरीकों को चुनौती दी है। उनका तर्क है कि पूरी प्रक्रिया के दौरान आर्मी रूल 180 के अनिवार्य प्रावधानों की अनदेखी की गई। उनका कहना है कि जिन महिलाओं और उनके फौजी पतियों के नाम इस मामले में घसीटे गए, उन्हें व्यक्तिगत रूप से बुलाकर उनके आधिकारिक बयान कलमबद्ध नहीं किए गए। इसके अलावा, अधिकारी ने अपने व्यक्तिगत मोबाइल फोन, लैपटॉप और पेन ड्राइव जैसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को जब्त किए जाने और अपने आधिकारिक आवास की ली गई तलाशी में भी गंभीर प्रक्रियात्मक अनियमितताओं का आरोप लगाया। उनका दावा है कि निष्पक्ष जांच के नियमों का पालन किए बिना ही उनके खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकाले गए।
आपसी सहमति से तलाक और शिकायत वापसी का दावा
इस कानूनी लड़ाई के बीच पारिवारिक मोर्चे पर भी बड़ा घटनाक्रम हुआ। मेजर और उनकी तत्कालीन पत्नी का 30 मार्च 2026 को आपसी सहमति के आधार पर औपचारिक रूप से विवाह विच्छेद हो गया। यह तलाक जम्मू और कश्मीर के अनंतनाग में न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी की अदालत के वैधानिक आदेश के जरिए संपन्न हुआ। दोनों पक्षों के बीच हुए समझौते के दस्तावेज में पूर्व पत्नी ने अगस्त 2023 में की गई अपनी शिकायत को वापस लेने की बात स्वीकार की। उसने यह स्पष्ट किया कि वह शिकायत वैवाहिक कलह और पारिवारिक तनाव के दौर में बिना किसी पुख्ता आधार के अनजाने में दर्ज करा दी गई थी। इसी आधार को ढाल बनाते हुए मेजर ने ट्रिब्यूनल में दलील दी कि जिस मूल शिकायत पर पूरी जांच टिकी थी, उसके वापस लिए जाने के बाद प्रशासनिक कार्रवाई को तुरंत निरस्त कर दिया जाना चाहिए।
कोर्ट मार्शल के स्थान पर प्रशासनिक निष्कासन की रूपरेखा
थल सेनाध्यक्ष की ओर से 10 अगस्त को जारी किए गए आधिकारिक नोटिस में आर्मी रूल्स 19 और 14 के प्रावधानों का हवाला दिया गया। सेना प्रशासन का मानना है कि इस पूरे मामले में शामिल संवेदनशील परिस्थितियों, साथी अधिकारियों के पारिवारिक सम्मान और सेना के आंतरिक माहौल को ध्यान में रखते हुए सामान्य कोर्ट मार्शल प्रक्रिया चलाना व्यावहारिक नहीं है। इसलिए नियमों के तहत प्रदत्त विशेष प्रशासनिक अधिकारों का उपयोग करते हुए मेजर की सैन्य सेवा समाप्त करने का प्रस्ताव रखा गया। मेजर ने ट्रिब्यूनल से गुहार लगाई थी कि इस कारण बताओ नोटिस को तत्काल प्रभाव से रद्द किया जाए और जांच से संबंधित सभी गोपनीय दस्तावेज उन्हें मुहैया कराए जाएं। हालांकि, ट्रिब्यूनल ने प्रशासनिक प्रक्रिया पर किसी भी तरह का स्टे देने से साफ इनकार कर दिया। इसके बावजूद ट्रिब्यूनल ने सेना को यह निर्देश जरूर दिया कि वह अधिकारी को कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी के निष्कर्षों और आरोपों की प्रारंभिक सुनवाई की आधिकारिक प्रतियां उपलब्ध कराए। अब मेजर को अपने बचाव में थल सेनाध्यक्ष के नोटिस का औपचारिक जवाब दाखिल करना होगा, जिसके बाद ही सेना प्रशासन उनकी सेवा समाप्त करने अथवा न करने पर अंतिम निर्णय लेगा।



















