राजस्थान के पाली जिले में अरावली पर्वतमाला के आंचल में बसा बीजापुर क्षेत्र सदियों पुरानी पौराणिक गाथाओं को खुद में समेटे हुए है। सुमेरपुर उपखंड के वनों और पथरीली वादियों के मध्य स्थित भीमकुंड एक ऐसा धार्मिक व ऐतिहासिक केंद्र है, जहाँ प्रकृति और प्राचीन आस्था का अद्भुत मेल दिखाई पड़ता है। स्थानीय परंपराओं के अनुसार यह वही पावन भूभाग है, जहाँ महाभारत काल में पांडव बंधुओं ने अपनी पहचान छिपाते हुए निर्वासन का दौर काटा था। चट्टानी धरातल पर उभरे विशालकाय पदचिह्न और घुटनों के गहरे निशान आज भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का मुख्य केंद्र बने हुए हैं।
महाबली के गदा प्रहार से फूटी थी अमृतमयी जलधारा
इस कुंड की उत्पत्ति के पीछे एक बेहद रोचक पौराणिक प्रसंग जुड़ा हुआ है। माना जाता है कि गहन जंगलों से गुजरते समय जब महारानी द्रौपदी अत्यंत तृषित हो उठीं और सुदूर तक पानी का कोई निशान नहीं दिखा, तब उनके कष्ट को देखकर महाबली भीम व्यथित हो उठे। उन्होंने अपने असीम सामर्थ्य का परिचय देते हुए पर्वत श्रृंखलाओं के बीच धरती पर घुटने टिकाए और अपनी भारी गदा से कठोर पाषाण पर भीषण आघात किया। उस प्रचंड चोट से मजबूत शिलाएं दरक गईं और उनके गर्भ से स्वच्छ जल का स्रोत प्रवाहित हो उठा, जिसने आगे चलकर एक प्राकृतिक जलाशय का स्वरूप ग्रहण कर लिया। इसी अलौकिक घटना के कारण लोकमानस में यह तीर्थ भीमकुंड के रूप में प्रतिष्ठित हुआ।
कड़कड़ाती धूप में भी नहीं सूखता शीतल व मीठा जल
पहाड़ों के दुर्गम घेरे में स्थित होने के बावजूद इस जलकुंड की भौतिक विशेषताएं हर किसी को विस्मित करती हैं। इस सरोवर का पानी न सिर्फ पीने में अत्यंत स्वादिष्ट और मीठा है, बल्कि गर्मियों के चरम प्रकोप के दौरान भी इसका स्तर कभी समाप्त नहीं होता। स्थानीय निवासियों का कहना है कि जल की यह शुद्धता और निरंतरता दैवीय कृपा का ही प्रत्यक्ष प्रमाण है। कठोर पाषाणों पर अंकित पैरों के असामान्य आकार के छापे और घुटने टेकने से बने गड्ढे आज भी स्पष्ट नजर आते हैं, जिन्हें देखने के लिए दूर-दराज से लोग यहाँ पहुँचते हैं।
महादेव मंदिर और प्राकृतिक सौंदर्य का संगम
बीजापुर स्थित इस कुंड के समीप बना भगवान शिव का प्राचीन देवालय यहाँ के वातावरण को आध्यात्मिक शांति से भर देता है। यहाँ आने वाले भक्तगण देवाधिदेव महादेव के विग्रह की विधिवत पूजा-अर्चना करते हैं और साथ ही भीम के उन पदचिह्नों का दर्शन कर खुद को धन्य मानते हैं। अरावली की हरियाली, शांत वनक्षेत्र और ऐतिहासिक अवशेष मिलकर इस समूचे परिसर को एक शांत व मनोरम तीर्थस्थल का रूप प्रदान करते हैं।
सुमेरपुर और बीजापुर तक पहुँचने का सुगम मार्ग
इस पौराणिक स्थल तक जाने के लिए परिवहन के कई साधन उपलब्ध हैं
- सड़क मार्ग: जोधपुर अथवा पाली से यात्रा करने वाले श्रद्धालु राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 62 (NH-62) के जरिए सुमेरपुर पहुँच सकते हैं। सुमेरपुर कस्बे से बीजापुर की दूरी मात्र 15 से 20 किमी रह जाती है, जिसके लिए बस, ऑटो तथा निजी टैक्सियां निरंतर संचालित होती हैं। सिरोही या उदयपुर से आने वाले मुसाफिर शिवगंज व सुमेरपुर वाले रास्ते से बीजापुर का रुख कर सकते हैं।
- रेलवे कनेक्टिविटी: निकटतम रेल संपर्क जवाई बांध रेलवे स्टेशन है, जिसकी बीजापुर से दूरी करीब 20 किमी बैठती है। स्टेशन परिसर से निजी गाड़ियां और जीप आसानी से किराए पर मिल जाती हैं।
- हवाई मार्ग: सबसे करीबी विमानपत्तन उदयपुर एयरपोर्ट (लगभग 140 किमी) तथा जोधपुर एयरपोर्ट (लगभग 150 किमी) हैं। इन हवाई अड्डों से राज्य परिवहन निगम की बसों या टैक्सियों द्वारा सुमेरपुर पहुँचकर बीजापुर जाया जा सकता है। बीजापुर गाँव में प्रवेश के उपरांत अरावली की पहाड़ियों में स्थित कुंड तक पहुँचने के लिए स्थानीय गाड़ियों या पैदल रास्ते का उपयोग किया जाता है।



















