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बहराइच में किसान बृजेश कुमार का नया प्रयोग, बिना किसी खाद के केले और धान की सह-फसली खेती से तैयार किया मॉडलउत्तर प्रदेश
21 सित॰ 2026, 1:24 pm (38 दिन पहले)· 0

बहराइच में किसान बृजेश कुमार का नया प्रयोग, बिना किसी खाद के केले और धान की सह-फसली खेती से तैयार किया मॉडल

उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में किसान बृजेश कुमार ने दो बीघे खेत में बिना रासायनिक या जैविक खाद डाले केले और धान की सफल सह-फसली खेती कर बेहद कम लागत में शानदार फसल उगाई है।

पारंपरिक खेती में रासायनिक खादों और कीटनाशक दवाओं पर होने वाला लगातार बढ़ता खर्च आज कई किसानों की बड़ी परेशानी बन चुका है। ऐसे दौर में उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले के मिर्जापुर तिवारी पुरवा गांव के किसान बृजेश कुमार ने एक अलग रास्ता चुनकर दिखाया है। आमतौर पर जहां किसान बेहतर पैदावार की उम्मीद में भारी मात्रा में रसायनों का इस्तेमाल करते हैं, वहीं बृजेश कुमार ने अपने दो बीघे खेत में बिना किसी रासायनिक या जैविक खाद की मदद के हरी-भरी फसल खड़ी कर दी है।

केले और धान की सह-फसली खेती की व्यवस्था

बृजेश कुमार ने अपने खेत में केले और धान की सह-फसली खेती की विशेष तकनीक अपनाई है। इस योजना के तहत पूरे खेत में सुनियोजित कतारें बनाई गई हैं। खेत में एक कतार केले के पौधों की लगाई गई है और उन कतारों के बीच की खाली जमीन पर धान की दो से तीन कतारें रोपी गई हैं। इस तरीके से दोनों फसलें एक ही जमीन पर बिना किसी रुकावट के साथ-साथ विकसित हो रही हैं। वर्तमान में दोनों ही फसलों के पौधे पूरी तरह मजबूत और स्वस्थ नजर आ रहे हैं, जिससे जमीन की जगह और प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव हुआ है।

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नाममात्र के खर्च में लगभग जीरो-कॉस्ट का ढांचा

खाद, रसायनों और कीटनाशकों का प्रयोग पूरी तरह बंद करने से बृजेश कुमार का खेती पर होने वाला बड़ा खर्च बच गया है। इस पूरे प्रयास में उनकी जेब से सिर्फ बुनियादी चीजों पर ही नाममात्र का खर्च हुआ। उन्होंने धान के बीज पर ₹600 खर्च किए, जबकि धान की रोपाई कराने में ₹1,500 की मजदूरी लगी। इस प्रकार दो बीघे जमीन पर फसल तैयार करने में उनका कुल खर्च मात्र ₹2,000 से ₹3,000 के बीच आया है। यह आंकड़ा आज की सामान्य खेती की तुलना में बेहद कम है और शून्य लागत खेती का व्यावहारिक उदाहरण पेश करता है।

कृषि अधिकारियों की सलाह और विचार की शुरुआत

इस अनोखे प्रयोग की शुरुआत कैसे हुई, इस पर किसान बृजेश कुमार बताते हैं कि जब कृषि अधिकारी गांव में आकर किसानों को जैविक खेती करने की सीख देते थे, तब उनके दिमाग में एक नया सवाल उठा। उन्होंने सोचा कि यदि खेत में रासायनिक या जैविक किसी भी प्रकार का बाहरी पोषण न डाला जाए, तब फसल का क्या परिणाम होगा। इसी जिज्ञासा और सोच के आधार पर उन्होंने यह कदम उठाया।

बृजेश कुमार का कहना है कि अत्यधिक रासायनिक खादों से तैयार होने वाली फसलों की तुलना में थोड़ा अंतर जरूर नजर आता है, लेकिन जितनी कम लागत इसमें लगी है, उसे देखते हुए पैदावार के नतीजे बेहद संतोषजनक और उत्साहवर्धक हैं। बिना किसी जहरीले रसायन के की जा रही इस खेती की चर्चा अब पूरे इलाके में हो रही है। किसान का मानना है कि फसल पकने पर यह तरीका उन्हें निश्चित तौर पर अच्छा मुनाफा देकर जाएगा।

सवाल-जवाब

यह अनोखी खेती किस जिले और गांव में की गई है?
यह खेती उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले के मिर्जापुर तिवारी पुरवा गांव में किसान बृजेश कुमार द्वारा की गई है।
किसान ने किन दो फसलों की सह-फसली खेती की है?
किसान बृजेश कुमार ने अपने खेत में केले और धान की सह-फसली खेती की है।
खेत में पौधों की कतारें किस तरह लगाई गई हैं?
खेत में एक कतार केले के पौधों की लगाई गई है और उनके बीच में धान की 2 से 3 कतारें रोपी गई हैं।
दो बीघे खेत में फसल तैयार करने में कुल कितना खर्च आया?
बीज के ₹600 और रोपाई के ₹1,500 मिलाकर कुल खर्च मात्र ₹2,000 से ₹3,000 के बीच आया है।
क्या इस फसल में किसी भी प्रकार की खाद डाली गई है?
नहीं, इस फसल में रासायनिक या जैविक किसी भी प्रकार की खाद या कीटनाशक का प्रयोग नहीं किया गया है।
किसान को बिना खाद के खेती करने का विचार कैसे आया?
कृषि अधिकारियों द्वारा जैविक खेती की सलाह दिए जाने पर किसान के मन में बिना किसी खाद के खेती का परीक्षण करने का विचार आया।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Ananya Iyer@ananya-iyer·37 दिन पहले

सिर्फ दो से तीन हज़ार रुपये में दो बीघे की खेती! सच में यकीन नहीं होता कि आज के समय में भी इतनी कम लागत में फसल उग सकती है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·37 दिन पहले

बृजेश कुमार का यह मॉडल ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि नीति के मोर्चे पर एक अहम संदेश देता है। जब इनपुट लागत कम होती है, तो छोटे किसानों पर कर्ज का बोझ घटता है। हालांकि, व्यापक स्तर पर यह देखना होगा कि इस तरह की शून्य-लागत सह-फसली खेती लंबी अवधि में मिट्टी की उर्वरता और बाजार में फसल की गुणवत्ता व मूल्य पर क्या असर डालती है। यदि कृषि विभाग इसका वैज्ञानिक मूल्यांकन करे, तो यह नीतिगत बदलाव का आधार बन सकता है।

Ravikash Gupta@ravikash·37 दिन पहले

बृजेश कुमार के इस प्रयोग का वित्तीय और ग्रामीण स्टार्टअप के दृष्टिकोण से बड़ा महत्व है। कृषि क्षेत्र में जब इनपुट लागत न्यूनतम हो जाती है, तो किसानों का लाभ मार्जिन सीधे बढ़ जाता है। वित्तीय रूप से यह मॉडल ग्रामीण ऋणग्रस्तता को कम करने में एक बड़ा उत्प्रेरक बन सकता है। भविष्य में अगर कृषि-टेक और मार्केट लिंकेज का सहयोग मिले, तो शून्य-लागत मॉडल छोटे किसानों की आय को दोगुना करने का एक व्यावहारिक वित्तीय ढांचा प्रदान कर सकता है।

Rohan Verma@rohan-verma·37 दिन पहले

बहराइच के किसान बृजेश कुमार का यह मॉडल उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में बढ़ती इनपुट लागत और कर्ज के संकट का एक व्यावहारिक समाधान पेश करता है। मात्र दो से तीन हजार रुपये में दो बीघे की सह-फसली खेती यह साबित करती है कि यदि कृषि विभाग इस शून्य-लागत पद्धति को ब्लॉक स्तर पर बढ़ावा दे, तो छोटे और सीमांत किसानों की आय में उल्लेखनीय सुधार हो सकता है और वे रासायनिक उर्वरकों के जाल से बाहर निकल सकते हैं।

Karan Malhotra@karan-malhotra·37 दिन पहले

एक अपराध और कानूनी संवाददाता के रूप में मेरा मानना है कि कर्ज और खाद माफियाओं के शिकंजे में फंसे किसानों के आत्महत्या करने की प्रवृत्ति पर रोक लगाने के लिए ऐसे शून्य-लागत मॉडल बहुत प्रभावी हैं। जब कानूनी रूप से प्रतिबंधित या नकली उर्वरकों के अवैध कारोबार पर पुलिस शिकंजा कसती है, तब बृजेश कुमार जैसे किसानों के आत्मनिर्भर और कानूनी रूप से सुरक्षित कृषि प्रयोग ग्रामीण अर्थव्यवस्था को अपराधमुक्त और सशक्त बनाने की ठोस उम्मीद जगाते हैं।

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