तुला राशिफल 25 सितंबर 2026: राहु और मंगल के प्रभाव से करियर में आएगी गति, वित्तीय संतुलन और रिश्तों पर दें ध्यानवृश्चिक राशिफल 25 सितंबर 2026: 12वें भाव में शुक्र जगाएगा सुख-सुविधाओं की चाहत, बजट और सेहत का रखें ध्यानपंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती पर योगी आदित्यनाथ ने दी श्रद्धांजलि, अंत्योदय और एकात्म मानववाद के विचार को किया यादजीनियस एक्ट के तहत स्टेबलकॉइन के सख्त नियमों पर फेडरल रिजर्व ने मांगी जनता से रायदैनिक राशिफल 25 सितंबर 2026: कुंभ में चंद्रमा और राहु की युति से ग्रहण योग, जानें सभी 12 राशियों का हालचीन और अमेरिका के बीच टकराव से दोनों को नुकसान, राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने वाशिंगटन में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व पर दिया जोरगाजा युद्ध में पीछे न हटने के पीछे नेतन्याहू ने सुनाई 1967 की दास्तान, भाई के वो 5 शब्द बने इजरायल की सैन्य नीतिसऊदी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल हमलों के बाद तेल की कीमतों में उछाल, तुर्किये और पाकिस्तान के साथ आपात बैठकसिंह राशिफल 25 सितंबर 2026: साझेदारी और कागजी सौदों में रखें स्पष्टता, रिश्तों में पुरानी बातें न दोहराएंकेदारनाथ में पांच महीने के भीतर 50 मीट्रिक टन से अधिक कचरा जमा, आरटीआई में सामने आए चौंकाने वाले आंकड़े
बाड़मेर में छाई पांच हजार साल पुरानी कांस्य थाली मालिश, बिना दवा दूर हो रहा दर्दराजस्थान
16 सित॰ 2026, 10:36 pm (8 दिन पहले)· 2

बाड़मेर में छाई पांच हजार साल पुरानी कांस्य थाली मालिश, बिना दवा दूर हो रहा दर्द

राजस्थान के बाड़मेर में पांच हजार साल पुरानी आयुर्वेद आधारित कांस्य थाली मालिश पद्धति इन दिनों खासी चर्चा में है। बिना किसी अंग्रेजी दवा के केवल दस मिनट की इस प्रक्रिया से लोगों को जोड़ों के दर्द और थकान से राहत मिल रही है।

भारत और पाकिस्तान की सीमा से सटे राजस्थान के बाड़मेर जिले में प्राचीन भारतीय चिकित्सा का एक अनोखा रूप इन दिनों काफी लोकप्रियता हासिल कर रहा है। आधुनिक जीवनशैली की भागदौड़ और अनियमित दिनचर्या के बीच, हजारों साल पुरानी एक प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति लोगों के लिए वरदान साबित हो रही है। बिना किसी आधुनिक अंग्रेजी दवा या रासायनिक पेनकिलर के सहारे लोगों के हाथ-पैरों की जकड़न और पुराने दर्द को दूर करने वाली इस तकनीक को कांस्य थाली मालिश के रूप में जाना जाता है। इस पारंपरिक चिकित्सा पद्धति का इतिहास करीब पांच हजार साल पुराना आयुर्वेद से जुड़ा है, जो आज के तकनीकी दौर में भी अपनी प्रासंगिकता और चमत्कारी परिणामों के कारण लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है।

बाड़मेर में पारंपरिक उपचार का बढ़ता दायरा

बाड़मेर शहर के निवासी अंकित कुमार इस प्राचीन कांस्य थाली पद्धति का उपयोग कर पारंपरिक तरीके से जरूरतमंद लोगों का उपचार कर रहे हैं। उनके इस अनूठे उपचार केंद्र पर किसी भी तरह की आधुनिक फार्मास्युटिकल दवाओं या दर्द निवारक गोलियों का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। इसके विपरीत, केवल एक साधारण सी दिखने वाली कांस्य की थाली और कुछ विशेष आयुर्वेदिक तेलों के सम्मिश्रण के जरिए वह मरीजों को उनकी शारीरिक पीड़ा से मुक्ति दिला रहे हैं। अपनी शारीरिक थकान, मांसपेशियों की गंभीर जकड़न और लंबे समय से चले आ रहे पुराने दर्द से परेशान लोग इस पारंपरिक उपचार का लाभ उठाने के लिए दूर-दराज के इलाकों से उनके पास पहुंच रहे हैं।

ये भी पढ़ें

क्या है कांस्य थाली की बनावट और मालिश की प्रक्रिया

इस अनूठी प्राचीन चिकित्सा पद्धति में उपयोग की जाने वाली थाली को सामान्य बर्तनों की तरह नहीं बनाया जाता, बल्कि यह विशेष रूप से तांबा, जिंक और टिन के निश्चित और खास मिश्रण से तैयार की जाती है। इस पूरी उपचार प्रक्रिया का तरीका भी बेहद दिलचस्प और आरामदायक होता है। इस तकनीक की शुरुआत में मरीज के पैरों के तलवों पर सरसों का तेल, तिल का तेल या फिर शुद्ध देसी घी की मालिश की जाती है। इसके पश्चात, पैरों को इस विशेष कांस्य की थाली के ऊपर रखा जाता है। इसके बाद एक विशेष उपकरण की सहायता से थाली को गति दी जाती है। जैसे ही मशीन का स्विच ऑन किया जाता है, थाली घूमने लगती है और पैरों के तलवों पर एक नियत तरीके से दबाव बनाते हुए मालिश शुरू हो जाती है।

एक्यूप्रेशर के सिद्धांतों पर आधारित कार्यप्रणाली

इस विशेष मालिश के संचालन के तौर-तरीकों पर प्रकाश डालते हुए अंकित कुमार बताते हैं कि यह पूरी प्रक्रिया पूरी तरह से एक्यूप्रेशर के वैज्ञानिक नियमों और सिद्धांतों पर काम करती है। जब यह कांस्य की थाली पैरों के तलवों पर एक समान और संतुलित दबाव डालती है, तो इसका सीधा प्रभाव शरीर के महत्वपूर्ण दबाव बिंदुओं यानी प्रेशर पॉइंट्स पर पड़ता है। इस प्रकार के लक्षित दबाव से न केवल हाथों और पैरों की पीड़ा का तुरंत समाधान होता है, बल्कि पूरे शरीर की तंत्रिका तंत्र को अभूतपूर्व शांति और आराम मिलता है। इसके अतिरिक्त, इस प्रक्रिया से शरीर के भीतर रक्त का संचार यानी ब्लड सर्कुलेशन भी काफी बेहतर हो जाता है, जिससे मानसिक तनाव और शारीरिक थकान का नामोनिशान मिट जाता है।

दस मिनट की प्रक्रिया और प्राकृतिक डिटॉक्सिफिकेशन

इस पूरी चिकित्सीय मालिश की समयावधि मात्र दस मिनट की होती है, जो बेहद असरदार साबित होती है। अंकित कुमार के अनुसार, इस दस मिनट के सत्र में पहले पांच मिनट तक पैरों की क्लॉकवाइज यानी घड़ी की सुई की दिशा में मालिश की जाती है और इसके तुरंत बाद के अगले पांच मिनट एंटी-क्लॉकवाइज यानी घड़ी की सुई की विपरीत दिशा में मालिश की प्रक्रिया को दोहराया जाता है। इस पूरी चिकित्सा पद्धति का सबसे बड़ा और चमत्कारी फायदा यह माना जाता है कि यह शरीर के भीतर छिपे विषैले तत्वों यानी टॉक्सिन्स को प्राकृतिक रूप से बाहर निकाल देती है। मालिश की इस अवधि के दौरान जब शरीर का डिटॉक्स बाहर निकलता है, तो कांस्य की थाली और तेल का रंग बदलकर काला पड़ जाता है। यह कालापन इस बात का सबसे बड़ा और पुख्ता प्रमाण होता है कि शरीर के अंदर लंबे समय से जमा अशुद्धियां पूरी तरह से बाहर निकल चुकी हैं। आज के इस आधुनिक और तनावपूर्ण दौर में यह प्राचीन पद्धति लोगों के स्वास्थ्य के लिए एक अनूठा वरदान साबित हो रही है।

सवाल-जवाब

कांस्य थाली मालिश मुख्य रूप से किस स्थान पर चर्चा में है?
यह प्राचीन मालिश पद्धति राजस्थान के बाड़मेर जिले में चर्चा का विषय बनी हुई है।
इस चिकित्सा पद्धति का इतिहास कितना पुराना है?
यह तकनीक करीब पांच हजार साल पुरानी आयुर्वेद आधारित परंपरा से जुड़ी हुई है।
बाड़मेर में इस तकनीक से लोगों का इलाज कौन कर रहा है?
बाड़मेर शहर के रहने वाले अंकित कुमार इस प्राचीन पद्धति से लोगों का पारंपरिक उपचार कर रहे हैं।
इस मालिश में किस प्रकार की थाली का उपयोग किया जाता है?
यह थाली विशेष रूप से तांबा, जिंक और टिन के खास मिश्रण से बनाई जाती है।
मालिश की पूरी प्रक्रिया कितने समय की होती है?
इस मालिश की पूरी प्रक्रिया लगभग दस मिनट की होती है।
मालिश के दौरान पैरों में क्या लगाया जाता है?
मरीज के पैरों के तलवों पर सरसों का तेल, तिल का तेल या शुद्ध देसी घी लगाया जाता है।
मालिश के बाद थाली और तेल का रंग काला क्यों पड़ जाता है?
यह इस बात का प्रमाण है कि शरीर के अंदर जमा अशुद्धियां और विषैले टॉक्सिन्स बाहर निकल चुके हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Rajesh Kumar@rajesh-kumar·8 दिन पहले

बाड़मेर की यह रिपोर्ट दर्शाती है कि ग्रामीण भारत में पारंपरिक चिकित्सा और आयुर्वेद के प्रति रुझान तेजी से बढ़ रहा है। आधुनिक जीवनशैली के दुष्प्रभावों और रासायनिक पेनकिलर के बढ़ते इस्तेमाल के बीच, तांबा, जिंक और टिन के मिश्रित बर्तनों से जुड़ी ऐसी प्राचीन पद्धतियों का मुख्यधारा में आना एक दिलचस्प बदलाव है। नीति निर्माताओं और स्वास्थ्य क्षेत्र के विशेषज्ञों के लिए यह सोचना जरूरी हो गया है कि कैसे वैज्ञानिक प्रमाणिकता के साथ इन स्थानीय उपचार पद्धतियों को सुरक्षित दायरे में बढ़ावा दिया जा सकता है, जिससे सीमावर्ती जिलों के आम नागरिकों को सुलभ और प्राकृतिक स्वास्थ्य विकल्प मिल सकें।

Arjun Mehta@arjun-mehta·8 दिन पहले

सीमावर्ती क्षेत्र बाड़मेर जैसे सुदूर इलाकों में स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे की सीमाओं के बीच पारंपरिक और स्वदेशी चिकित्सा तकनीकों का बढ़ता चलन सार्वजनिक नीति के लिहाज़ से बेहद महत्वपूर्ण है। यदि आयुष नीति और स्थानीय शासन के स्तर पर ऐसी पारंपरिक पद्धतियों को संस्थागत समर्थन, गुणवत्ता नियंत्रण और मानक प्रमाणीकरण मिले, तो यह न केवल ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था को संबल दे सकता है, बल्कि स्थानीय स्वरोज़गार के नए अवसर भी पैदा कर सकता है।

Ravikash Gupta@ravikash·8 दिन पहले

अर्जुन की बात को आगे बढ़ाते हुए, इसे केवल स्थानीय स्वास्थ्य सेवा तक सीमित न मानकर भारत के तेज़ी से बढ़ते वेलनेस और आयुष बाज़ार के आर्थिक दृष्टिकोण से देखना चाहिए। पारंपरिक चिकित्सा में यांत्रिक सरलता का यह समावेश छोटे शहरों में पनपती माइक्रो-एंटरप्रेन्योरशिप का एक बेहतरीन उदाहरण है। आज वैश्विक स्तर पर प्राकृतिक और वैकल्पिक उपचार पद्धतियों की मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे में यदि इन स्थानीय और कम लागत वाले मॉडलों को मानक गुणवत्ता, सही ब्रांडिंग और सूक्ष्म-निवेश का समर्थन मिले, तो ये टियर-3 और टियर-4 क्षेत्रों में सफल वेलनेस स्टार्टअप के रूप में उभर सकते हैं।

Rohan Verma@rohan-verma·8 दिन पहले

बाड़मेर सीमावर्ती क्षेत्र में इस प्रकार की प्राचीन आयुर्वेद आधारित चिकित्सा पद्धतियों का पुनरुत्थान यह दर्शाता है कि ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में पारंपरिक स्वास्थ्य समाधानों की मांग तेजी से बढ़ रही है। जहाँ एक ओर आधुनिक फार्मास्यूटिकल दवाओं के साइड इफ़ेक्ट्स को लेकर लोग चिंतित हैं, वहीं दूसरी ओर एक्यूप्रेशर और तांबा-जस्ता मिश्रित कांस्य थाली जैसी पद्धतियाँ बिना अंग्रेजी दवाओं के शारीरिक पीड़ा और तंत्रिका तंत्र की थकान दूर करने का एक प्रभावी और प्राकृतिक विकल्प बन रही हैं। भविष्य में ऐसी पारंपरिक पद्धतियों का मानकीकरण और वैज्ञानिक सत्यापन इन्हें मुख्यधारा के स्वास्थ्य देखभाल ढांचे से जोड़ने में मददगार साबित हो सकता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·8 दिन पहले

अपराध और कानून-व्यवस्था की दृष्टि से इस प्रकार के अनियंत्रित वैकल्पिक चिकित्सा केंद्रों की कार्यप्रणाली पर विनियामक नजर रखना आवश्यक है। जब बिना किसी वैधानिक चिकित्सकीय लाइसेंस या मानक प्रोटोकॉल के इस तरह की मशीन आधारित मालिश और उपचार दिए जाते हैं, तो सार्वजनिक सुरक्षा और उपभोक्ता संरक्षण का गंभीर कानूनी प्रश्न खड़ा होता है। यदि ऐसे केंद्रों पर अप्रशिक्षित व्यक्तियों द्वारा उपचार किया जाए, तो यह भ्रामक चिकित्सा दावों और मरीजों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ के दायरे में आ सकता है, जिसके लिए उपभोक्ता संरक्षण कानूनों और आयुष मंत्रालय के दिशानिर्देशों के तहत सख्त प्रशासनिक निगरानी की जरूरत है।

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp