बेंगलुरु स्थित एक खेल कंपनी के भर्ती संबंधी हालिया फैसले ने पूरे देश के युवाओं और कॉरपोरेट जगत में तीखी बहस छेड़ दी है। खेल क्षेत्र से जुड़ी निजी कंपनी ए1 स्पोर्ट्स वर्ल्ड के सीईओ कार्तिक शेनॉय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर यह सार्वजनिक ऐलान किया कि उनका संस्थान अब उत्तर भारत के चार बड़े राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश के पुरुष अभ्यर्थियों को किसी भी पद पर नियुक्त नहीं करेगा। सोशल मीडिया पर यह बयान सामने आते ही रोजगार के अवसरों, क्षेत्रीय पहचान और जेंडर समानता को लेकर सवाल उठने लगे हैं। कई लोगों का तर्क है कि कार्यस्थल पर सुरक्षा सुनिश्चित करना बेहद अहम है, लेकिन किसी एक व्यक्ति के आचरण की आड़ में करोड़ों योग्य उम्मीदवारों को उनके जन्मस्थान और लिंग के आधार पर छांट देना कितना न्यायसंगत है।
सीईओ ने क्यों लिया यह विवादास्पद निर्णय
कार्तिक शेनॉय ने अपने इस अप्रत्याशित कदम के पीछे संस्थान के एक पूर्व कर्मचारी से जुड़ी कथित घटना को मुख्य वजह बताया। शेनॉय के अनुसार, वह पूर्व कर्मचारी एक एमबीए ग्रेजुएट था और भर्ती के समय उसका व्यवहार काफी सभ्य और पढ़ा-लिखा प्रतीत हो रहा था। संस्थान में कार्यभार संभालने के करीब दो महीने बाद उसने महिला सहकर्मियों के साथ कथित तौर पर अशोभनीय व्यवहार और बदतमीजी शुरू कर दी। सीईओ ने यह गंभीर आरोप भी लगाया कि उस कर्मचारी ने एक महिला सहकर्मी के साथ जबरदस्ती करने का प्रयास किया।
अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में स्थिति स्पष्ट करते हुए शेनॉय ने बताया कि आंतरिक चर्चाओं और गंभीर विमर्श के बाद प्रबंधन ने इन चार राज्यों के पुरुष अभ्यर्थियों को अपनी भर्ती प्रक्रिया से बाहर रखने की नीति तय की। उन्होंने जानकारी दी कि संबंधित कर्मचारी को महिला सहकर्मियों से कथित दुर्व्यवहार के लिए पहले दो बार आधिकारिक चेतावनी दी गई थी, और बाद में उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई भी की गई। शेनॉय ने यह दलील भी दी कि उनकी कंपनी बच्चों के खेल प्रशिक्षण और गतिविधियों से जुड़ी है, इसलिए कर्मचारियों और छोटे बच्चों की व्यक्तिगत सुरक्षा उनके लिए सर्वोपरि है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि उनकी फर्म में राजस्थान की एक महिला कर्मचारी पहले से कार्यरत हैं, जिन्होंने प्रबंधन के इस निर्णय पर सहमति जताई है।
जनसांख्यिकीय हकीकत और प्रभावित आबादी का दायरा
इस फैसले की व्यापकता को समझने के लिए संबंधित राज्यों की जनसंख्या के आंकड़ों पर नजर डालना जरूरी है। वर्ष 2011 की आधिकारिक जनगणना के मुताबिक, इन चारों राज्यों की संयुक्त आबादी लगभग 44.50 करोड़ दर्ज की गई थी। इस समग्र जनसंख्या में पुरुषों की कुल तादाद तकरीबन 23.19 करोड़ और महिलाओं की संख्या लगभग 21.31 करोड़ थी। इसका सीधा मतलब यह निकलता है कि कंपनी की यह नीतिगत घोषणा कागजी तौर पर करीब 23.19 करोड़ पुरुषों की साख और योग्यता को एक ही तराजू में तौल देती है।
राज्यवार जनसांख्यिकी पर गौर करें तो वर्ष 2011 में उत्तर प्रदेश में पुरुषों की संख्या 10 करोड़ 44 लाख 80 हजार 510 यानी करीब 10.45 करोड़ थी। वहीं बिहार में पुरुष आबादी 5 करोड़ 42 लाख 78 हजार 157 यानी लगभग 5.43 करोड़ दर्ज की गई थी। राजस्थान के भीतर पुरुषों की आबादी 3 करोड़ 55 लाख 50 हजार 997 यानी करीब 3.56 करोड़ थी, जबकि मध्य प्रदेश में यह आंकड़ा 3 करोड़ 76 लाख 12 हजार 306 यानी लगभग 3.76 करोड़ था। इस प्रकार इन चारों राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश में कुल मिलाकर 23 करोड़ 19 लाख 21 हजार 970 पुरुषों की मौजूदगी थी। इतने विशाल जनसमूह के कार्यबल को किसी एक आपराधिक या अमर्यादित कृत्य के आधार पर अयोग्य करार देना एक व्यापक नीतिगत गतिरोध पैदा करता है।
संविधान के अनुच्छेद 16 और निजी क्षेत्र का कानूनी दायरा
इस घोषणा के सार्वजनिक होते ही इंटरनेट पर भारतीय संविधान के अनुच्छेदों के उल्लंघन को लेकर जोरदार चर्चाएं छिड़ गईं। विशेष रूप से संविधान के अनुच्छेद 16 का उल्लेख किया जा रहा है। अनुच्छेद 16(1) के अंतर्गत राज्य के अधीन आने वाले किसी भी पद पर नियोजन या नियुक्ति से संबंधित मामलों में सभी नागरिकों के लिए समान अवसर की गारंटी दी गई है। वहीं अनुच्छेद 16(2) स्पष्ट करता है कि केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, उद्भव, जन्मस्थान, निवास या इनमें से किसी के आधार पर राज्य के किसी पद पर किसी नागरिक के प्रति कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता।
हालांकि, कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले में संवैधानिक प्रावधानों की तकनीकी सीमा को समझना अनिवार्य है। अनुच्छेद 16 का मुख्य सरोकार सार्वजनिक नियोजन यानी सरकारी नौकरियों और राज्य के उपक्रमों से है। ए1 स्पोर्ट्स वर्ल्ड एक पूर्णतः निजी वाणिज्यिक प्रतिष्ठान है, इसलिए सरकारी भर्तियों पर सीधे तौर पर लागू होने वाले अनुच्छेद 16 को किसी प्राइवेट कॉरपोरेशन की आंतरिक नीति पर हूबहू लागू नहीं किया जा सकता। इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि निजी क्षेत्र पर कोई कानूनी बंदिशें नहीं हैं, बल्कि उन पर लागू होने वाले नियम अन्य श्रम व रोजगार संहिताओं से संचालित होते हैं। ऐसे में इसे सीधे तौर पर अनुच्छेद 16 का उल्लंघन बताना कानूनी रूप से सटीक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।
अनुच्छेद 19 की सीमाएं और निजी प्रतिष्ठानों की स्वायत्तता
संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत मिलने वाले मौलिक अधिकारों को लेकर भी यह मुद्दा जांचा-परखा जा रहा है। अनुच्छेद 19(1)(e) भारत के समस्त नागरिकों को देश के किसी भी भूभाग में स्वतंत्र रूप से घूमने, रहने और बसने का अधिकार प्रदान करता है। इसी तरह अनुच्छेद 19(1)(g) नागरिकों को कोई भी पेशा चुनने, व्यापार करने अथवा आजीविका कमाने की आजादी की सुरक्षा देता है।
संवैधानिक न्यायशास्त्र की मूलभूत व्यवस्था यह है कि ये मौलिक अधिकार प्राथमिक रूप से राज्य की मनमानी कार्रवाई और सरकारी नीतियों के खिलाफ नागरिकों को सुरक्षा कवच प्रदान करते हैं। किसी निजी कंपनी के आंतरिक हायरिंग फैसलों पर इन संवैधानिक अधिकारों का प्रत्यक्ष प्रवर्तन उस तरह संभव नहीं होता, जैसा किसी सरकारी निकाय के फैसले पर होता है। नतीजतन, केवल एक सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर यह निर्णय दे देना कि कंपनी ने संविधान के अनुच्छेद 19 का प्रत्यक्ष उल्लंघन कर दिया है, कानूनी दृष्टि से अधूरा विश्लेषण होगा।
निजी क्षेत्र में मनमानी पर वैधानिक अंकुश
निजी कंपनी होने का अर्थ यह कतई नहीं है कि कोई भी नियोक्ता अपनी पसंद के मुताबिक किसी भी आधार पर खुली मनमानी कर सकता है। भारतीय न्यायप्रणाली में निजी प्रतिष्ठानों को भी देश में लागू श्रम कानूनों, औद्योगिक विवाद संहिताओं और सेवा शर्तों से जुड़े अनिवार्य वैधानिक नियमों का अनुपालन करना होता है।
लैंगिक समानता के संदर्भ में कोड ऑन वेजेज 2019 की धारा 3 स्पष्ट तौर पर भर्ती और रोजगार की शर्तों में जेंडर आधारित अनुचित भेदभाव की रोकथाम को लेकर कड़े प्रावधान प्रस्तुत करती है। यद्यपि किसी विशिष्ट मुकदमे में इन प्रावधानों की प्रयोज्यता संबंधित कार्य की वास्तविक प्रकृति, कार्यस्थल की आवश्यकताओं और समग्र तथ्यात्मक पृष्ठभूमि पर निर्भर करेगी। ए1 स्पोर्ट्स वर्ल्ड के सीईओ द्वारा घोषित इस नीति में स्पष्ट रूप से पुरुष अभ्यर्थियों को उनके गृह राज्य और लिंग के आधार पर सेवा से वंचित करने की बात कही गई है। यही वजह है कि यह प्रकरण अब केवल एक सोशल मीडिया टिप्पणी तक सीमित न रहकर कार्यस्थल सुरक्षा बनाम नागरिकों के आजीविका अधिकारों के बीच एक गंभीर कानूनी परीक्षण का रूप ले चुका है।

















