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भारतीय मोबाइल नंबरों से पाकिस्तान के सैन्य ठिकानों तक फैले जासूसी नेटवर्क का दिल्ली और बंगाल पुलिस ने किया खुलासाभारत
28 अग॰ 2026, 5:14 pm (1 घंटे पहले)· 2

भारतीय मोबाइल नंबरों से पाकिस्तान के सैन्य ठिकानों तक फैले जासूसी नेटवर्क का दिल्ली और बंगाल पुलिस ने किया खुलासा

सुरक्षा एजेंसियों ने एक अंतरराज्यीय और अंतरराष्ट्रीय जासूसी नेटवर्क का पर्दाफाश किया है, जिसमें भारत में पंजीकृत सिम कार्ड का उपयोग पाकिस्तान स्थित सैन्य प्रतिष्ठानों से वॉट्सऐप चलाने के लिए किया जा रहा था। इस सिलसिले में दिल्ली और पश्चिम बंगाल से कई संदिग्धों की पहचान कर कार्रवाई की गई है।

अंतरराष्ट्रीय सीमा पार संचालित एक बड़े गुप्त सूचना नेटवर्क की कड़ियां सुरक्षा बलों के हत्थे चढ़ी हैं, जिसके तार पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई से जुड़े पाए गए हैं। राजस्थान एवं पंजाब के सरहदी इलाकों से शुरू हुई इस जांच का जाल अब राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली और पश्चिम बंगाल के कई जिलों तक फैल चुका है। केंद्रीय खुफिया बलों, पश्चिम बंगाल एसटीएफ और दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच की सम्मिलित कार्रवाई में ऐसे कई पुख्ता सबूत मिले हैं, जिनके आधार पर यह पता लगाया जा रहा है कि भारतीय मोबाइल कनेक्शन सीमा पार कैसे स्थानांतरित किए गए और इनके सहारे किन-किन भारतीय संपर्कों से बातचीत की गई।

पाकिस्तानी सैन्य ठिकानों से भारतीय सिम कार्ड का संचालन

जांच अधिकारियों द्वारा जुटाए गए तकनीकी साक्ष्यों से यह सनसनीखेज सच सामने आया है कि भारतीय नागरिकों के नाम पर पंजीकृत कई सिम कार्ड भौतिक रूप से पाकिस्तान के अंदर इस्तेमाल में लाए जा रहे थे। इन मोबाइल नंबरों के माध्यम से मैसेजिंग ऐप वॉट्सऐप पर नए खाते एक्टिवेट किए गए थे। डिजिटल सर्विलांस और नेटवर्क लोकेशन ट्रैकिंग से पुष्टि हुई है कि इन वॉट्सऐप नंबरों की आवाजाही और संचालन पाकिस्तान के कराची, रावलपिंडी और लाहौर स्थित सैन्य ठिकानों के आसपास दर्ज की गई।

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जांच की मुख्य सुई पश्चिम बंगाल के उत्तर दिनाजपुर तथा कूचबिहार जिलों से खरीदे गए सिम कार्डों पर टिकी है। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, ये सिम कार्ड रोजिना बीबी, जफर अली, अजहरुद्दीन, मोहम्मद शफीकुल इस्लाम और नूर नासिरुद्दीन अली के नाम पर जारी हुए थे। सुरक्षा एजेंसियों के सामने सबसे अहम सवाल यह खड़ा है कि भारतीय पहचान पत्रों पर लिए गए ये सिम कार्ड आखिर सीमा पार कराची और रावलपिंडी तक कैसे पहुंचे। फॉरेंसिक जांच से यह भी साफ हुआ है कि वॉट्सऐप खाता खोलते समय जरूरी वन-टाइम पासवर्ड (ओटीपी) उसी दौरान दर्ज किया गया था, जब संबंधित सिम कार्ड पाकिस्तान के सैन्य इलाके में मौजूद था। इससे यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि सीमा पार बैठे ऑपरेटर खुद इन नंबरों को नियंत्रित कर रहे थे।

फिलहाल सुरक्षा और खुफिया एजेंसियां उन तमाम फोन कॉल्स और संदेशों की विस्तृत सूची तैयार कर रही हैं, जो इन नंबरों के जरिए भारत के अलग-अलग हिस्सों में भेजे गए। यह आशंका जताई जा रही है कि विदेशी ऑपरेटरों ने भारत के सामरिक ठिकानों, सैन्य प्रतिष्ठानों अथवा सुरक्षा कंट्रोल रूम से गोपनीय जानकारी जुटाने की कोशिश की होगी। अधिकारी अब इस बात की कड़ियां जोड़ रहे हैं कि क्या कोई संवेदनशील डेटा वास्तव में सीमा पार लीक हुआ है अथवा यह कोशिश सिर्फ शुरुआती संपर्क बनाने तक सीमित थी।

बांग्लादेश और नेपाल के रास्ते सिम तस्करी का अंतरराष्ट्रीय रूट

इस मामले के तार केवल भारत और पाकिस्तान तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि इसमें पड़ोसी राष्ट्रों नेपाल और बांग्लादेश की भूमिका भी संदिग्ध मानी जा रही है। जांच के सिलसिले में बांग्लादेश के रंगपुर क्षेत्र के निवासी अकबर हुसैन उर्फ सम्राट की संलिप्तता सामने आई है। सुरक्षा तंत्र को अंदेशा है कि भारत-बांग्लादेश सीमावर्ती इलाके में सक्रिय अकबर हुसैन पाकिस्तान में बैठे जासूसी तंत्र के प्रमुख हैंडलरों के सीधे संपर्क में बना हुआ था।

जांचकर्ताओं का मानना है कि सबसे पहले भारतीय सीमावर्ती गांवों से सिम कार्ड एकत्रित करके उन्हें अवैध रूप से बांग्लादेश पहुंचाया जाता था। इसके उपरांत ढाका या नेपाल की राजधानी काठमांडू के रास्ते हवाई व जमीनी मार्गों से इन सिम कार्डों की खेप पाकिस्तान भेजी जाती थी। काठमांडू के रास्ते चलाए जा रहे इस तस्करी मार्ग में विशाल शाह नाम के एक नेपाली नागरिक की भूमिका की भी जांच की जा रही है। जांच एजेंसियां इस त्रिस्तरीय अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चैन को पूरी तरह ध्वस्त करने के लिए सभी उपलब्ध कड़ियों को आपस में जोड़ रही हैं।

कूचबिहार के संदिग्ध और स्थानिक एफआईआर की कार्रवाई

पश्चिम बंगाल के कूचबिहार जिले में जब इस गिरोह की जड़ों की तलाश शुरू हुई, तब तीन स्थानीय व्यक्तियों मोहम्मद शफीकुल इस्लाम, नूर नासिरुद्दीन अली और राशिदुल हक की भूमिका उजागर हुई। खुफिया एजेंसियों को जानकारी मिली है कि ये तीनों व्यक्ति बांग्लादेशी नागरिक अकबर हुसैन उर्फ सम्राट से निरंतर बातचीत कर रहे थे। स्थानीय पुलिस अब इस पहलू की जांच कर रही है कि इन लोगों ने सिम कार्ड जुटाने में लॉजिस्टिक्स की जिम्मेदारी संभाली थी या यह केवल संवाद के माध्यम बने हुए थे।

इस प्रकरण में कानूनी शिकंजा कसते हुए कूचबिहार के दिनहाटा अंतर्गत साहेबगंज पुलिस स्टेशन में प्राथमिकी दर्ज की गई है। साहेबगंज थाना पुलिस और एसटीएफ की संयुक्त टीम दर्ज केस के आधार पर कॉल रिकॉर्ड्स, टावर लोकेशन और वित्तीय साक्ष्यों का विश्लेषण कर रही है। कानूनी कार्यवाही का प्राथमिक लक्ष्य सीमावर्ती इलाकों में काम कर रहे उस सिंडिकेट को खत्म करना है जो दूसरों के दस्तावेजों पर अवैध सिम जारी करवाकर विदेश भेजता है।

दिल्ली के हौजरानी से सॉफ्टवेयर इंजीनियर प्रदीप्त बसु की गिरफ्तारी

इस पूरे मामले में उस वक्त एक महत्वपूर्ण कामयाबी मिली जब पश्चिम बंगाल एसटीएफ और दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच के साझा दस्ते ने दिल्ली में दबिश दी। दक्षिण दिल्ली के हौजरानी इलाके से प्रदीप्त बसु नामक व्यक्ति को हिरासत में लिया गया, जो पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर है और मूलतः पश्चिम बंगाल का रहने वाला है। आईएसआई के संदिग्ध एजेंटों से सांठगांठ और जासूसी नेटवर्क को तकनीकी मदद देने के शक में बसु काफी दिनों से एजेंसियों के निशाने पर था।

जांच में पता चला है कि गिरफ्तारी से ठीक पहले प्रदीप्त बसु पिछले 10 दिनों से हौजरानी के एक किराए के कमरे में ठहरा हुआ था और वहां रहते हुए कई बांग्लादेशी नागरिकों के सीधे संपर्क में था। प्रारंभिक पूछताछ में उसने दावा किया कि कुछ बांग्लादेशी नागरिक इलाज कराने दिल्ली आए थे और वह उनके रहने तथा अस्पताल संबंधी कागजी कार्रवाई में मदद कर रहा था। सुरक्षा एजेंसियां अब इस बात की गहराई से छानबीन कर रही हैं कि क्या मेडिकल सहायता का यह ढांचा केवल एक छद्म आवरण था, जिसकी आड़ में संदिग्ध विदेशी नागरिकों को दिल्ली में ठहराकर जासूसी गतिविधियों को अंजाम दिया जा रहा था।

सीमा पार मनी एक्सचेंज कारोबार और वित्तीय लेनदेन का लेखा-जोखा

सॉफ्टवेयर इंजीनियर प्रदीप्त बसु के बैकग्राउंड की जांच करने पर यह भी खुलासा हुआ है कि वह भारत-बांग्लादेश सीमा पर फॉरेन करंसी एक्सचेंज (विदेशी मुद्रा विनिमय) के कारोबार में भी संलिप्त था। वित्तीय लेनदेन का यह पहलू इस पूरे केस की रीढ़ माना जा रहा है। इसी वजह से जांच एजेंसियां उसके बैंक खातों, डिजिटल ट्रांजैक्शन और सीमा पार हुए मौद्रिक आदान-प्रदान का ऑडिट कर रही हैं। पुलिस यह पता लगा रही है कि मनी एक्सचेंज के जरिए जुटाया गया पैसा किन खातों में ट्रांसफर हुआ और क्या इस धन का प्रयोग सिम कार्ड खरीदने तथा विदेशी नेटवर्क को फंडिंग देने में किया गया।

पुलिस की एफआईआर में कुल सात लोगों को नामजद आरोपी बनाया गया है। इनमें कूचबिहार के मोहम्मद शफीकुल इस्लाम, राशिदुल हक और नूर नासिरुद्दीन अली, दिल्ली से पकड़ा गया सॉफ्टवेयर इंजीनियर प्रदीप्त बसु, बांग्लादेश के रंगपुर का रहने वाला अकबर हुसैन उर्फ सम्राट, बांग्लादेशी नागरिक उमर तथा नेपाली नागरिक विशाल शाह शामिल हैं। इनके अलावा कई अन्य अज्ञात सहयोगियों की भी तलाश जारी है। सुरक्षा बल इन सभी आरोपियों के बीच आपसी संवाद, मोबाइल व वॉट्सऐप चैट, सिम की आवाजाही, वित्तीय लेनदेन और अंतरराष्ट्रीय संबंधों का गहन विश्लेषण कर रहे हैं।

सवाल-जवाब

इस अंतरराज्यीय जासूसी नेटवर्क का भंडाफोड़ कैसे हुआ?
केंद्रीय खुफिया एजेंसियों, पश्चिम बंगाल एसटीएफ और दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच के साझा ऑपरेशन में यह खुलासा हुआ कि भारत में जारी सिम कार्ड पाकिस्तान में वॉट्सऐप चलाने के लिए इस्तेमाल हो रहे थे।
भारतीय सिम कार्ड पाकिस्तान के किन स्थानों पर सक्रिय पाए गए?
डिजिटल लोकेशन ट्रैकिंग से पुष्टि हुई है कि ये सिम कार्ड पाकिस्तान के रावलपिंडी, लाहौर और कराची में स्थित सैन्य ठिकानों के पास इस्तेमाल किए जा रहे थे।
दिल्ली से गिरफ्तार सॉफ्टवेयर इंजीनियर प्रदीप्त बसु पर क्या आरोप हैं?
प्रदीप्त बसु पर आईएसआई से संपर्क रखने, सीमा पर मनी एक्सचेंज चलाने और दिल्ली में बांग्लादेशी नागरिकों को मेडिकल इलाज के बहाने ठहराने का संदेह है।
सिम कार्डों को किस रास्ते से पाकिस्तान भेजा जाता था?
जांच के अनुसार, सिम कार्डों को पहले भारत-बांग्लादेश सीमा से बांग्लादेश ले जाया जाता था और फिर ढाका अथवा नेपाल की राजधानी काठमांडू के रास्ते पाकिस्तान पहुंचाया जाता था।
इस मामले की प्राथमिकी में किन-किन आरोपियों के नाम हैं?
एफआईआर में प्रदीप्त बसु, राशिदुल हक, नूर नासिरुद्दीन अली, मोहम्मद शफीकुल इस्लाम, अकबर हुसैन उर्फ सम्राट, उमर (बांग्लादेशी) और विशाल शाह (नेपाली) नामजद हैं।
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टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·52 मिनट पहले

यह घटना दर्शाती है कि सीमावर्ती जिलों में जाली पहचान पत्रों के जरिए सिम कार्ड हासिल करने वाले स्थानीय मददगार राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन चुके हैं। जांच का दायरा नेपाल और बांग्लादेश तक फैलने से साफ है कि यह एक बड़ा क्षेत्रीय सिंडिकेट है, जिसे तोड़ने के लिए केवल तकनीकी सर्विलांस नहीं बल्कि ज़मीनी स्तर पर सघन खुफिया तंत्र और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की सख्त जरूरत होगी।

Karan Malhotra@karan-malhotra·52 मिनट पहले

यह मामला केवल फर्जी दस्तावेजों से सिम जारी होने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बताता है कि कैसे स्थानीय पहचान का दुरुपयोग सीमा पार से होने वाले डिजिटल घुसपैठ के लिए किया जा रहा है। जांच एजेंसियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह पता लगाना होगी कि क्या इन नंबरों का इस्तेमाल केवल जासूसी के शुरुआती चरण के लिए हुआ या कोई सामरिक डेटा वास्तव में लीक हुआ है। इसके खुलासे के बाद टेलीकॉम केवाईसी नियमों और सीमावर्ती क्षेत्रों में एक्टिवेशन प्रक्रिया की सख्त समीक्षा अनिवार्य हो गई है।

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