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भीलवाड़ा के दूधाधारी मंदिर में 51 साल से चली आ रही मटकी फोड़ और मल्लखंभ की परंपराराजस्थान
6 सित॰ 2026, 11:46 pm (18 दिन पहले)· 2

भीलवाड़ा के दूधाधारी मंदिर में 51 साल से चली आ रही मटकी फोड़ और मल्लखंभ की परंपरा

भीलवाड़ा के सांगानेरी गेट स्थित श्री दूधाधारी गोपाल मंदिर में जन्माष्टमी के दूसरे दिन नंदोत्सव पर 51 साल पुरानी मटकी फोड़ और मल्लखंभ लीला का आयोजन हुआ, जिसे देखने बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे।

राजस्थान के भीलवाड़ा को मेवाड़ का प्रवेश द्वार और वस्त्र नगरी, दोनों कहा जाता है, और यहां कृष्ण जन्माष्टमी का उत्सव सिर्फ एक दिन में खत्म नहीं होता। जन्माष्टमी के दूसरे दिन शहर के सांगानेरी गेट स्थित ऐतिहासिक श्री दूधाधारी गोपाल मंदिर में नंदोत्सव मनाया जाता है, जिसमें पारंपरिक मटकी फोड़ लीला इस बार भी बड़ी धूमधाम से हुई। यह रस्म इस मंदिर में पिछले 51 वर्षों से लगातार निभाई जा रही है, और इसे देखने के लिए मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। उत्सव के दौरान दही हांडी लीला, बधाई गीत और मल्लखंभ का प्रदर्शन भी हुआ, जिसमें ग्वाल-बालों के वेश में युवाओं ने मटकी फोड़ लीला पेश कर माहौल को और रंगीन बना दिया।

51 साल पुरानी परंपरा और मंदिर की मान्यता

मंदिर के मुख्य पुजारी कल्याण शर्मा के मुताबिक, जन्माष्टमी के दूसरे दिन नंदोत्सव पर मटकी फोड़ और मल्लखंभ लीला आयोजित करने की रीत दशकों पुरानी है और इसे हर साल उतने ही उत्साह से निभाया जाता है। उन्होंने बताया कि मंदिर की परंपरा में नंदोत्सव को खास दर्जा हासिल है, और मटकी फोड़ के साथ मल्लखंभ जैसे आयोजन ही श्रद्धालुओं को सबसे ज्यादा खींचते हैं। हर बरस बड़ी तादाद में लोग इस नजारे के लिए यहां पहुंचते हैं। मंदिर परिसर में उस दिन भक्ति और उल्लास दोनों का माहौल दिखा, श्रद्धालुओं ने भगवान गोपाल के दर्शन कर जन्माष्टमी की खुशियां मनाईं। दूधाधारी गोपाल मंदिर में जन्माष्टमी और नंदोत्सव, दोनों ही निंबार्क परंपरा के मुताबिक मनाए जाते हैं।

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25 फीट के मल्लखंभ पर चढ़ने की चुनौती

पुजारी कल्याण शर्मा ने बताया कि इस प्रतियोगिता में ग्वाले के रूप में सजे युवा 25 फीट ऊंचे मल्लखंभ पर चढ़ने की कोशिश करते हैं, और इस खंभे पर पहले मुल्तानी मिट्टी और तेल लगाया जाता है ताकि यह फिसलनभरा हो जाए। इस दौरान खंभे से बंधे सिक्के, मेवा और दूसरी सामग्री लूटने की लीला भी होती है, और युवाओं को रोकने के लिए लगातार उन पर पानी की बौछार की जाती रहती है। यही चुनौती इस आयोजन को रोमांचक बनाती है और भीड़ को बांधे रखती है। अब यह सिर्फ धार्मिक रस्म नहीं बल्कि भीलवाड़ा के लोगों के लिए एक सांस्कृतिक विरासत बन चुका है, जिसे शहर के लोग हर साल गर्व से देखने आते हैं।

वृंदावन के प्रेम मंदिर की तर्ज पर बना है यह मंदिर

भीलवाड़ा के सांगानेरी गेट पर बना श्री दूधाधारी गोपाल मंदिर वृंदावन के प्रेम मंदिर की वास्तुकला से प्रेरित होकर बनाया गया है। यही वजह है कि यहां जन्माष्टमी भी एक दिन बाद मनाई जाती है, और उसी क्रम में अगले दिन नंद महोत्सव का आयोजन होता है। मंदिर की बनावट और उत्सव मनाने का तरीका वृंदावन जैसा ही रखा गया है, जिसकी वजह से भीलवाड़ावासियों के लिए यह मंदिर और भी खास जगह रखता है। मेवाड़ क्षेत्र से हर साल बड़ी संख्या में भक्त सिर्फ इस मंदिर के नंदोत्सव में शामिल होने के लिए भीलवाड़ा पहुंचते हैं, और मटकी फोड़ और मल्लखंभ की यह जोड़ी उनके लिए उत्सव का सबसे बड़ा आकर्षण बन चुकी है। पीढ़ी दर पीढ़ी निभाई जा रही यह रस्म अब भीलवाड़ा की पहचान का हिस्सा मानी जाती है।

सवाल-जवाब

नंदोत्सव कब मनाया जाता है?
जन्माष्टमी के दूसरे दिन दूधाधारी गोपाल मंदिर में नंदोत्सव मनाया जाता है।
मटकी फोड़ लीला की परंपरा कितने साल से चली आ रही है?
यह परंपरा पिछले 51 वर्षों से इस मंदिर में निभाई जा रही है।
मंदिर के मुख्य पुजारी कौन हैं?
श्री दूधाधारी गोपाल मंदिर के मुख्य पुजारी कल्याण शर्मा हैं।
मल्लखंभ कितना ऊंचा होता है और उसे कैसे तैयार किया जाता है?
मल्लखंभ 25 फीट ऊंचा होता है, जिस पर फिसलन के लिए मुल्तानी मिट्टी और तेल लगाया जाता है।
मंदिर कहां स्थित है?
श्री दूधाधारी गोपाल मंदिर भीलवाड़ा के सांगानेरी गेट पर स्थित है।
मंदिर की जन्माष्टमी और नंदोत्सव की परंपरा किस पर आधारित है?
यह आयोजन निंबार्क परंपरा के अनुसार किए जाते हैं और मंदिर वृंदावन के प्रेम मंदिर की तर्ज पर बना है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Sandeep Yadav@sandeep-yadav·18 दिन पहले

भीलवाड़ा के दूधाधारी मंदिर का 51 साल पुराना यह आयोजन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पारंपरिक खेलों और संस्कृति का अनूठा संगम है। 25 फीट ऊंचे और तेल-मुल्तानी मिट्टी से फिसलनभरे मल्लखंभ पर चढ़ने की यह चुनौती हमारे पारंपरिक एथलेटिक्स और शारीरिक कौशल की जीवंत मिसाल है, जो युवाओं में गजब का रोमांच और अनुशासन पैदा करती है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·18 दिन पहले

भीलवाड़ा के दूधाधारी गोपाल मंदिर की यह 51 साल पुरानी परंपरा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि क्षेत्रीय सांस्कृतिक और सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने का एक सशक्त माध्यम बन चुकी है। मल्लखंभ और मटकी फोड़ जैसी पारंपरिक क्रीड़ाएं स्थानीय युवाओं में अनुशासन और ऊर्जा का संचार करती हैं, साथ ही निंबार्क परंपरा की लोक-संस्कृति को भी जीवंत रखती हैं।

Ravikash Gupta@ravikash·18 दिन पहले

भीलवाड़ा वस्त्र नगरी के रूप में वैश्विक स्तर पर अपनी व्यावसायिक पहचान रखता है, लेकिन ऐसे सांस्कृतिक और पारंपरिक आयोजन स्थानीय आतिथ्य और पर्यटन अर्थव्यवस्था को नया प्रोत्साहन देते हैं। वृंदावन की वास्तुकला से प्रेरित इस मंदिर में उमड़ने वाली श्रद्धालुओं की भारी भीड़ यह सिद्ध करती है कि सांस्कृतिक धरोहरें किस प्रकार धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देकर क्षेत्रीय व्यापार और सामुदायिक सहभागिता को मजबूत करती हैं।

Karan Malhotra@karan-malhotra·18 दिन पहले

भीलवाड़ा के इस मंदिर में 25 फीट ऊंचे और तेल-मृदा से फिसलनभरे मल्लखंभ पर युवाओं की यह चुनौती केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारी भीड़ जुटने के कारण सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के लिहाज से भी एक संवेदनशील आयोजन है। ऐसे आयोजनों में जहां पानी की बौछार और पारंपरिक लूट होती है, वहां पुलिस और स्थानीय प्रशासन को भीड़ प्रबंधन और आपातकालीन सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम सुनिश्चित करने चाहिए ताकि किसी भी भगदड़ या दुर्घटना से बचा जा सके।

Rohan Verma@rohan-verma·18 दिन पहले

भीलवाड़ा के इस ऐतिहासिक मंदिर में 51 वर्षों से चली आ रही इस परंपरा में उमड़ने वाली भारी भीड़ और मल्लखंभ जैसे साहसिक खेलों को देखते हुए, स्थानीय प्रशासन और मंदिर समिति के बीच बेहतर तालमेल बेहद जरूरी है। फिसलनभरे खंभे और पानी की बौछार के बीच सुरक्षा के कड़े प्रबंध न केवल किसी भी संभावित हादसे को रोकेंगे, बल्कि इस सांस्कृतिक और धार्मिक आयोजन को सुचारू रूप से संपन्न कराने में भी मदद करेंगे।

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