कड़कड़डूमा कोर्ट ने शरजील इमाम को दी 7 दिन की अंतरिम जमानत, पारिवारिक विवाह में होंगे शामिलबैंक ऑफ इंग्लैंड की ब्याज दरों पर डॉयचे बैंक का नया अनुमान, दो बार 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी की संभावनागुवाहाटी में शोध उत्कृष्टता के लिए 80 संकाय सदस्यों और शोधार्थियों को मिले 67.48 लाख रुपये के पुरस्कारउत्तर रेलवे ने वैष्णो देवी कटरा और जम्मू रूट की 13 ट्रेनों का बदला शेड्यूल, जानें नई टाइमिंगउदयपुर नगर निगम में उप महापौर चुनाव: भाजपा के दिनेश भट्ट 56 वोटों के साथ विजयी, कांग्रेस प्रत्याशी को 24 मतपूर्वजों के तर्पण का महापर्व पितृपक्ष 2026: शनिवार से आगाज, जानें 15 या 16 दिनों की पूरी श्राद्ध तिथियांसड़क हादसों में होने वाली मौतों पर त्रिपुरा में लगी लगाम, सुशांत चौधरी ने साझा किए ताजा आंकड़ेब्रिटेन के बढ़ते कर्ज संकट और बैंक ऑफ इंग्लैंड के रुख से पाउंड पर दबाव, यूरो के मुकाबले सीमित दायरे में फंसा भावछोटे बच्चों को फलों का रस पिलाना कितना सुरक्षित, जानिए सही उम्र और 120 मिलीलीटर की सीमा का नियमतीनों सेनाओं का सुरक्षा कवच बनने चली त्रिशूल मिसाइल सेना की अग्रिम पंक्ति से बाहर क्यों हुई
तीनों सेनाओं का सुरक्षा कवच बनने चली त्रिशूल मिसाइल सेना की अग्रिम पंक्ति से बाहर क्यों हुईबिहार
22 सित॰ 2026, 6:42 pm (1 घंटे पहले)· 1

तीनों सेनाओं का सुरक्षा कवच बनने चली त्रिशूल मिसाइल सेना की अग्रिम पंक्ति से बाहर क्यों हुई

इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत विकसित त्रिशूल मिसाइल को समुद्र में सी-स्किमिंग लक्ष्यों को भेदने में तकनीकी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। 80 से अधिक परीक्षणों के बाद इसे एक्टिव वेपन सिस्टम के बजाय टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेटर घोषित किया गया।

भारतीय रक्षा अनुसंधान के इतिहास में साल 1983 एक युगांतरकारी मोड़ लेकर आया, जब डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के नेतृत्व में इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम की आधारशिला रखी गई। इस महत्वाकांक्षी मिशन के तहत पांच प्रमुख हथियारों के विकास का बीड़ा उठाया गया, जिनमें पृथ्वी, अग्नि, आकाश, नाग और त्रिशूल शामिल थे। भगवान शिव के अमोघ अस्त्र के नाम पर रखी गई त्रिशूल मिसाइल की संकल्पना एक ऐसे त्वरित रक्षा तंत्र के रूप में की गई थी जो थल सेना, नौसेना और वायुसेना तीनों के लिए एक अभेद्य ढाल साबित हो सके। वैज्ञानिकों का उद्देश्य एक ऐसा क्विक-रिएक्शन सरफेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम तैयार करना था, जो सीमा पर मंडराने वाले दुश्मन के लड़ाकू विमानों, हेलीकॉप्टरों और नीची उड़ान भरने वाली एंटी-शिप मिसाइलों को बेहद कम समय में हवा में ही नष्ट कर दे।

शुरुआती सफलता और तकनीकी क्षमताएं

त्रिशूल मिसाइल को कम दूरी और बेहद कम ऊंचाई पर उड़ने वाले लक्ष्यों को तेजी से गिराने के उद्देश्य से तैयार किया गया था। इस रक्षा प्रणाली की प्रारंभिक मारक क्षमता 9 से 12 किलोमीटर तय की गई थी, जबकि इसकी गति ध्वनि की रफ्तार से लगभग दोगुनी निर्धारित थी। इसका मुख्य कार्यक्षेत्र दुश्मन के आक्रामक जेट विमानों, अटैक हेलीकॉप्टरों और पानी की सतह के नजदीक उड़ने वाली मिसाइलों को ट्रैक करके तुरंत मार गिराना था। 5 जून 1989 को ओडिशा स्थित चांदीपुर के परीक्षण केंद्र से त्रिशूल ने अपनी पहली सफल उड़ान भरी। इस उड़ान में मिसाइल के सॉलिड प्रोपेलेंट इंजन ने सटीक प्रदर्शन किया और प्रणाली ने अपने डिकॉय लक्ष्य को सटीकता से भेद दिया। इस प्रारंभिक कामयाबी ने भारत को जमीन से हवा में मार करने वाली अत्याधुनिक मिसाइल तकनीक में महारत रखने वाले चुनिंदा वैश्विक देशों की कतार में ला खड़ा किया था।

ये भी पढ़ें

समुद्र की लहरों के बीच रडार की विफलता

जमीन और आसमान में शुरुआती क्षमताएं साबित करने के बाद त्रिशूल के सामने सबसे जटिल चुनौती नौसेना के कठोर मानकों पर खरा उतरने की थी। नौसेना को अपने युद्धपोतों की रक्षा के लिए एक ऐसे सटीक हथियार की जरूरत थी जो सी-स्किमिंग यानी समुद्र की सतह से महज कुछ मीटर की ऊंचाई पर उड़कर आने वाली खतरनाक क्रूज मिसाइलों को हवा में ही खाक कर सके। यहीं से परियोजना में गंभीर तकनीकी अड़चनों का सिलसिला आरंभ हुआ। समुद्र की अशांत लहरों से टकराकर रडार की किरणें बिखर जाती थीं, जिससे त्रिशूल का कमांड गाइडेंस सिस्टम पानी की सतह के करीब पहुंचते ही भ्रमित हो जाता था। नौसेना की कार्यप्रणाली में सेकंड के दसवें हिस्से में सटीक प्रतिक्रिया और अचूक निशाने की आवश्यकता थी, परंतु त्रिशूल का ट्रैकिंग रडार और गाइडेंस सॉफ्टवेयर समुद्री वातावरण में बार-बार विफल साबित हो रहे थे।

80 से अधिक परीक्षण और इजराइल से बराक-1 का सौदा

रक्षा वैज्ञानिकों ने इस गाइडेंस विफलता को दूर करने के लिए लगातार प्रयास किए। इस दौरान 80 से अधिक परीक्षण किए गए और मिसाइल के कई तकनीकी मॉडल्स बदले गए। थल सेना और वायुसेना के बुनियादी मानकों के अनुरूप प्रदर्शन करने के बावजूद त्रिशूल नौसेना के अत्यधिक संवेदनशील और सख्त परीक्षणों में वांछित सटीकता हासिल नहीं कर सका। दूसरी तरफ आईजीएमडीपी के तहत तैयार किए जा रहे अन्य हथियार, जैसे पृथ्वी और अग्नि, क्रमिक विकास के बाद सेनाओं के बेड़े में सफलतापूर्वक शामिल हो रहे थे। 1999 के कारगिल युद्ध के बाद नौसेना अपनी सुरक्षा प्राथमिकताओं और समुद्री तैयारियों में किसी भी प्रकार की देरी का जोखिम नहीं उठा सकती थी। स्वदेशी परियोजना में हो रहे तकनीकी विलंब को देखते हुए भारतीय नौसेना ने तत्काल समाधान के तौर पर इजराइल से बराक-1 मिसाइल प्रणाली खरीदने का निर्णय लिया, जिससे त्रिशूल के सक्रिय भविष्य को गहरा धक्का लगा।

एक्टिव हथियार से टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेटर में बदलाव

जैसे-जैसे समय बीता, तीनों सशस्त्र सेनाओं की आधुनिक परिचालन आवश्यकताएं त्रिशूल के तत्कालीन विकास स्तर से काफी आगे निकल चुकी थीं। दशकों तक खिंचते प्रोजेक्ट, बढ़ते वित्तीय बजट और सेनाओं के घटते रुझान को ध्यान में रखते हुए 2007-08 में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन और सरकार ने एक कड़ा प्रशासनिक फैसला लिया। त्रिशूल को अग्रिम पंक्ति के सक्रिय हथियार के रूप में सेना में तैनात करने के बजाय आधिकारिक तौर पर टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेटर का दर्जा दे दिया गया। इसका सीधा अर्थ यह था कि त्रिशूल युद्धपोतों या सीमा पर तैनात नहीं होगी, परंतु इसके अनुसंधान से प्राप्त तकनीकी ज्ञान, डाटा और प्रयोग आने वाले भविष्य के उन्नत रक्षा प्रोजेक्ट्स के लिए आधार का काम करेंगे।

भविष्य के रक्षा प्रोजेक्ट्स को मिला मजबूत आधार

सैन्य हथियारों के इतिहास में कई बार कोई विशेष प्रोजेक्ट सीधे मैदान में नहीं उतर पाता, लेकिन वह अगली पीढ़ी के उन्नत हथियारों के विकास की दिशा तय कर देता है। त्रिशूल परियोजना ने भारत के मिसाइल वैज्ञानिकों को बेहद मूल्यवान तकनीकी समझ प्रदान की। इसके लिए तैयार की गई सॉलिड रॉकेट मोटर्स ने देश को तीव्र गति से त्वरित होने वाली रैपिड एक्सेलरेशन तकनीक में दक्ष बनाया। समुद्र में परीक्षणों के दौरान सामने आई रडार और सॉफ्टवेयर की कमियों से सीख लेकर ही भारत ने अपने आधुनिक ट्रैकिंग रडार और क्लोज-इन वेपन सिस्टम विकसित किए। स्वदेशी आईजीएमडीपी और इजराइल के संयुक्त सहयोग से विकसित की गई बराक-8 मिसाइल प्रणाली की तकनीकी बुनियाद और प्रारंभिक सीख काफी हद तक त्रिशूल के परीक्षणों और प्रयोगशालाओं में ही तराशी गई थी।

सवाल-जवाब

त्रिशूल मिसाइल को किस बड़े रक्षा कार्यक्रम के तहत विकसित किया गया था?
त्रिशूल का विकास 1983 में डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के नेतृत्व में शुरू हुए इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत किया गया था।
त्रिशूल की मारक क्षमता और गति क्या थी?
प्रारंभिक दौर में त्रिशूल की मारक क्षमता 9 से 12 किलोमीटर और इसकी रफ्तार ध्वनि की गति से दोगुनी तय की गई थी।
त्रिशूल ने अपनी पहली सफल परीक्षण उड़ान कब भरी थी?
त्रिशूल मिसाइल ने 5 जून 1989 को चांदीपुर के परीक्षण केंद्र से अपनी पहली सफल उड़ान भरी थी।
त्रिशूल को नौसेना के मानकों पर खरा उतरने में क्या तकनीकी दिक्कत आई?
समुद्र की लहरों से टकराकर रडार किरणें बिखर जाती थीं, जिससे सी-स्किमिंग मिसाइलों को ट्रैक करने में इसका गाइडेंस सिस्टम भटक जाता था।
त्रिशूल में देरी के बाद भारतीय नौसेना ने कौन सी विदेशी मिसाइल खरीदी?
त्रिशूल के ट्रायल में हो रहे विलंब के चलते भारतीय नौसेना ने इजराइल से बराक-1 मिसाइल प्रणाली खरीदने का फैसला किया।
त्रिशूल को टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेटर कब और क्यों घोषित किया गया?
लगातार देरी, बजट वृद्धि और तकनीकी सीमाओं के चलते 2007-08 में डीआरडीओ और सरकार ने इसे टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेटर घोषित किया ताकि इसकी तकनीक भविष्य के प्रोजेक्ट्स में काम आ सके।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 4

Arjun Mehta@arjun-mehta·8 मिनट पहले

अस्सी से ज़्यादा टेस्ट फेल होना सिर्फ तकनीकी दिक्कत नहीं लगती, शायद शुरुआती प्लान में ही कहीं बड़ी चूक रही होगी।

Ravikash Gupta@ravikash·5 मिनट पहले

अर्जुन, बात तो सही है आपकी। अस्सी टेस्ट कम नहीं होते, शुरुआती डिज़ाइन में ही कुछ पक्का झोल रहा होगा जो बाद में पकड़ में आया।

Karan Malhotra@karan-malhotra·43 मिनट पहले

अस्सी से ज़्यादा टेस्ट फेल होना बताता है कि सिर्फ़ सपने देखने से हथियार नहीं बनते। नौसेना की ज़रूरतें अलग थीं और हम समय पर तकनीक नहीं दे पाए।

Rohan Verma@rohan-verma·42 मिनट पहले

करण भाई, बात तो सही है आपकी। मुझे वो दिन अच्छे से याद है जब चांदीपुर में इसके पहले सफल टेस्ट पर सब लोग कितना खुश हुए थे, लगा था कि बस अब समंदर की चुनौती भी पार हो जाएगी।

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp