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भीलवाड़ा के गुरला जैसा स्वाद बनाए रखने के लिए मानसून में अमरूद के बागों को सड़न और कीटों से कैसे बचाएंभारत
16 अग॰ 2026, 8:37 pm (10 घंटे पहले)· 1

भीलवाड़ा के गुरला जैसा स्वाद बनाए रखने के लिए मानसून में अमरूद के बागों को सड़न और कीटों से कैसे बचाएं

मानसून के दौरान अत्यधिक बारिश, नमी और जलभराव के कारण अमरूद की फसल में फफूंद, फल सड़न और जड़ सड़ांध का खतरा बढ़ जाता है, जिससे बचाव के लिए नियमित निगरानी और देसी उपाय बेहद जरूरी हैं।

राजस्थान का भीलवाड़ा जिला अपनी नवाचारी और आधुनिक खेती के लिए विशेष पहचान रखता है। यहां के गुरला क्षेत्र में पैदा होने वाले अमरूद अपने बेहतरीन स्वाद और गुणवत्ता के लिए काफी प्रसिद्ध हैं। हालांकि, मानसून का मौसम आते ही अमरूद के बागों पर कीटों और बीमारियों का प्रकोप तेजी से बढ़ने लगता है। लगातार हो रही बारिश, बागों में पानी के ठहराव और हवा में बढ़ी हुई नमी के कारण पेड़ों की जड़ों, हरी पत्तियों और पकते फलों पर बेहद प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। ऐसी स्थिति में फसल को भारी नुकसान से बचाने के लिए किसानों को शुरुआत से ही सतर्क रहकर नियमित देखभाल करने की आवश्यकता होती है।

अत्यधिक नमी से फलों में सड़न और फटने की समस्या

वातावरण में लगातार नमी का स्तर ऊंचा रहने से अमरूद के फलों में फफूंदजनित रोग और सड़न की गंभीर समस्या पैदा होने लगती है। संक्रमण फैलने पर फलों की बाहरी सतह पर भूरे तथा काले रंग के चकत्ते या धब्बे उभर आते हैं। देखते ही देखते ये संक्रमित फल तेजी से सड़कर खराब होने लगते हैं और पेड़ से गिरने लगते हैं। इसके अलावा, कई बार बारिश का दौर थमने के बाद जब अचानक तेज धूप निकलती है और मौसम साफ होता है, तो मिट्टी की नमी में एकदम से परिवर्तन आता है। इस अचानक बदलाव के कारण फल फटने की समस्या भी तेजी से सामने आती है।

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जलभराव से जड़ सड़न और पौधों के विकास में बाधा

अमरूद के बागों में ज्यादा समय तक बारिश का पानी जमा रहना पौधों के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक साबित होता है। खेत में जलभराव की स्थिति बनने से पेड़ों की जड़ों तक पर्याप्त ऑक्सीजन और हवा का संचार नहीं हो पाता, जिससे जड़ें सड़ने लगती हैं। जड़ों में नुकसान होने के कारण पौधों की पत्तियां पीली पड़कर गिरने लगती हैं और नए कल्लों तथा पौधों का स्वाभाविक विकास पूरी तरह रुक जाता है। इसका सीधा असर अमरूद के कुल उत्पादन और पैदावार पर पड़ता है। इसलिए बाग से जल निकासी के लिए मजबूत नालियां बनाना और उन्हें साफ रखना प्राथमिक कदम है।

नीम और स्वच्छता पर आधारित पारंपरिक देसी उपाय

शुरुआती चरण में बीमारियों को रोकने के लिए किसान पारंपरिक और प्राकृतिक तरीकों का सहारा ले सकते हैं। अमरूद के बागानों में नीम की पत्तियों के काढ़े अथवा नीम की खली का प्रयोग एक स्थापित देसी तरीका रहा है। नीम पर आधारित घोल का छिड़काव करने से हानिकारक कीटों की गतिविधियों को रोकने में मदद मिलती है। इसके साथ ही, बाग की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। जमीन पर गिरी हुई रोगग्रस्त पत्तियों और सड़ रहे संक्रमित फलों को बाग में पड़े रहने देने के बजाय एकत्र करके खेत की सीमा से दूर ले जाकर पूरी तरह नष्ट कर देना चाहिए।

छंटाई, फ्रूट फ्लाई ट्रैप और खरपतवार नियंत्रण

पेड़ों की हल्की और वैज्ञानिक तरीके से छंटाई करना भी बाग के स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होता है। घनी, सूखी और रोगग्रस्त शाखाओं को काट देने से बाग के भीतर धूप और ताजी हवा का आवागमन सुचारू रूप से होता है। इससे बारिश के बाद पत्तियों और फलों पर नमी ज्यादा देर तक नहीं टिक पाती और फफूंद का खतरा कम हो जाता है। इसके अलावा, फल मक्खी जैसे नुकसानदेह कीटों पर काबू पाने के लिए बाग में उपयुक्त ट्रैप लगाने चाहिए। समय-समय पर खरपतवार साफ करने से नमी छिपने की जगह खत्म होती है और कीटों का जमावड़ा रुकता है।

कृषि विशेषज्ञों की सलाह और समय पर प्रबंधन

मानसून के पूरे सीजन में अमरूद की खेती करने वाले किसानों के लिए जल निकासी, बाग की सफाई और निरंतर निरीक्षण सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। शुरुआती स्तर पर देसी और जैविक प्रबंधन सहायक हो सकते हैं, लेकिन यदि कीट या बीमारियों का संक्रमण बहुत अधिक बढ़ जाता है तो लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए। ऐसी स्थिति में तुरंत नजदीकी कृषि विभाग के अधिकारियों या कृषि विशेषज्ञों से संपर्क करके वैज्ञानिक सलाह लेनी चाहिए। समय पर सही उपचार मिलने से मानसून के दौरान होने वाले आर्थिक नुकसान से बचा जा सकता है।

सवाल-जवाब

भीलवाड़ा के गुरला क्षेत्र के अमरूद क्यों प्रसिद्ध हैं?
भीलवाड़ा जिले के गुरला क्षेत्र के अमरूद अपनी बेहतरीन मिठास, गुणवत्ता और विशेष स्वाद के कारण बाजारों में काफी प्रसिद्ध हैं।
मानसून में अमरूद के फलों पर काले और भूरे धब्बे क्यों बनते हैं?
मानसून के दौरान हवा में अत्यधिक नमी और फफूंदजनित रोगों के संक्रमण के कारण अमरूद के फलों पर काले या भूरे धब्बे पड़ जाते हैं और वे सड़ने लगते हैं।
अमरूद के बाग में पानी भरने से क्या नुकसान होता है?
पानी जमा रहने से पेड़ों की जड़ों को हवा नहीं मिल पाती, जिससे जड़ सड़न की समस्या होती है, पत्तियां पीली पड़ती हैं और पौधों का विकास रुक जाता है।
अमरूद की फसल को कीटों से बचाने के लिए कौन से देसी उपाय किए जा सकते हैं?
किसान नीम की पत्तियों या नीम की खली का प्रयोग कर सकते हैं, नीम का घोल छिड़क सकते हैं, और फल मक्खी से बचाव के लिए ट्रैप लगा सकते हैं।
अगर अमरूद के बाग में बीमारी का प्रकोप बहुत बढ़ जाए तो क्या करना चाहिए?
यदि बीमारी या कीट का प्रकोप अधिक हो, तो किसानों को तुरंत कृषि विभाग के अधिकारियों या कृषि विशेषज्ञों से सलाह लेकर उचित उपचार करना चाहिए।
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टिप्पणियाँ 5

Sandeep Yadav@sandeep-yadav·3 घंटे पहले

भीलवाड़ा के गुरला क्षेत्र के अमरूद अपनी विशिष्ट गुणवत्ता के लिए जाने जाते हैं, लेकिन मानसून के दौरान अत्यधिक नमी, जलभराव और कवक संक्रमण के कारण इस बागवानी फसल का उत्पादन प्रभावित होना चिंता का विषय है। यदि इस मौसम में जल निकासी, नीम आधारित जैविक उपायों और वैज्ञानिक छंटाई जैसी रणनीतियों का समय पर पालन नहीं किया गया, तो आने वाले महीनों में स्थानीय किसानों को गंभीर आर्थिक क्षति का सामना करना पड़ सकता है और बाजार में इस लोकप्रिय फल की उपलब्धता भी घट सकती है।

Ravikash Gupta@ravikash·4 घंटे पहले

भीलवाड़ा के गुरला क्षेत्र के अमरूद सिर्फ एक स्थानीय पहचान नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार हैं। मानसून में जलभराव और फफूंद से होने वाला नुकसान सीधे तौर पर किसानों की आय और कृषि आधारित आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित करता है। यदि समय रहते वैज्ञानिक छंटाई, जल निकासी और जैविक उपायों को नहीं अपनाया गया, तो स्थानीय फसल का उत्पादन गिर सकता है, जिसका असर बाजार में इनकी कीमतों और किसानों के मुनाफे पर पड़ना तय है।

Kavya Nair@kavya-nair·4 घंटे पहले

भीलवाड़ा के गुरला क्षेत्र के अमरूद सिर्फ एक कृषि उत्पाद नहीं हैं, बल्कि यह क्षेत्र की फूड टूरिज्म और एग्रो-टूरिज्म की संभावनाओं से भी जुड़े हैं। जब मानसून में बागों में फफूंद और जड़ सड़न जैसी समस्याएं आती हैं, तो यह सीधे तौर पर उन स्थानीय खाद्य अनुभवों और लाइफस्टाइल ट्रैवल को प्रभावित करता है जो देश-विदेश के पर्यटकों को ग्रामीण संस्कृति से जोड़ते हैं। यदि फसलों को इन प्राकृतिक आपदाओं से समय रहते नहीं बचाया गया, तो यह स्थानीय आजीविका के साथ-साथ कृषि-पर्यटन के उस अनूठे अनुभव को भी कम कर देगा, जिसके लिए यह क्षेत्र अपनी अनूठी पहचान रखता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·4 घंटे पहले

भीलवाड़ा के गुरला क्षेत्र के अमरूद बागों में मानसून के दौरान जलभराव और फफूंद जनित रोगों के कारण होने वाली फसल क्षति का सीधा असर स्थानीय अर्थव्यवस्था और कृषि बाजार पर पड़ता है। यदि समय पर उचित जल निकासी, नीम आधारित कीट नियंत्रण और बाग की स्वच्छता जैसे निवारक कदम नहीं उठाए गए, तो न केवल किसानों को भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ेगा, बल्कि इस प्रतिष्ठित फल की आपूर्ति श्रृंखला भी गंभीर रूप से प्रभावित होगी।

Arjun Mehta@arjun-mehta·4 घंटे पहले

यह स्पष्ट है कि गुरला के अमरूद सिर्फ एक कृषि उत्पाद नहीं बल्कि क्षेत्र की आर्थिक धुरी हैं। मानसून में जलभराव और फफूंद जनित रोगों से फसल का नष्ट होना कृषि आय को सीधे तौर पर प्रभावित करता है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था कमजोर होती है। ऐसे में आपूर्ति श्रृंखला को सुचारू रखने के लिए प्रशासनिक स्तर पर कृषि विस्तार सेवाओं को और अधिक सक्रिय करने की आवश्यकता है, ताकि किसानों को समय पर तकनीकी सहायता मिल सके।

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