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भीलवाड़ा के खेतों में तेजी से फैल रही गाजर घास, फसल उत्पादन 40 प्रतिशत तक घटने का मंडराया खतराराजस्थान
9 सित॰ 2026, 1:48 pm (16 दिन पहले)· 4

भीलवाड़ा के खेतों में तेजी से फैल रही गाजर घास, फसल उत्पादन 40 प्रतिशत तक घटने का मंडराया खतरा

भीलवाड़ा में गाजर घास का प्रकोप बढ़ने से फसलों की पैदावार 40 प्रतिशत तक घटने का अंदेशा है। यह खरपतवार इंसानों में एलर्जी और पशुओं के स्वास्थ्य के साथ दूध की गुणवत्ता को भी प्रभावित कर रही है।

भीलवाड़ा जिले के ग्रामीण और कृषि इलाकों में गाजर घास का प्रकोप तेजी से बढ़ रहा है, जिससे किसान काफी परेशान हैं। चटक चांदनी और सफेद टोपी के नाम से भी जानी जाने वाली यह विदेशी खरपतवार न केवल फसलों की पैदावार कम कर रही है, बल्कि मवेशियों और इंसानों के स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरा बनती जा रही है। खाली जमीनों, खेतों के किनारों और सड़कों के आसपास यह पौधा तेजी से अपने पैर पसार रहा है।

1955 में अमेरिका से भारत आई थी यह खरपतवार

यह खतरनाक पौधा भारत का मूल निवासी नहीं है। वर्ष 1955 में जब अमेरिका से गेहूं का आयात किया गया था, उसी खेप के साथ इस खरपतवार के बीज भारत पहुंचे थे। इसके बाद से यह पौधा पूरे देश के अलग-अलग राज्यों में फैल गया। एक अनुमान के अनुसार, वर्तमान में देश का लगभग 3.5 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र इस घास की चपेट में आ चुका है।

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बीजों का तेजी से फैलाव और छोटा जीवन चक्र

गाजर घास की सबसे बड़ी खासियत और समस्या इसका तेजी से होने वाला फैलाव है। इस पौधे का जीवन चक्र केवल तीन से चार महीने का होता है, लेकिन यह साल भर किसी भी मौसम में उगने की क्षमता रखता है। एक अकेला गाजर घास का पौधा लगभग 5 हजार से लेकर 25 हजार तक बेहद बारीक बीज पैदा करता है। ये बीज हवा के तेज झोंकों और बहते पानी के जरिए आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंच जाते हैं। इसी वजह से यदि किसी एक हिस्से में यह खरपतवार उग आती है, तो बहुत जल्द आसपास के पूरे इलाके में फैल जाती है।

फसलों की पैदावार में 40 प्रतिशत तक की गिरावट

कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, गाजर घास फसलों के उत्पादन पर बेहद बुरा असर डालती है। इस पौधे में सेस्क्युटरपिन लैक्टोन नाम का एक जहरीला रसायन पाया जाता है। यह केमिकल आसपास उगने वाली मुख्य फसलों की ग्रोथ को रोक देता है और उनकी जड़ों व पत्तियों के विकास को बाधित करता है। जिन खेतों में इस खरपतवार का प्रकोप अत्यधिक हो जाता है, वहां फसल उत्पादन में 40 प्रतिशत तक की भारी गिरावट दर्ज की जाती है। इससे किसानों को हर साल बड़ा आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता है।

इंसानों और पशुधन की सेहत पर पड़ रहा बुरा असर

यह खरपतवार केवल फसलों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इंसानों और मवेशियों की सेहत को भी नुकसान पहुंचाती है। जो लोग लगातार इसके संपर्क में आते हैं, उन्हें त्वचा पर एलर्जी, दाने, तेज बुखार और सांस लेने में तकलीफ जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इससे अस्थमा के मरीजों की परेशानी बढ़ सकती है। दूसरी ओर, यदि गाय, भैंस या अन्य पशु इसे चर लेते हैं, तो उनके पाचन तंत्र और स्वास्थ्य पर विपरीत असर पड़ता है। साथ ही दुधारू पशुओं के दूध का स्वाद कड़वा होने की शिकायत भी सामने आती है।

रोकथाम के जरूरी उपाय और जैविक नियंत्रण

गाजर घास के फैलाव को रोकने के लिए कृषि विशेषज्ञों ने समय रहते कदम उठाने की सलाह दी है। इसे रोकने का सबसे असरदार तरीका यह है कि पौधे में फूल आने से पहले ही इसे जड़ से उखाड़कर नष्ट कर दिया जाए। पौधे को उखाड़ते समय किसानों व आम लोगों को हाथों में दस्ताने और मुंह पर मास्क पहनना अनिवार्य है, ताकि इसके विषैले तत्वों से बचाव हो सके। उखाड़े गए पौधों का निस्तारण सुरक्षित तरीके से करना जरूरी है ताकि बीज दोबारा जमीन में न गिरें। इसके अलावा, कृषि विभाग जैविक नियंत्रण के तहत प्रभावित इलाकों में मैक्सिकन बीटल नामक मित्र कीट छोड़ने की सलाह देता है। यह कीट गाजर घास की पत्तियों को खाकर इसके विकास को रोक देता है, जिससे पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना इस पर काबू पाया जा सकता है।

सवाल-जवाब

गाजर घास की पहचान कैसे की जाती है और इसके अन्य नाम क्या हैं?
गाजर घास को स्थानीय भाषा में चटक चांदनी और सफेद टोपी भी कहा जाता है। यह सफेद फूलों वाली एक विदेशी खरपतवार है जो खेतों और खाली भूखंडों में तेजी से उगती है।
गाजर घास पहली बार भारत में कब और कैसे आई थी?
यह खरपतवार वर्ष 1955 में अमेरिका से आयात किए गए गेहूं के साथ भारत पहुंची थी। वर्तमान में यह देश के लगभग 3.5 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में फैल चुकी है।
गाजर घास से फसलों के उत्पादन पर कितना असर पड़ता है?
इस पौधे में सेस्क्युटरपिन लैक्टोन नामक विषैला रसायन होता है जो फसलों की बढ़वार रोकता है। अत्यधिक प्रकोप होने पर फसल उत्पादन में 40 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है।
गाजर घास से इंसानों और पशुओं के स्वास्थ्य को क्या नुकसान है?
इंसानों को त्वचा में एलर्जी, बुखार और अस्थमा जैसी सांस की समस्या हो सकती है। वहीं पशुओं के इसे खाने से उनका स्वास्थ्य बिगड़ता है और दूध का स्वाद कड़वा हो जाता है।
गाजर घास को नष्ट करने के लिए क्या उपाय अपनाने चाहिए?
इसे फूल आने से पहले ही दस्ताने और मास्क पहनकर जड़ से उखाड़ देना चाहिए। इसके अलावा, कृषि विभाग प्रभावित क्षेत्रों में मैक्सिकन बीटल कीट छोड़कर भी इसका जैविक नियंत्रण करता है।
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