पौराणिक और ऐतिहासिक विरासत के लिहाज से समृद्ध मेरठ में रामायण और महाभारत काल से जुड़े कई ऐसे स्थल हैं जिनकी गाथाएं आज भी लोकस्मृति में जीवित हैं। इसी सांस्कृतिक थाती को सुरक्षित रखने के मकसद से चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय परिसर के इतिहास विभाग ने एक विशेष परियोजना शुरू की है। इस अध्ययन के जरिए विभाग क्षेत्र की सदियों पुरानी मौखिक परंपराओं, लोकगाथाओं और किंवदंतियों को व्यवस्थित तरीके से दस्तावेजित करने की तैयारी कर रहा है, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपने प्राचीन इतिहास को समझ सकें।
लिखित अभिलेखों के साथ मौखिक इतिहास का संरक्षण जरूरी
इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. कृष्णकांत शर्मा के अनुसार, भारतीय संस्कृति में ज्ञान और स्मृतियों का प्रवाह हजारों वर्षों से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक मौखिक रूप में ही आगे बढ़ता रहा है। सामान्य तौर पर केवल लिखित दस्तावेजों को ही इतिहास का पक्का प्रमाण मान लिया जाता है, लेकिन समय के थपेड़ों और प्राकृतिक आपदाओं में लिखित सामग्री के नष्ट होने की संभावना हमेशा बनी रहती है। इसके विपरीत, जो स्मृतियां समाज की चेतना में बसी होती हैं और जो बातें बुजुर्गों से सुनकर अगली पीढ़ी तक पहुंचती हैं, वे भी ऐतिहासिक साक्ष्यों का एक मजबूत और प्रामाणिक आधार बनती हैं।
इसी दृष्टि को केंद्र में रखते हुए इतिहास विभाग की शोध टीम उन लोगों से प्रत्यक्ष संवाद करेगी जिनके पास विभिन्न ऐतिहासिक घटनाओं की स्मृतियां हैं या जिन्होंने अपने पूर्वजों से इन गाथाओं को सुना है। इन सभी साक्षात्कारों की बकायदा वीडियो रिकॉर्डिंग कराई जाएगी। इसके बाद विभिन्न ऐतिहासिक तथ्यों और संदर्भों का गहन विश्लेषण कर एक समग्र डॉक्यूमेंट्री फाइल तैयार की जाएगी, जिसका मुख्य लक्ष्य इन मौखिक विवरणों का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण करना है।
हस्तिनापुर की लोकस्मृतियों को प्रमाणित करने की योजना
वर्तमान समय में किसी भी ऐतिहासिक स्थल पर जाने पर वहां के स्थानीय निवासी ही बताते हैं कि संबंधित जगह पर कौन सी घटनाएं घटी थीं। उदाहरण के तौर पर हस्तिनापुर क्षेत्र में भ्रमण करने पर स्थानीय लोग आज भी बताते हैं कि पांडव किस स्थान पर पूजा-अर्चना करते थे, वे कहां स्नान करते थे और इस इलाके में उनके महल कहां स्थित थे। यह पूरी परंपरा सदियों से इसी रूप में निरंतर आगे बढ़ रही है।
आज जो व्यक्ति इन स्थलों के बारे में विवरण देता है, उसने यह जानकारी निश्चित रूप से अपने पूर्वजों से सुनी होती है और उन पूर्वजों ने भी इसे अपने बुजुर्गों से प्राप्त किया होता है। हजारों वर्षों से चले आ रहे इस सिलसिले को अब ओरल हिस्ट्री और पुरातात्विक सर्वेक्षण विधियों के समन्वय से प्रमाणित और संरक्षित किया जाएगा, जिससे लोककथाओं को शोध के दायरे में लाया जा सके।
मेरठ क्षेत्र में मौजूद हैं त्रेता और द्वापर युग के जीवंत साक्ष्य
महाभारत काल के संदर्भ में मेरठ का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। हस्तिनापुर में आज भी कई ऐसे प्राचीन महल और मंदिर विद्यमान हैं, जिनका सीधा संबंध महाभारत कालीन घटनाओं से माना जाता है। इसके अलावा मेरठ में गगोल तीर्थ स्थित है, जिसके बारे में उल्लेख मिलता है कि यह महर्षि विश्वामित्र की तपोस्थली रही है और भगवान श्री राम अपने भ्राता लक्ष्मण जी के साथ यहां पधारे थे।
इतना ही नहीं, कलयुग के आरंभ का केंद्र भी इसी क्षेत्र को माना जाता है, जिसका ऐतिहासिक विवरण किला परीक्षितगढ़ के रूप में दर्ज है। इतिहास विभाग की यह पहल आधुनिक युवाओं को अपनी जड़ों और गौरवशाली अतीत को ऐतिहासिक नजरिए से समझने में मदद करेगी। साथ ही यह परियोजना भविष्य में शोधार्थियों के लिए भी अध्ययन की नई राहें खोलेगी।



















