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दौसा निकाय चुनाव में चप्पल निशान पर मचा बवाल, निर्दलीय प्रत्याशियों ने जताई गहरी नाराजगीराजस्थान
4 सित॰ 2026, 4:59 pm (21 दिन पहले)· 3

दौसा निकाय चुनाव में चप्पल निशान पर मचा बवाल, निर्दलीय प्रत्याशियों ने जताई गहरी नाराजगी

दौसा में स्थानीय निकाय चुनाव के दौरान निर्दलीय प्रत्याशियों को चप्पल चुनाव चिन्ह मिलने पर भारी विरोध देखने को मिल रहा है। प्रत्याशियों का मानना है कि यह निशान अशुभ है और निर्वाचन आयोग की आवंटन प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं, जबकि प्रशासन ने नियमों के तहत कार्रवाई की बात कही है।

दौसा जिले में आगामी निकाय चुनाव को लेकर राजनीति गरमा गई है और चुनाव चिन्हों का आवंटन एक बड़े विवाद का कारण बन गया है। मैदान में उतरे कई निर्दलीय उम्मीदवारों ने उन्हें चप्पल का निशान मिलने पर कड़ा ऐतराज जताया है। इन प्रत्याशियों का तर्क है कि भारतीय समाज और चुनावी संस्कृति में इस चिन्ह को सकारात्मक या शुभ नहीं माना जाता है, जिसके कारण वे इसे बदलने की मांग कर रहे हैं। उनका यह भी कहना है कि निर्वाचन आयोग को ऐसे प्रतीकों को अपनी सूची में शामिल ही नहीं करना चाहिए था या कम से कम इसे इस तरह प्राथमिकता पर नहीं रखना चाहिए था।

अलमारी और चप्पल का क्रम बना विवाद की वजह

निर्दलीय उम्मीदवारों के अनुसार, निर्वाचन आयोग द्वारा जारी की गई चुनाव चिन्हों की सूची में अलमारी को पहले स्थान पर रखा गया है और ठीक उसके बाद यानी दूसरे स्थान पर चप्पल का निशान है। आवंटन प्रक्रिया के दौरान इसी क्रम का कड़ाई से पालन किए जाने के कारण ज्यादातर निर्दलीय उम्मीदवारों के हिस्से में चप्पल का निशान आ रहा है। चुनाव लड़ने वाले हर उम्मीदवार की यह चाहत होती है कि उसे जनता के बीच जाने के लिए एक ऐसा प्रतीक मिले जिसे वह अपनी जीत के लिए अनुकूल और शुभ माने। लेकिन जब कई लोगों को मजबूरी में यही निशान थमा दिया गया, तो उनके बीच नाराजगी स्वतः ही फूट पड़ी।

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प्रत्याशियों की मांग और प्रशासनिक नियम

नाराज प्रत्याशियों का साफ तौर पर कहना है कि यदि किसी भी उम्मीदवार ने अपनी पसंद के रूप में चप्पल का चयन नहीं किया है, तो उसे यह निशान जबरन नहीं दिया जाना चाहिए। उनका तर्क है कि आवंटन की यह मौजूदा व्यवस्था उम्मीदवारों के हितों के खिलाफ है। नामांकन दाखिल करते वक्त कई लोगों ने अपनी पसंद के अन्य विकल्प भी भरे थे, लेकिन क्रम संख्या के नियमों के कारण उन्हें वे चिन्ह नहीं मिल पाए। इस पूरी व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए उम्मीदवारों ने अधिकारियों से इस प्रक्रिया में बदलाव करने की गुहार लगाई है ताकि उनकी पसंद का ख्याल रखा जा सके।

रिटर्निंग अधिकारी ने स्थिति की स्पष्ट

इस पूरे मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए दौसा की रिटर्निंग अधिकारी संजू मीणा ने स्थिति को पूरी तरह स्पष्ट किया है। उनका कहना है कि चुनाव चिन्हों का यह आवंटन किसी भी स्तर पर मनमाने तरीके से नहीं किया जा रहा है, बल्कि यह पूरी प्रक्रिया राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से तय की गई आधिकारिक गाइडलाइन के मुताबिक ही संचालित हो रही है। नियमों के अनुसार चिन्हों का आवंटन एक तय क्रम संख्या के आधार पर ही किया जाना अनिवार्य होता है, जिससे किसी भी तरह के फेरबदल की गुंजाइश नहीं बचती है।

क्यों आ रहा है चप्पल का निशान

प्रशासन की ओर से यह भी जानकारी दी गई है कि कई उम्मीदवारों ने अपने नामांकन पत्रों में ऐसे प्रतीकों का जिक्र कर दिया था जो राज्य निर्वाचन आयोग की अधिकृत 40 चुनाव चिन्हों की सूची में शामिल ही नहीं थे। ऐसे अमान्य या गैर-सूचीबद्ध विकल्पों के आधार पर चुनाव चिन्ह देना तकनीकी रूप से संभव नहीं था। यही वजह है कि सूची के निर्धारित क्रम का पालन करते हुए पहले आवेदक को अलमारी और उसके ठीक बाद आने वाले आवेदक को चप्पल का निशान आवंटित किया जा रहा है। एक तरफ जहां उम्मीदवार इस व्यवस्था से असहज महसूस कर रहे हैं और विरोध दर्ज करा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रशासन आयोग के नियमों का हवाला देकर अपनी स्थिति साफ कर रहा है।

सवाल-जवाब

दौसा निकाय चुनाव में मुख्य विवाद किस बात को लेकर है?
निर्दलीय प्रत्याशियों को चुनाव चिन्ह के रूप में चप्पल मिलने के कारण यह विवाद खड़ा हुआ है, जिसे प्रत्याशी अपने लिए अशुभ मानते हैं।
चुनाव चिन्हों की सूची में चप्पल कौन से स्थान पर है?
निर्वाचन आयोग की सूची में अलमारी पहले नंबर पर और चप्पल दूसरे नंबर पर दी गई है।
प्रत्याशियों को चप्पल का निशान क्यों मिल रहा है?
सूची का क्रमवार पालन किए जाने और कुछ प्रत्याशियों द्वारा अमान्य चिन्ह भरने की वजह से उन्हें क्रम के अनुसार चप्पल आवंटित हो रही है।
इस मामले पर रिटर्निंग अधिकारी संजू मीणा ने क्या कहा है?
रिटर्निंग अधिकारी ने स्पष्ट किया है कि चुनाव चिन्ह पूरी तरह से राज्य निर्वाचन आयोग की तय गाइडलाइन और क्रम के अनुसार ही बांटे जा रहे हैं।
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टिप्पणियाँ 3

Rohan Verma@rohan-verma·20 दिन पहले

स्थानीय निकाय चुनावों में चुनाव चिन्हों का यह विवाद प्रशासनिक प्रक्रिया और मनोवैज्ञानिक कारकों के बीच के संघर्ष को उजागर करता है। जब निर्दलीय उम्मीदवार अमान्य विकल्प चुनते हैं और आयोग के निर्धारित क्रम के तहत चप्पल जैसे प्रतीकों का आवंटन होता है, तो जमीनी स्तर पर चुनावी गतिशीलता प्रभावित होती है। यदि इस तकनीकी उलझन का समय पर समाधान नहीं निकला, तो यह विवाद मतदान के दौरान उम्मीदवारों के प्रचार अभियान और मतदाताओं की मानसिक परसेप्शन पर दीर्घकालिक असर डाल सकता है।

Ravikash Gupta@ravikash·20 दिन पहले

यह प्रशासनिक विवाद केवल चुनाव चिन्ह तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्थानीय स्तर पर चुनाव प्रबंधन और डिजिटल साक्षरता की कमी को भी दर्शाता है। जब उम्मीदवार आयोग की अधिकृत सूची के बाहर के प्रतीक चुनते हैं और क्रमबद्ध आवंटन में उलझते हैं, तो यह पूरी प्रक्रिया की तकनीकी दक्षता पर सवाल खड़े करता है। इस तरह की अव्यवस्था से न केवल उम्मीदवारों का चुनाव प्रचार प्रभावित होता है, बल्कि जमीनी स्तर पर प्रशासनिक मशीनरी का समय भी ऐसे व्यर्थ के विवादों को सुलझाने में खर्च होता है, जिससे चुनावी प्रक्रिया की शुचिता पर असर पड़ता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·20 दिन पहले

दौसा निकाय चुनाव में चुनाव चिन्ह आवंटन को लेकर उपजा यह विवाद प्रशासनिक नियमों और स्थानीय मान्यताओं के बीच टकराव को दर्शाता है। राज्य निर्वाचन आयोग की निर्धारित सूची और क्रम संख्या के तहत होने वाली यह प्रक्रिया तकनीकी रूप से सही हो सकती है, लेकिन मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक पहलुओं की अनदेखी के कारण ज़मीनी स्तर पर विरोध बढ़ रहा है। यदि उम्मीदवारों की ओर से अमान्य विकल्पों के चयन की तकनीकी अड़चनों को समय रहते दूर नहीं किया गया, तो यह मामला कानूनी पचड़े या चुनावी बॉयकॉट जैसी प्रशासनिक चुनौतियों में बदल सकता है, जिससे मतदान प्रक्रिया की निष्पक्षता पर अनावश्यक सवाल खड़े हो सकते हैं।

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