धान की फसल देश के करोड़ों किसानों की आजीविका और खाद्य सुरक्षा की मुख्य रीढ़ मानी जाती है, परंतु जलवायु में आ रहे निरंतर बदलावों ने इस खेती पर संकट के बादल खड़े कर दिए हैं। अनियमित मानसून, बढ़ता तापमान और लंबे समय तक हवा में बनी रहने वाली नमी धान के खेतों में नए तरह के संक्रमणों को बुलावा दे रही है। इन दिनों धान की बालियों पर बैक्टीरियल पैनिकल ब्लाइट नाम की गंभीर बीमारी का साया मंडरा रहा है। इस संबंध में पूसा स्थित डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के पोस्ट ग्रेजुएट डिपार्टमेंट ऑफ प्लांट पैथोलॉजी एवं नेमेटोलॉजी के प्रोफेसर (डॉ.) एसके सिंह ने विस्तार से तकनीकी जानकारी साझा की है। उनके अनुसार, यह बीमारी सीधे धान की बालियों और बन रहे दानों को निशाना बनाती है, जिसके कारण दाने अंदर से भर ही नहीं पाते और पैदावार में भारी गिरावट देखने को मिलती है।
संक्रमण के पीछे का रोगाणु और इसके मुख्य लक्षण
यह घातक बीमारी मुख्य रूप से Burkholderia glumae नामक खतरनाक जीवाणु के कारण फैलती है। जब वातावरण अधिक गर्म और नम होता है, तब इस बैक्टीरिया की सक्रियता कई गुना बढ़ जाती है। फसल में इसके प्रत्यक्ष लक्षण मुख्यतः फूल आने और बालियों में दाना भरने के नाजुक दौर में उभरकर सामने आते हैं। इस रोग की चपेट में आई बालियों के दाने कभी पूरी तरह विकसित नहीं हो पाते। दाने वजन में हल्के, आकार में सिकुड़े हुए और हल्के भूरे रंग के दिखने लगते हैं। पूरी की पूरी बाली दूर से झुलसी हुई नजर आती है तथा दानों में बांझपन पैदा हो जाता है। कई स्थितियों में पौधे की पत्ती की म्यान पर भी भूरापन छा जाता है। अक्सर किसान इसे साधारण फफूंद जनित रोग समझकर भ्रमित हो जाते हैं, जिससे इसकी सही पहचान करना काफी कठिन हो जाता है।
बिहार, झारखंड और बंगाल में क्यों बढ़ा जोखिम?
इस जीवाणु की सबसे खतरनाक बात यह है कि यह टोक्सोफ्लेविन (Toxoflavin) नाम का एक जहरीला तत्व तैयार करता है, जो पौधे की जीवित कोशिकाओं को नष्ट कर देता है। इस रोग का फैलाव संक्रमित बीजों के अलावा बारिश की फुहारों और सिंचाई के पानी के जरिए एक खेत से दूसरे खेत में होता है। जब मौसम का तापमान 30 डिग्री सेल्सियस से ऊपर चला जाता है और नमी का स्तर 80 प्रतिशत से अधिक हो जाता है, तब इस जीवाणु के पनपने के लिए सबसे आदर्श स्थिति बन जाती है। खरीफ सीजन के दौरान बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के इलाकों में ठीक ऐसा ही मौसम बना रहता है। खेतों में अत्यधिक समय तक जलजमाव और नमी बने रहने से रोग तेजी से फैलता है। विभिन्न कृषि शोधों में यह बात सामने आई है कि इस बीमारी के चलते किसानों को 5 से लेकर 75 प्रतिशत तक उपज का सीधा नुकसान झेलना पड़ सकता है।
फसल को बचाने के सटीक उपाय और प्रबंधन
किसानों को अपनी फसल सुरक्षित रखने के लिए शुरुआत से ही प्रमाणित और रोगमुक्त बीजों का चयन करना चाहिए। बुवाई से पूर्व बीज शोधन करना अनिवार्य है ताकि शुरुआती संक्रमण को रोका जा सके। खेतों के भीतर उचित जल निकासी की पुख्ता व्यवस्था होनी चाहिए और यूरिया का जरूरत से ज्यादा छिड़काव करने से बचना चाहिए। फसल चक्र को अपनाना और संक्रमित पौधों को तुरंत खेत से बाहर निकालना बेहद जरूरी है। जैविक नियंत्रण के तौर पर Bacillus subtilis और Pseudomonas fluorescens जैसे मित्र जीवाणु इस रोग की रोकथाम में काफी असरदार साबित होते हैं। रासायनिक उपचार में तांबे पर आधारित दवाएं बीमारी को कुछ हद तक सीमित कर सकती हैं। हालांकि किसी भी एंटीबायोटिक का छिड़काव बिना विशेषज्ञ की राय के नहीं करना चाहिए। फूल निकलने के समय किसान अपने खेतों का लगातार निरीक्षण करते रहें और लक्षण दिखते ही फौरन नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विश्वविद्यालय से संपर्क साधें।





















