अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कृषि पैदावार और खाद्य वितरण तंत्र पर एक साथ कई गंभीर संकट गहराते जा रहे हैं। न्यूयॉर्क में स्थित एशिया सोसाइटी के एक मंच से बोलते हुए एस जयशंकर ने स्पष्ट किया कि आने वाले कुछ महीनों के भीतर पूरी दुनिया को अत्यंत गंभीर खाद्यान्न संकट का सामना करना पड़ सकता है। भू-राजनीतिक तनाव और पर्यावरणीय असंतुलन के मेल ने विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की चिंताओं को कई गुना बढ़ा दिया है।
वैश्विक खाद्य तंत्र पर चौतरफा मार
मौजूदा समय में दुनिया तीन बेहद तीव्र झटकों से जूझ रही है। एक तरफ यूक्रेन में लंबे समय से जारी सैन्य टकराव ने यूरोप और उसके सीमावर्ती क्षेत्रों से अनाज की आवाजाही को बाधित किया है, तो दूसरी तरफ पश्चिम एशिया का निरंतर गहराता तनाव व्यापारिक मार्गों पर जोखिम पैदा कर रहा है। इसके साथ ही प्रशांत महासागर से उठने वाला प्रचंड अल नीनो मौसमी चक्र को अस्त-व्यस्त कर रहा है। इन तीनों रुकावटों ने मिलकर उर्वरक और अनाज की अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति व्यवस्था की रीढ़ तोड़ दी है।
इन प्रत्यक्ष संकटों के अतिरिक्त एक मूक वित्तीय दबाव भी उभर रहा है। जब भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युद्ध और अस्थिरता का दायरा बढ़ता है, वैश्विक निवेशक अपनी पूंजी को विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं से सुरक्षित बाजारों की ओर स्थानांतरित कर लेते हैं। इस पूंजी पलायन के कारण ग्लोबल साउथ के देशों को एक साथ ऊर्जा, भोजन, उर्वरक और पूंजी की विकट कमी का सामना करना पड़ रहा है, जिसे समग्र आर्थिक सुरक्षा के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण दौर माना जा रहा है।
प्रशांत महासागर का रिकॉर्ड तोड़ मौसमी चक्र
जलवायु आकलन तंत्र के ताजा आंकड़े बेहद चिंताजनक रुझानों की ओर इशारा कर रहे हैं। अमेरिका के क्लाइमेट प्रेडिक्शन सेंटर द्वारा जुटाए गए ब्योरे के अनुसार अल नीनो का प्रभाव लगातार आक्रामक रुख अख्तियार कर रहा है। उत्तरी गोलार्ध के भीतर साल 2026-27 के शीतकालीन महीनों के दौरान इसके बेहद भयावह स्वरूप में तब्दील होने की 90 प्रतिशत से अधिक संभावना आंकी गई है। समुद्र के तापमान में होने वाली यह असामान्य वृद्धि वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण को उलट-पुलट करने में सक्षम है।
पूर्वी प्रशांत महासागरीय क्षेत्र में सतह का तापमान सामान्य मानकों की तुलना में 3.0 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज होने का अनुमान लगाया गया है। वैज्ञानिक विश्लेषणों के अनुसार अक्टूबर से दिसंबर के दौरान एक असाधारण मौसमी घटना घटने की 75 प्रतिशत संभावना है, जो संभवतः वर्ष 1950 के बाद के सभी ऐतिहासिक रिकॉर्ड ध्वस्त कर सकती है। यह असंतुलित परिस्थिति मार्च-मई 2027 तक खिंच सकती है, जिसका सबसे घातक प्रभाव खेती के पारंपरिक कैलेंडर पर पड़ेगा। यह मौसमी उथल-पुथल ठीक उस चरण में चरम पर होगी जब एशियाई इलाकों में शुष्क मौसम की फसलें पक रही होंगी, ऑस्ट्रेलिया में कटाई का दौर होगा और दक्षिणी अफ्रीकी क्षेत्रों में मक्के की बुवाई का चक्र प्रारंभ हो रहा होगा।
भारतीय कृषि और कमजोर मानसूनी बारिश की मार
घरेलू मोर्चे पर भारत पहले ही इस जलवायु परिवर्तन का सीधा प्रभाव अनुभव कर चुका है। हालिया मानसूनी दौर में देश भर में कुल मिलाकर केवल 759.4 मिलीमीटर वर्षा दर्ज की गई, जो दीर्घावधि औसत का मात्र 87 प्रतिशत बैठती है। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में यह आंकड़ा साल 1901 के बाद से 13वीं सबसे कम मानसूनी बारिश के रूप में सामने आया है, जबकि साल 2001 के बाद के कालखंड पर नजर डालें तो यह चौथा सबसे दुर्बल मानसून सिद्ध हुआ है।
बुवाई के महत्वपूर्ण चरण यानी जून के अकेले महीने में पूरे देश में केवल 99.5 मिमी पानी बरसा, जो सामान्य औसत के मुकाबले करीब 40 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्शाता है। इस वर्षा का वितरण भी बेहद असंतुलित रहा। देश के पूर्वी और पूर्वोत्तर राज्यों में सामान्य की तुलना में 26 प्रतिशत कम मेघ बरसे, जबकि दक्षिणी प्रायद्वीपीय भूभाग में वर्षा की कमी 24 प्रतिशत दर्ज की गई। मौसम विभाग द्वारा निर्धारित 36 उप-मंडलों में से 17 सब-डिवीजन में बारिश का गंभीर अभाव देखा गया है। इन विपरीत परिस्थितियों के मद्देनजर सरकार ने साल 2026-27 के वास्ते खाद्यान्न उत्पादन के आधिकारिक लक्ष्य को संशोधित कर घटा दिया है। अब पूरी दारोमदार रबी फसलों पर आ गई है, जिनकी सिंचाई काफी हद तक बड़े जलाशयों के बचे हुए जल स्तर पर आश्रित रहेगी।
अनाज भंडारों की स्थिति और चावल के दाम
एक सकारात्मक पहलू यह है कि देश की सार्वजनिक वितरण प्रणाली के पास अनाजों का एक ठोस सुरक्षा कवच तैयार है। पहली जुलाई की स्थिति के अनुसार फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के गोदामों में 40.31 मिलियन टन चावल का मजबूत स्टॉक मौजूद था। इसके अलावा धान का इतना विशाल भंडार उपलब्ध है जिससे अतिरिक्त 38.74 मिलियन टन चावल का उत्पादन आसानी से किया जा सकता है। फिर भी खुले बाजार का गणित सरकारी भंडारों से अलग व्यवहार कर रहा है।
सरकारी भंडारों में विपुल मात्रा होने के बावजूद खुदरा और थोक मंडियों में प्रीमियम चावल की कीमतों में लगातार तेजी देखी जा रही है। इसका मुख्य कारण यह है कि केंद्रीय पूल में रखा गया अधिकांश भंडार सामान्य किस्मों का है, जो प्राथमिक रूप से जन कल्याणकारी योजनाओं और रियायती राशन वितरण के लिए आरक्षित रहता है। वाणिज्यिक खुले बाजार में उच्च गुणवत्ता वाले चावल की सीमित आवक के कारण कीमतों पर दबाव बना हुआ है।
दक्षिण-पूर्व एशिया और अफ्रीकी महाद्वीप पर असर
अंतरराष्ट्रीय बाजार में दक्षिण-पूर्व एशिया के प्रमुख उत्पादक देश इस मौसमी आघात से बुरी तरह झुलस रहे हैं। व्यापारिक विश्लेषकों का आकलन है कि इस भूभाग में चावल का कुल उत्पादन 2 से 8 प्रतिशत तक नीचे लुढ़क सकता है। यदि यह गिरावट औसतन 5 प्रतिशत भी रहती है, तो यह घाटा थाईलैंड के पूरे वार्षिक निर्यात के समतुल्य होगा। थाईलैंड में जनवरी से अप्रैल के बीच सामान्य से 60 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई, जबकि कंबोडिया में एक लाख हेक्टेयर से अधिक धान के रकबे सूखे की चपेट में आ चुके हैं। दूसरी ओर, फिलीपींस इस पूरे परिदृश्य में सबसे संवेदनशील आयातक बनकर उभरा है, जहां स्थानीय उत्पादन में कमी के कारण विदेशी खरीद पर निर्भरता अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच सकती है।




















