उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के दुधवा टाइगर रिजर्व में वन्यजीव प्रेमियों के लिए एक बड़ी खुशखबरी सामने आई है। दुधवा नेशनल पार्क और किशनपुर वन्यजीव अभयारण्य के इलाके में पहली बार 'मोठ फ्लाई' नाम की दुर्लभ तितली प्रजाति दर्ज की गई है, जिसे वन विशेषज्ञ जंगल की बेहतर सेहत का प्रमाण बता रहे हैं।
पहले से समृद्ध रहा है दुधवा का जीव-जगत
दुधवा टाइगर रिजर्व यूं तो बाघ, गैंडा, हाथी, दलदली हिरण, बारहसिंगा, तेंदुआ, घड़ियाल और पक्षियों की सैकड़ों प्रजातियों के लिए पहले से मशहूर है। अब इस सूची में दुर्लभ मोठ फ्लाई तितली का नाम जुड़ने से यहां की जैव विविधता को एक नया और महत्वपूर्ण आयाम मिला है। वन महकमे के मुताबिक यह खोज सिर्फ दुधवा तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश के वन्यजीव संरक्षण कार्यक्रमों के लिहाज से भी बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।
तितलियों की मौजूदगी बताती है जंगल की सेहत
वन विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी इलाके में तितलियों का पाया जाना वहां के पारिस्थितिकी तंत्र के स्वस्थ होने की निशानी मानी जाती है। जिन जगहों पर तितलियां बड़ी तादाद में और अलग-अलग प्रजातियों में दिखती हैं, वहां का वातावरण साफ, प्राकृतिक और संतुलित समझा जाता है। इसी वजह से मोठ फ्लाई का मिलना दुधवा के लिए एक शुभ संकेत की तरह देखा जा रहा है, क्योंकि इतनी दुर्लभ प्रजाति तभी टिक पाती है जब वहां के पेड़-पौधे, नमी और जलस्रोत लंबे समय तक संतुलित बने रहें।
घने और नम जंगलों में ही मिलती है मोठ फ्लाई
मोठ फ्लाई बेहद कम नजर आने वाली प्रजाति है। इसका प्राकृतिक बसेरा घने जंगल, नमी वाले इलाके और तरह-तरह की वनस्पतियों से भरे स्थानों में होता है। दुधवा और किशनपुर का वातावरण इस प्रजाति के लिए पूरी तरह अनुकूल साबित हुआ है, यही वजह है कि लंबे इंतजार के बाद यहां इसे पहली बार दर्ज किया जा सका।
परागण में निभाती है अहम भूमिका
तितलियां सिर्फ खूबसूरती का प्रतीक नहीं होतीं, बल्कि पर्यावरण की सेहत मापने का एक जरूरी पैमाना भी होती हैं। ये परागण की प्रक्रिया में बड़ी भूमिका निभाती हैं और कई पेड़-पौधों का जीवन चक्र चलाए रखने में मदद करती हैं। किसी क्षेत्र में अगर तितलियों की किस्में बढ़ रही हैं, तो इसका मतलब है कि वहां की वनस्पति, जल स्रोत और प्राकृतिक हालात लगातार बेहतर हो रहे हैं। यानी मोठ फ्लाई जैसी दुर्लभ प्रजाति का मिलना सीधे तौर पर दुधवा के जंगल और उसके आसपास की परिस्थितिकी के मजबूत होने की तरफ इशारा करता है।
रात में सक्रिय रहती है मोठ, रोशनी की तरफ खिंचती है
आमतौर पर मोठ तितली रात के समय सक्रिय रहती है और इसके पंख रंग-बिरंगी तितलियों के मुकाबले फीके होते हैं। यह रोशनी की तरफ जल्दी आकर्षित हो जाती है। पेड़ों और झाड़ियों में रहने वाली यह मोठ पत्तों के पीछे अंडे देती है, जिससे इसकी मौजूदगी का पता लगाना आसान नहीं होता और यही वजह है कि इसे रिकॉर्ड करने में इतना वक्त लगा।
फूलों का रस है भोजन, चमगादड़-मेढ़क बनाते हैं शिकार
मोठ का रंग आमतौर पर काला, भूरा और सफेद होता है। फूलों से निकलने वाला मीठा रस इनका मुख्य आहार है। चमगादड़, मेढ़क और छिपकली इन्हें बड़े चाव से खाते हैं, जिससे यह जंगल की खाद्य श्रृंखला का भी अहम हिस्सा बन जाती हैं। दुधवा के डीडी जगदीश आर ने बताया कि देश में करीब 10 हजार और पूरी दुनिया में करीब एक लाख प्रजातियों की मोठ तितलियां पाई जाती हैं।
देश के सबसे अहम वन क्षेत्रों में शामिल है दुधवा
अपनी समृद्ध जैव विविधता, घने हरे-भरे जंगलों और अनुकूल प्राकृतिक आवास की वजह से दुधवा टाइगर रिजर्व देश के सबसे महत्वपूर्ण वन क्षेत्रों में गिना जाता है। यहां बाघ, तेंदुआ, हाथी और गैंडे जैसे बड़े वन्यजीवों के साथ-साथ बड़ी संख्या में कीट-पतंगे भी पाए जाते हैं। तितलियां, मोठ, मधुमक्खियां और दूसरे कीट इस पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का एक जरूरी हिस्सा माने जाते हैं, और मोठ फ्लाई जैसी दुर्लभ प्रजाति का यहां मिलना इस बात की तस्दीक करता है कि दुधवा का यह पारिस्थितिकी तंत्र आज भी उतना ही समृद्ध और सुरक्षित है।



















