कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सीधी अपील की कि वे अयोध्या के श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट से जुड़े चंदा घोटाले पर अपनी चुप्पी तोड़ें। रमेश ने इसे "चंदा चोरी, आस्था धोखा" करार देते हुए जवाबदेही तय करने की मांग की, ठीक उस दिन जब संसद का मानसून सत्र शुरू होने में महज एक दिन बचा था।
रमेश ने खरगे-गांधी के पत्र का किया समर्थन
रमेश ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर एक पोस्ट के जरिए पार्टी के वरिष्ठ नेताओं मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी की उस चिट्ठी का समर्थन किया, जो दोनों नेताओं ने उसी दिन कुछ घंटे पहले प्रधानमंत्री को भेजी थी। दोनों नेता प्रतिपक्ष के तौर पर उन्होंने मोदी से मांग की थी कि ट्रस्ट के पैसों के लेनदेन की स्वतंत्र और व्यापक जांच तुरंत बिठाई जाए। रमेश ने कहा कि यह बिल्कुल जायज है कि दोनों नेता प्रतिपक्ष ने अयोध्या के इस ट्रस्ट से जुड़े चंदा चोरी और आस्था के साथ हुए इस कथित धोखे पर सीधे प्रधानमंत्री को खत लिखा, क्योंकि मामला इतना गंभीर है कि इस पर सरकार के मुखिया को खुद जवाब देना चाहिए।
2020 की लोकसभा में दिए बयान का जिक्र
रमेश यहीं नहीं रुके। उन्होंने 5 फरवरी 2020 का एक वाकया याद दिलाया, जब मोदी लोकसभा में अपनी उन गिनी-चुनी मौजूदगी में से एक के दौरान इस ट्रस्ट के गठन का ऐलान करने पहुंचे थे। रमेश के मुताबिक उस दिन प्रधानमंत्री ने ट्रस्ट बनाने का पूरा श्रेय खुद लिया था, और अब उसी ट्रस्ट ने देश भर के करोड़ों श्रद्धालुओं के भरोसे को ठेस पहुंचाई है। इसी घटनाक्रम का हवाला देते हुए रमेश ने सोशल मीडिया पर मोदी को सीधी चुनौती दी, "प्रधानमंत्री, चुप्पी तोड़ो!" उनकी दलील साफ थी, जब प्रधानमंत्री संसद में ट्रस्ट बनाने का श्रेय लेने से पीछे नहीं हटे थे, तो अब जब ट्रस्ट के कामकाज पर सवाल उठ रहे हैं तो उन्हें चुप नहीं बैठना चाहिए।
खरगे-गांधी की चिट्ठी में क्या-क्या आरोप
रमेश की पोस्ट से कुछ घंटे पहले ही खरगे और गांधी की साझा चिट्ठी में कहीं ज्यादा तफसील से आरोप लगाए गए थे। चिट्ठी में कहा गया कि प्रधानमंत्री को इस बात की जानकारी थी कि श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट से हजारों करोड़ रुपये गायब हो चुके हैं, और जिन लाखों श्रद्धालुओं ने अपनी गाढ़ी कमाई आस्था और भरोसे के साथ दान की थी, वे खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।
चिट्ठी में यह भी बताया गया कि ट्रस्ट का गठन हुआ कैसे था। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर भले ही इसकी स्थापना संसद में घोषित की गई हो, लेकिन इसके हर सदस्य को सरकार ने अकेले ही चुना, इसमें कोई स्वतंत्र चयन प्रक्रिया शामिल नहीं थी। पत्र में आगे लिखा गया, "ट्रस्ट के बदनाम हो चुके पूर्व महासचिव आपके करीबी सहयोगी भी रहे हैं," यह इशारा चंपत राय की ओर है, जिन्होंने चंदे में हुई कथित हेराफेरी की जांच के बीच महासचिव पद से इस्तीफा दे दिया है। पत्र में यह भी कहा गया कि यह जगजाहिर है कि ट्रस्ट के सदस्यों का जुड़ाव आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद और उनसे जुड़े संगठनों से रहा है, जिससे दोनों नेताओं की यह दलील और मजबूत होती है कि ट्रस्ट कभी सत्ताधारी दल से पूरी तरह अलग नहीं रहा।
खरगे और गांधी ने कहा कि जिसे वे सरासर अपराध बता रहे हैं, उस पर प्रधानमंत्री की लगातार चुप्पी बर्दाश्त के काबिल नहीं है, और जवाबदेही तय करने के साथ-साथ गबन हुए पैसे की वसूली सुनिश्चित करना उन्हीं की जिम्मेदारी बनती है, क्योंकि ट्रस्ट बनाने में उनकी खुद की भूमिका रही है। दोनों नेताओं ने मांग की कि मंदिर में चढ़ने वाले नकदी, सोने और चांदी सहित हर तरह के चढ़ावे को शामिल करते हुए एक निष्पक्ष और गहन जांच तुरंत बिठाई जाए। साथ ही यह भी कहा कि जांच पूरी होने पर उसके नतीजे और ट्रस्ट का पूरा हिसाब-किताब जनता के सामने रखा जाए, ताकि हर आम श्रद्धालु को पता चल सके कि उसका दान आखिर कहां और कैसे खर्च हुआ। पत्र में यह भी कहा गया कि जो भी दोषी पाया जाए, चाहे उसका ओहदा या रसूख कुछ भी हो, उसे बख्शा नहीं जाना चाहिए। दोनों नेताओं ने आखिर में जोड़ा कि सरकार और ट्रस्ट, दोनों की साख अब पूरी तरह इस बात पर टिकी है कि प्रधानमंत्री कितनी पारदर्शिता और कितनी तेजी से कदम उठाते हैं।
यह चिट्ठी संसद के मानसून सत्र से ठीक एक दिन पहले सामने आई है, जो 20 जुलाई से शुरू हो रहा है और जिसमें कांग्रेस के राम मंदिर चंदा विवाद को सदन में जोर-शोर से उठाने की पूरी संभावना है।
गिरफ्तारियों का सिलसिला जारी
दिल्ली में जहां यह सियासी बहस चल रही थी, वहीं अयोध्या में जमीनी जांच भी लगातार आगे बढ़ रही थी। स्थानीय अदालत ने शुक्रवार को रामशंकर यादव, जिन्हें तिन्नू यादव के नाम से भी जाना जाता है, और मनीष यादव को 39 घंटे की पुलिस हिरासत में भेजने की मंजूरी दी। यह आदेश तब आया जब अयोध्या पुलिस ने उसी दिन पहले अदालत से इन दोनों आरोपियों की पूरे सात दिन की रिमांड मांगी थी, जिससे साफ है कि जांच एजेंसियों को लगता है कि इन दोनों के पास पैसा कहां गया, इसकी अहम जानकारी हो सकती है।
इससे पहले दो और आरोपियों को इसी तरह की प्रक्रिया से गुजरना पड़ा था। सुभाष चंद्र श्रीवास्तव, जो एक सेवानिवृत्त बैंककर्मी हैं और मंदिर में चढ़ावे की गिनती की निगरानी किया करते थे, और रामाशंकर मिश्रा को बुधवार को अयोध्या की जिला जेल से बाहर लाया गया। अदालत ने पुलिस को इन दोनों से पूछताछ के लिए चौदह घंटे का समय दिया था, जिसका इस्तेमाल कर पुलिस ने पूरे दिन इनसे पूछताछ की ताकि यह पता लगाया जा सके कि मंदिर के लिए आए चंदे में आखिर हेराफेरी कैसे हुई।
एसआईटी की शुरुआती जांच में क्या मिला
चंदे में हुई कथित हेराफेरी ने उत्तर प्रदेश में जबरदस्त सियासी हलचल मचा दी है, जिसके चलते राज्य में गड़बड़ियों की जांच के लिए एक विशेष जांच दल यानी एसआईटी बनाई गई है। एसआईटी की अभी शुरुआती रिपोर्ट में सामने आया है कि 27 अप्रैल से 5 जून 2026 के बीच सीसीटीवी कैमरों में करीब 70 ऐसी घटनाएं दर्ज हुईं जो संदेह पैदा करती हैं, और फुटेज में गिनती करने वाले कर्मचारी नकदी के बंडल छिपाते हुए नजर आए।
इन घटनाओं के अलावा शुरुआती रिपोर्ट ने कुछ बड़ी खामियों की तरफ भी इशारा किया है, जिनकी वजह से जांचकर्ताओं के मुताबिक यह कथित चोरी मुमकिन हो सकी। इनमें कर्मचारियों की आने-जाने के वक्त कोई तलाशी न होना, उनके निजी सामान पर ढीली निगरानी और अलग-अलग दान पेटियों से आई नकदी को एक साथ मिलाकर गिनने की आदत शामिल है, जिससे किसी एक जगह से हुई गड़बड़ी को पकड़ पाना मुश्किल हो जाता था। अब तक जांच में औपचारिक रूप से शुरू होने से पहले ही कुछ कर्मचारियों से करीब 78.94 लाख रुपये बरामद किए जा चुके हैं। इसके अलावा जांचकर्ताओं का कहना है कि गिनती वाले कमरे के पास बने एक बाथरूम से 4 जून 2026 को अतिरिक्त 2.25 लाख रुपये भी मिले, जिसने इस पहले से ही उलझे मामले में एक और चौंकाने वाला मोड़ जोड़ दिया।




















