गांधी जयंती के पावन अवसर पर देश के दो प्रमुख महानगरों में चुनावी व्यवस्था की निष्पक्षता को लेकर तीखा टकराव सामने आया। निर्वाचन सदन के शीर्ष अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए राजधानी की प्रमुख राजनीतिक ताकतों और महाराष्ट्र के प्रदर्शनकारियों ने एक साथ आवाज बुलंद की। मतदाता सूचियों में कथित हेराफेरी तथा एसआईआर की प्रक्रिया में पारदर्शिता के अभाव का मुद्दा उठाते हुए सड़कों पर उतरे लोगों ने चुनाव निकाय के नेतृत्व पर सीधा निशाना साधा। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए दोनों महानगरों में व्यापक पुलिस बल तैनात किया गया, जहां दर्जनों प्रमुख चेहरों के साथ भारी संख्या में कार्यकर्ताओं को रोककर हिरासत में भेज दिया गया।
जंतर-मंतर पर टकराव और बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां
राजधानी के ऐतिहासिक धरना स्थल पर सुबह से ही तनाव की स्थिति बनी रही, जहां बैरिकेड्स लगाकर प्रदर्शनकारियों को आगे बढ़ने से रोका गया। इस दौरान सुरक्षाबलों और प्रदर्शन में शामिल नेताओं के मध्य तीखी बहस और धक्का-मुक्की की नौबत आ गई। संसद के उच्च सदन के सदस्य संजय सिंह, पूर्व मुख्यमंत्री आतिशी, संगठन के प्रांतीय प्रमुख सौरभ भारद्वाज के साथ अनुराग ढांडा और संजीव झा जैसे चर्चित चेहरों को पुलिस वाहनों में बैठाकर ले जाया गया। आंदोलनकारियों का स्पष्ट कहना था कि स्वतंत्र और निष्पक्ष मतदान नागरिकों का बुनियादी अधिकार है, जिससे किसी भी सूरत में समझौता नहीं किया जा सकता। हिरासत में भेजे जाने के बाद भी पार्टी नेताओं ने अपने रुख पर अड़े रहने और नागरिकों के मताधिकार की रक्षा के लिए संघर्ष को और तेज करने का संकल्प दोहराया।
शिवाजी पार्क में उमड़ा जनसैलाब और जेल भरो आह्वान
उधर देश की आर्थिक राजधानी में शिवाजी पार्क का मैदान भी चुनावी सुधारों की मांग का गवाह बना। प्रशासन की तरफ से औपचारिक मंजूरी न दिए जाने के बावजूद कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के आह्वान पर लोग भारी तादाद में एकत्र हुए और पूर्व निर्धारित सत्याग्रह के तहत खुद गिरफ्तारियां देने की घोषणा की। इस जुटान की सबसे उल्लेखनीय तस्वीर यह थी कि इसमें केवल दलीय कार्यकर्ता ही मौजूद नहीं थे, बल्कि सामान्य गृहस्थ, महिलाएं और बच्चे भी हाथों में राष्ट्रध्वज थामे दिखाई दिए। पुणे समेत राज्य के विभिन्न जनपदों से यात्रा करके आए आम नागरिकों ने कहा कि यह मुकाबला सत्ता की राजनीति का नहीं बल्कि देश के लोकतांत्रिक ढांचे को बचाने की लड़ाई है।
संवैधानिक संस्थाओं की साख और जनता का भरोसा
दोनों महानगरों में उभरे इस जनाक्रोश ने एक बुनियादी विमर्श को जन्म दे दिया है कि सार्वजनिक संस्थाओं की विश्वसनीयता सवालों के घेरे में क्यों आ रही है। आंदोलन में भाग ले रहे पक्षों का दृढ़ मत है कि मतदाता पहचान और सूचियों से संबंधित प्रत्येक प्रक्रिया जनता के सामने पूरी तरह स्पष्ट होनी चाहिए। यदि नागरिकों के मन में अपनी वोटिंग व्यवस्था को लेकर संदेह पैदा होता है, तो केवल सुरक्षा घेरे और प्रशासनिक सख्ती से उसे दूर नहीं किया जा सकता। किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र में संवैधानिक पदों की असली ताकत जनता के अटूट विश्वास से तय होती है, और उस विश्वास को बनाए रखने के लिए खुली जवाबदेही आवश्यक है।














