सार्वजनिक परिवहन नेटवर्क पर बढ़ते वित्तीय तनाव के बीच कर्नाटक में यात्रियों को बहुत जल्द अपनी दैनिक आवाजाही के लिए अधिक भुगतान करना पड़ सकता है। राज्य के भीतर सार्वजनिक बस सेवाएं देने वाली चार मुख्य परिवहन संस्थाओं की संचयी देनदारियां 8,095 करोड़ रुपये से अधिक के स्तर पर पहुंच गई हैं। दिन-प्रतिदिन के संचालन को बनाए रखने और गंभीर नकदी कमी से निपटने के उद्देश्य से प्रशासन बस टिकटों की कीमतों में संशोधन करने की दिशा में तेजी से कदम उठा रहा है। इस संबंध में सेवा-निवृत्त प्रशासनिक अधिकारी अतुल तिवारी के नेतृत्व वाला एक विशेष आयोग वर्तमान में चारों निकायों की बैलेंस शीट, ईंधन व्यय और परिचालन संबंधी कमियों का विस्तृत ब्योरा तैयार कर रहा है। जैसे ही यह समीक्षा रिपोर्ट प्रशासन को सौंपी जाएगी, इसे अंतिम मंजूरी के लिए राज्य मंत्रिमंडल के समक्ष विचारार्थ रखा जाएगा। इस नीतिगत निर्णय को हरी झंडी मिलने के बाद राज्य भर में नियमित बस मुसाफिरों पर सीधा आर्थिक बोझ पड़ेगा।
राजकोषीय अंतर और शक्ति योजना का गहराता प्रभाव
राज्य के परिवहन मंत्री बायरती सुरेश ने वर्तमान हालात पर चिंता जाहिर करते हुए स्पष्ट किया है कि कंपनियों की माली हालत इतनी बिगड़ चुकी है कि सामान्य परिचालन व्यय जुटाना भी कठिन हो गया है। इस पूरे दबाव की एक प्रमुख कड़ी महिलाओं के लिए शुरू की गई कल्याणकारी मुफ्त सफर व्यवस्था से जुड़ी है। शक्ति योजना के प्रावधानों के अंतर्गत कर्नाटक की अधिवासी महिलाओं को राज्य की साधारण सरकारी बसों में बिना कोई किराया दिए आवागमन की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है। आंकड़ों के अनुसार 11 जून 2023 को इस व्यवस्था की शुरुआत होने के बाद से लेकर अब तक चारों सार्वजनिक ट्रांसपोर्टर गैर-भुगतान वाली यात्राओं पर 22,230 करोड़ रुपये खर्च कर चुके हैं।
समस्या की मुख्य वजह यह है कि इस भारी खर्च के मुकाबले सरकारी खजाने से अब तक केवल 15,305 करोड़ रुपये ही जारी किए गए हैं। परिणामस्वरूप 5,648 करोड़ रुपये की पुनर्भुगतान राशि अभी भी राज्य स्तर पर अटकी पड़ी है। प्रतिपूर्ति में हो रहे इस लंबे विलंब ने परिवहन संस्थाओं के कार्यशील पूंजी चक्र को पूरी तरह बाधित कर दिया है, जिससे हर माह अपने कार्यबल के वेतन भुगतान और बुनियादी कल-पुर्जों के रख-रखाव को पूरा करना भारी चुनौती बनता जा रहा है।
चारों सार्वजनिक निगमों का कर्ज विवरण और संचालन संबंधी अड़चनें
मौजूदा समय में कर्नाटक का पूरा सरकारी सड़क परिवहन तंत्र चार अलग-अलग निगमों के माध्यम से संचालित होता है। इनमें केएसआरटीसी, बीएमटीसी, एनडब्ल्यूकेआरटीसी तथा केकेआरटीसी शामिल हैं। इन चारों संस्थाओं की संचयी देनदारी का आंकड़ा उछलकर 8,095 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। ईंधन के लगातार बढ़ते बिल और बसों की मेंटेनेंस से जुड़ी बकाया देनदारियों ने इनके वार्षिक बजट को भारी नुकसान पहुंचाया है।
मौजूदा वित्तीय घाटे के संदर्भ में परिवहन मंत्री बायरती सुरेश ने केंद्र सरकार की ईंधन मूल्य नीतियों को जिम्मेदार ठहराया है। उनका तर्क है कि केंद्रीय नीतियों के तहत पेट्रोलियम उत्पादों के दामों में हुई लगातार वृद्धि ने परिवहन निगमों की लागत को काफी बढ़ा दिया है। वहीं दूसरी ओर, चारों संस्थाओं के प्रबंधकीय अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि सरकारी बकाया का समय पर निपटान नहीं किया गया या फिर यात्री किराए में समायोजन की अनुमति नहीं मिली, तो बहुत जल्द बस सेवाओं का नियमित संचालन ठप होने की नौबत आ सकती है।
अतुल तिवारी आयोग के सुझाव और संभावित किराया बढ़ोतरी
गंभीर होते नकदी संकट के स्थायी समाधान हेतु गठित अतुल तिवारी कमेटी चारों निगमों के लेखा-जोखा, परिचालन लागत और घाटे के कारणों का परीक्षण कर रही है। आयोग की यह रिपोर्ट राज्य सरकार को शीघ्र सौंपी जाने वाली है, जिसमें यात्री भाड़े में वृद्धि का प्रतिशत तय करने के साथ-साथ आवश्यक ढांचागत सुधारों की सिफारिश की जाएगी। इस मसौदे के प्राप्त होते ही मुख्यमंत्री और उनके कैबिनेट सहयोगी इस बात का फैसला करेंगे कि घाटे का कितना हिस्सा आम मुसाफिरों की जेब पर डाला जाए।
कर्नाटक में यात्रियों के लिए बस दरों में बढ़ोतरी का यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले जनवरी 2025 में भी सरकार ने चारों संस्थाओं के किराए में 15 फीसदी तक की वृद्धि की थी। उस समय भी प्रशासन ने ईंधन की लागत और कर्मियों के वेतन में हुए इजाफे को बढ़ोतरी का मुख्य आधार बताया था। इसके पूर्व वर्ष 2020 में भी 12 फीसदी की भाड़ा वृद्धि लागू की गई थी, यद्यपि उस संशोधन में बीएमटीसी को बढ़ोतरी के दायरे से बाहर रखा गया था।
स्मार्ट कार्ड पहल और नई इलेक्ट्रिक बसों से बढ़ता वित्तीय भार
पुराने कर्ज और देनदारियों के साथ-साथ नए कार्यक्रमों की लागत ने भी संस्थाओं की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। राज्य प्रशासन शक्ति योजना के लाभार्थियों के लिए लगभग एक करोड़ मुफ्त स्मार्ट कार्ड वितरित करने की योजना पर काम कर रहा है। इस पहल के शुरुआती चरण में 250 करोड़ रुपये का परिव्यय अनुमानित है, जिसमें से 150 करोड़ रुपये राज्य बजट से दिए जाएंगे, जबकि शेष 100 करोड़ रुपये का भार चारों परिवहन निगमों को अपने स्तर पर वहन करना होगा।
इसके अलावा राज्य के बस टर्मिनलों का आधुनिकीकरण करने तथा नए बस डिपो स्थापित करने के उद्देश्य से केंद्र सरकार से 2,000 करोड़ रुपये का ऋण लिया जा रहा है। साथ ही राजधानी बेंगलुरु में बीएमटीसी के बेड़े को आधुनिक बनाने के लिए पीएम ई-ड्राइव के तहत 4,500 नई इलेक्ट्रिक बसें जोड़ी जा रही हैं। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के संचालन हेतु प्रतिवर्ष लगभग 600 करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी, और अगले 20 वर्षों की अवधि में इस परियोजना पर कुल व्यय लगभग 12,000 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है।
आम मुसाफिरों के घरेलू बजट पर पड़ने वाले प्रभाव
लगातार खाली होते खजाने और चढ़ते खर्चों के बीच यात्रियों के सामने सबसे बड़ी चिंता यह है कि टिकट दरों में वृद्धि लगभग अपरिहार्य दिख रही है। कल्याणकारी योजनाओं को बिना रुकावट जारी रखने के लिए भाड़े में बढ़ोतरी को एक सीधे समाधान के रूप में देखा जा रहा है। कैबिनेट स्तर पर दर वृद्धि का प्रस्ताव पारित होते ही कार्यालय जाने वाले कर्मचारियों, स्कूली व कॉलेज छात्रों और दैनिक यात्रियों के मासिक खर्च में खासी बढ़ोतरी होगी। आने वाली कैबिनेट बैठक में यह तय होगा कि सरकार इस भारी वित्तीय घाटे को अपने बजट से पाटेगी या फिर इसकी भरपाई जनता से करेगी।



















