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हल्द्वानी में मल्लिकार्जुन खरगे की रैली के बाद कथित शुद्धीकरण का विवाद पहुंचा उत्तराखंड हाई कोर्टभारत
4 सित॰ 2026, 12:05 am (18 दिन पहले)· 9

हल्द्वानी में मल्लिकार्जुन खरगे की रैली के बाद कथित शुद्धीकरण का विवाद पहुंचा उत्तराखंड हाई कोर्ट

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की हल्द्वानी जनसभा के बाद रामलीला मैदान में हुए कथित शुद्धीकरण अनुष्ठान का मामला उत्तराखंड हाई कोर्ट पहुंच गया है। इस जनहित याचिका पर 7 सितंबर को सुनवाई संभावित है, जबकि खरगे ने भी इस घटना को लेकर केंद्रीय मंत्रियों और उच्च स्तर पर पत्र लिखा है।

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की एक जनसभा के समापन के बाद हल्द्वानी के रामलीला मैदान में कथित तौर पर किए गए 'शुद्धीकरण' का विवाद अब कानूनी मोड़ पर पहुंच चुका है। इस पूरे प्रकरण को लेकर उत्तराखंड हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल की गई है। देहरादून के एक सामाजिक कार्यकर्ता बैजनाथ की ओर से यह याचिका दायर की गई है, जिसमें इस घटना पर गहरी चिंता जताते हुए इससे जुड़े तमाम इलेक्ट्रॉनिक और दस्तावेजी साक्ष्यों को सुरक्षित रखने की गुहार लगाई गई है।

7 सितंबर को होगी सुनवाई

अदालत में दायर इस याचिका पर आगामी 7 सितंबर को सुनवाई हो सकती है। याचिका में विस्तार से बताया गया है कि हल्द्वानी स्थित रामलीला मैदान में मल्लिकार्जुन खरगे की रैली संपन्न होने के तुरंत बाद, उसी स्थल पर वैदिक मंत्रोच्चार के बीच गंगाजल का छिड़काव किया गया और कथित रूप से 'शुद्धीकरण' का अनुष्ठान पूरा किया गया। याचिकाकर्ता का मानना है कि खुले सार्वजनिक स्थल पर इस प्रकार की गतिविधियां समाज में तनाव और अशांति का माहौल पैदा कर सकती हैं।

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साक्ष्यों को संरक्षित रखने का आग्रह

याचिकाकर्ता की मुख्य मांग है कि अदालत इस घटना से जुड़े सभी प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक और दस्तावेज़ी सबूतों को सुरक्षित रखने के लिए कड़े निर्देश जारी करे। इसमें मुख्य रूप से जनसभा की संपूर्ण वीडियो रिकॉर्डिंग, कार्यक्रम समाप्त होने के बाद आयोजन स्थल पर हुई हरकतों की फुटेज, और उस क्षेत्र तथा उसके आसपास लगे तमाम सीसीटीवी कैमरों की रिकॉर्डिंग को सुरक्षित रखने की बात कही गई है ताकि सच्चाई सामने आ सके।

सूचना का अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी

इस पूरे मामले की तह तक जाने और वास्तविक परिस्थितियों का पता लगाने के लिए सूचना का अधिकार यानी RTI कानून का भी सहारा लिया गया है। याचिकाकर्ता के अनुसार, इस कथित अनुष्ठान से जुड़ी संपूर्ण तथ्यात्मक जानकारी प्राप्त करने के लिए आरटीआई के माध्यम से भी आवेदन किया गया है, जिससे प्रशासन और इस घटना से जुड़े तमाम पहलुओं पर स्थिति स्पष्ट हो सके।

मल्लिकार्जुन खरगे का जे.पी. नड्डा को पत्र

दूसरी तरफ, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने हल्द्वानी की अपनी रैली के ठीक बाद सभास्थल पर हुए इस तथाकथित शुद्धीकरण को सीधे तौर पर छुआछूत की घटना करार दिया है। उन्होंने केंद्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा को एक पत्र लिखकर यह मांग की है कि वह राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को इस मामले में तुरंत प्राथमिकी दर्ज करने के सख्त निर्देश दें। इसके साथ ही उन्होंने यह भी जानकारी दी कि इस गंभीर प्रकरण को लेकर राज्यसभा के सभापति सी.पी. राधाकृष्णन से भी संपर्क साधा जाएगा।

कार्यवाही न होने पर उठाए सवाल

पत्र के जरिए मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की इस मुद्दे पर चुप्पी को लेकर भी तीखे सवाल उठाए हैं। राज्यसभा में सदन के नेता जे.पी. नड्डा को लिखे पत्र में उन्होंने इस बात पर भारी हैरानी व्यक्त की कि इस तरह की 'शुद्धीकरण' की घटना के पूरे 24 दिन बीत जाने के बाद भी प्रशासन की तरफ से कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है। इसके उलट, सांसद राहुल गांधी के खिलाफ ही मामला दर्ज कर दिया गया, जबकि वह लगातार देश भर में दलितों के अधिकारों और उनकी आवाज को मुखरता से उठा रहे हैं।

सवाल-जवाब

हल्द्वानी में कौन सी घटना हुई थी जिसके बाद विवाद बढ़ा?
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की जनसभा के बाद रामलीला मैदान में कथित तौर पर गंगाजल छिड़ककर शुद्धीकरण अनुष्ठान किया गया था।
उत्तराखंड हाई कोर्ट में जनहित याचिका किसने दायर की है?
देहरादून के सामाजिक कार्यकर्ता बैजनाथ ने यह जनहित याचिका दायर की है।
याचिका पर हाई कोर्ट में सुनवाई कब होने की संभावना है?
इस याचिका पर उत्तराखंड हाई कोर्ट में 7 सितंबर को सुनवाई होने की संभावना है।
याचिकाकर्ता ने अदालत से मुख्य रूप से क्या आग्रह किया है?
याचिकाकर्ता ने घटना से जुड़े सभी इलेक्ट्रॉनिक, दस्तावेजी सबूतों और सीसीटीवी फुटेज को सुरक्षित रखने के निर्देश देने का आग्रह किया है।
मल्लिकार्जुन खरगे ने इस मामले में किसे पत्र लिखा है?
मल्लिकार्जुन खरगे ने केंद्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा को पत्र लिखकर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश देने का आग्रह किया है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Michael Anderson@michael-anderson·18 दिन पहले

यह कानूनी कदम भारतीय राजनीति में सामाजिक न्याय और सार्वजनिक स्थलों के उपयोग पर चल रही वैचारिक बहस को तेज करेगा। जैसे-जैसे मामला अदालत की चौखट पर पहुंचा है, यह देखना अहम होगा कि न्यायपालिका इस प्रकार के अनुष्ठानों और सार्वजनिक समानता के बीच क्या संतुलन तय करती है। आगामी सुनवाई से प्रशासन पर दबाव बढ़ेगा।

Ravikash Gupta@ravikash·18 दिन पहले

हल्द्वानी रैली के बाद कथित शुद्धीकरण और हाई कोर्ट तक पहुंचे इस मामले का असर अब राजनीतिक गलियारों के साथ-साथ संस्थागत और कॉरपोरेट छवि पर भी पड़ सकता है। इस तरह के सामाजिक-सांस्कृतिक विवाद निवेशकों की धारणा को प्रभावित करते हैं और देश में कारोबारी माहौल तथा सामाजिक स्थिरता की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े करते हैं। आगे की न्यायिक कार्यवाही और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं यह तय करेंगी कि इस प्रकार के संवेदनशील मामलों से देश में किस तरह की आर्थिक और सामाजिक स्थिरता का संदेश जाता है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·18 दिन पहले

यह कानूनी और राजनीतिक टकराव उत्तराखंड की जमीनी राजनीति में जातिगत तनाव को और गहरा कर सकता है। जब हाई कोर्ट इस जनहित याचिका पर सुनवाई करेगा, तब न्यायपालिका की यह भूमिका इस बात की मिसाल बनेगी कि सार्वजनिक स्थलों पर होने वाले वैचारिक व सामाजिक अनुष्ठानों को किस कानूनी दायरे में परखा जाए। खरगे द्वारा जे.पी. नड्डा को पत्र लिखना और शीर्ष नेतृत्व की चुप्पी पर सवाल उठाना यह संकेत देता है कि कांग्रेस इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर दलित अस्मिता के बड़े राजनीतिक नैरेटिव के रूप में स्थापित करने की तैयारी में है।

Rohan Verma@rohan-verma·18 दिन पहले

हल्द्वानी रैली के बाद कथित शुद्धीकरण पर उत्तराखंड हाई कोर्ट में जनहित याचिका और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे द्वारा इसे छुआछूत से जोड़कर शीर्ष नेतृत्व तक मामला ले जाना यह संकेत देता है कि यह विवाद अब केवल स्थानीय स्तर पर सीमित नहीं रहेगा। 7 सितंबर को होने वाली संभावित सुनवाई और सीसीटीवी फुटेज जैसे साक्ष्यों को सुरक्षित रखने की मांग इस मामले को प्रशासनिक और कानूनी रूप से अत्यधिक संवेदनशील बनाती है, जिससे आगामी दिनों में राज्य की राजनीति और सामाजिक ताने-बाने पर गहरा असर पड़ सकता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·18 दिन पहले

एक क्राइम रिपोर्टर के तौर पर मेरा मानना है कि सार्वजनिक स्थल पर इस तरह के अनुष्ठान से उपजा विवाद और साक्ष्यों को सुरक्षित रखने की कानूनी मांग, कानून-व्यवस्था और सामाजिक सौहार्द के लिहाज से एक गंभीर मोड़ है। हाई कोर्ट की आगामी सुनवाई और आरटीआई के जरिए मिलने वाली जानकारियाँ यह तय करेंगी कि इसमें आपराधिक लापरवाही या भेदभाव के तहत कोई कानूनी कार्रवाई आगे बढ़ती है या नहीं।

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