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हिमाचल प्रदेश में सेब उत्पादन में 48 फीसदी की भारी गिरावट, 5 हजार करोड़ रुपये की ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गहराया संकटहिमाचल प्रदेश
2 अक्तू॰ 2026, 10:27 am (35 दिन पहले)· 1

हिमाचल प्रदेश में सेब उत्पादन में 48 फीसदी की भारी गिरावट, 5 हजार करोड़ रुपये की ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गहराया संकट

खराब मौसम और जलवायु परिवर्तन के चलते हिमाचल प्रदेश में सेब की आवक आधी रह गई है, जिससे राज्य के करीब 2.5 लाख बागवान परिवारों और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर सीधा असर पड़ रहा है।

हिमाचल प्रदेश की आर्थिकी को बड़ा सहारा देने वाला सेब उद्योग इस समय गहरे संकट के दौर से गुजर रहा है। प्रतिकूल मौसमी परिस्थितियों और जलवायु परिवर्तन के दोहरे प्रहार के चलते चालू सीजन में सेब की पैदावार में करीब 48 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई है। इस बड़ी गिरावट की वजह से राज्य की तकरीबन 5,000 करोड़ रुपये की सेब अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई है, जिससे बागवानी से जुड़े लगभग 2.5 लाख परिवारों के सामने गंभीर आजीविका संकट खड़ा हो गया है।

मंडियों में आधे से भी कम पहुंचे सेब के बक्से

राज्य के बागवानी निदेशक सतीश कुमार ने गुरुवार को आधिकारिक आंकड़ों का ब्योरा देते हुए स्पष्ट किया कि पिछले वर्ष की इसी अवधि में जहां 2.18 करोड़ सेब के बॉक्स मंडियों में पहुंचे थे, वहीं इस बार अब तक केवल 1.15 करोड़ बक्से ही बाजार में आ सके हैं। यह सीधा 48 प्रतिशत की कमी को दर्शाता है। सतीश कुमार का मानना है कि चालू सत्र के दौरान कुल उत्पादन पिछले 10 से 12 वर्षों के सबसे निचले पायदान पर पहुंच सकता है। बेमौसम बरसात, अचानक हुई ओलावृष्टि और असमय बर्फबारी ने बागानों में तैयार हो रही फसल को व्यापक नुकसान पहुंचाया है।

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सीजनल आवक और राज्य की जीडीपी पर सीधा प्रभाव

हिमाचल में सेब की तुड़ान और विपणन का दौर अमूमन 15 जून से शुरू होकर अक्टूबर के अंतिम सप्ताह तक जारी रहता है। शुरुआती दौर की किस्में जून के आखिरी दिनों में मंडियों का रुख करती हैं, जबकि अधिक ऊंचाई वाले पर्वतीय व जनजातीय क्षेत्रों की फसल अक्टूबर के आखिर तक बिकने के लिए आती है। सेब यहां के बागवानी क्षेत्र का मुख्य आधार है और इसमें आने वाली किसी भी प्रकार की गिरावट का सीधा असर किसानों की आमदनी के साथ राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) पर भी पड़ता है।

टन के हिसाब से आधा रह गया कुल उत्पादन

बागवानी विभाग के ताजा आकलन के अनुसार, इस पूरे सीजन में कुल उपज सिमटकर केवल 1.5 करोड़ बक्से रहने की संभावना है। यदि वजन के नजरिए से देखें, तो पिछले साल राज्य में कुल सात लाख टन सेब पैदा हुआ था, लेकिन इस मर्तबा यह आंकड़ा घटकर महज 3.5 लाख से 3.75 लाख टन के दायरे में सिमटने की उम्मीद है। विभागीय अधिकारियों के मुताबिक, बागवानी के पारंपरिक ढर्रे से अब काम नहीं चलने वाला है, क्योंकि पुराने पड़ चुके बगीचों में उत्पादन लगातार घट रहा है। शिमला के ऊपरी क्षेत्रों में इस साल पेड़ों पर फल बेहद कम आए हैं, जिससे किसानों की कमर टूट गई है।

उच्च घनत्व वाले पौधे और सरकार की राहत योजना

विपरीत परिस्थितियों से निपटने के लिए विभाग अब आधुनिक सघन बागवानी को आगे बढ़ा रहा है। इसी कड़ी में करसोग में करीब 1,00,000 से 1,50,000 अधिक घनत्व वाले गुणवत्तापूर्ण पौधे तैयार किए जा रहे हैं, जिन्हें विविध भौगोलिक ऊंचाई वाले इलाकों में रोपा जाएगा ताकि किसान वैज्ञानिक पद्धतियों को अपना सकें। दूसरी तरफ, स्थिति की गंभीरता को देखते हुए राजस्व और बागवानी मंत्री जगत सिंह नेगी ने कहा कि इस बार उपज काफी नीचे आ गई है और यह कहना बेहद कठिन है कि सीजन के अंत तक कुल आंकड़ा दो करोड़ बॉक्स भी छू पाएगा या नहीं, जबकि पिछले साल 3.49 करोड़ बक्से बाजार में उतरे थे। जगत सिंह नेगी ने भरोसा दिलाया कि राज्य सरकार ‘बाजार हस्तक्षेप योजना’ (एमआईएस) के अंतर्गत सेब खरीद की दरें बढ़ाने जा रही है और बागवानों को राहत पहुंचाने के मकसद से जल्द ही मंत्रिमंडल के समक्ष एक प्रस्ताव पेश किया जाएगा।

सवाल-जवाब

इस साल हिमाचल प्रदेश में सेब के उत्पादन में कितनी गिरावट आई है?
इस साल अब तक हिमाचल प्रदेश में सेब के उत्पादन में पिछले साल के मुकाबले लगभग 48 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है।
इस मौसम में अब तक कितने सेब के बक्से मंडियों में पहुंचे हैं?
बाजार में अब तक केवल 1.15 करोड़ बक्से पहुंचे हैं, जबकि पिछले साल इसी अवधि में 2.18 करोड़ बक्से मंडियों में आए थे।
सेब की फसल खराब होने के मुख्य कारण क्या हैं?
जलवायु परिवर्तन, बेमौसम बारिश, भारी ओलावृष्टि और असमय बर्फबारी के कारण सेब की फसल को व्यापक नुकसान हुआ है।
हिमाचल प्रदेश में सेब की अर्थव्यवस्था का कुल आकार कितना है?
हिमाचल में सेब की अर्थव्यवस्था लगभग 5,000 करोड़ रुपये की है और इससे करीब 2.5 लाख परिवार प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं।
इस सत्र में कुल सेब उत्पादन कितने रहने का अनुमान है?
बागवानी विभाग के अनुसार इस साल कुल उत्पादन करीब 1.5 करोड़ बक्से या 3.5 लाख से 3.75 लाख टन के बीच रहने का अनुमान है, जो पिछले साल 7 लाख टन था।
बागवानों को राहत देने के लिए राज्य सरकार क्या कदम उठा रही है?
राज्य सरकार बाजार हस्तक्षेप योजना (एमआईएस) के तहत खरीद मूल्य बढ़ाने जा रही है, जिसका प्रस्ताव मंत्रिमंडल की बैठक में लाया जाएगा।
उत्पादन बढ़ाने के लिए बागवानी विभाग क्या नई तकनीक अपना रहा है?
विभाग घनी बागवानी को बढ़ावा दे रहा है और करसोग में 1,00,000 से 1,50,000 अधिक घनत्व वाले पौधे तैयार किए जा रहे हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Divya Reddy@divya-reddy·34 दिन पहले

मौसम की मार से बागवानों की हालत सचमुच डरावनी हो गई है। ढाई लाख परिवारों की आजीविका सीधे दांव पर लगी है। जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए जो नए पौधे तैयार किए जा रहे हैं, क्या वे वाकई इन किसानों को इस नुकसान से उबरने में मदद कर पाएंगे?

Arjun Mehta@arjun-mehta·35 दिन पहले

जलवायु परिवर्तन अपनी जगह है, पर सिर्फ मौसम को दोष देकर सिस्टम की नाकामी नहीं छुपानी चाहिए। जब पौधे पुराने हो रहे थे और ओलावृष्टि से निपटने के इंतजाम पहले से करने थे, तब सरकार और विभाग क्या कर रहे थे?

Ravikash Gupta@ravikash·35 दिन पहले

अ अर्जुन जी, बात तो सही कही आपने। मौसम की मार तो है ही, पर पुराने होते बगीचों और समय पर इंतजाम न होने की बात भी नकारी नहीं जा सकती।

Rohan Verma@rohan-verma·35 दिन पहले

पिछले साल जब मैं शिमला गया था, तब वहाँ के बागवानों से बात हुई थी। उनकी चिंता साफ दिख रही थी कि मौसम का मिजाज हर साल बिगड़ रहा है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·35 दिन पहले

रोहन भाई, सच कहा आपने। मौसम की यह मार ऐसे ही चलती रही तो बागवानों का कर्ज चुकाना भी मुश्किल हो जाएगा।

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