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जींद से चली देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन खाली, 2600 की क्षमता पर रोजाना सिर्फ 80 यात्री कर रहे सफरहरियाणा
16 सित॰ 2026, 11:27 am (6 दिन पहले)· 1

जींद से चली देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन खाली, 2600 की क्षमता पर रोजाना सिर्फ 80 यात्री कर रहे सफर

हरियाणा में शुरू हुई देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन में यात्रियों की भारी कमी देखने को मिल रही है। 2600 लोगों की क्षमता वाली इस ट्रेन में रोजाना औसतन केवल 80 यात्री ही सफर कर रहे हैं, जिसके चलते रेलवे इसका रूट बढ़ाने पर विचार कर रहा है।

हरियाणा के जींद से शुरू हुई भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन इन दिनों खाली दौड़ रही है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना की शुरुआत 17 जुलाई को हुई थी, जब इस ट्रेन ने जींद से अपनी पहली आधिकारिक यात्रा पूरी की थी। हालांकि, शुरुआती उत्साह के फीका पड़ने के बाद अब इस सेवा में यात्रियों की खासी कमी देखने को मिल रही है। स्थिति यह है कि ट्रेन में एक बार में 2600 यात्रियों के बैठने की विशाल क्षमता है, लेकिन इसके बावजूद रोजाना महज 80 लोग ही इसमें सफर कर रहे हैं।

रूट और फेरों की पूरी स्थिति

यह हाइड्रोजन ट्रेन दुनिया की सबसे लंबी और शक्तिशाली श्रेणी में गिनी जाती है, जो सप्ताह में 6 दिन अपने फेरे लगाती है। यह विशेष ट्रेन करीब 89 किलोमीटर लंबे जींद-गोहाना-सोनीपत रेल रूट पर संचालित होती है। रेलवे से प्राप्त आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, 20 जुलाई से 20 अगस्त के बीच के एक महीने के दौरान केवल 26 दिन ही ऐसा हुआ जब औसतन प्रतिदिन 80 यात्रियों ने इसमें यात्रा की। ध्यातव्य है कि इस देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन का भव्य शुभारंभ 17 जुलाई को जींद के पांडु-पिंडारा स्टेशन से किया गया था.

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यात्रियों के आंकड़े और रूट विस्तार की योजना

बीते 20 जुलाई से 20 अगस्त तक के एक महीने के अंतराल में सोनीपत से गोहाना के लिए कुल 507 लोगों ने जबकि जींद के लिए 538 यात्रियों ने सफर किया। इसी प्रकार इतने ही यात्रियों ने इस आधुनिक ट्रेन के जरिए जींद से गोहाना और सोनीपत तक की दूरी तय की। इस पूरे एक महीने के परिचालन में यह ट्रेन कभी भी अपनी 2600 यात्रियों की कुल सीटिंग कैपेसिटी के आंकड़े को छूने में कामयाब नहीं हो पाई है। यात्रियों की इस भारी कमी से उबरने और ट्रेन के उपयोग को बढ़ाने के लिए अब रेलवे के अधिकारी इस सेवा के रूट को जींद-गोहाना-सोनीपत से आगे बढ़ाकर सीधे दिल्ली तक करने की योजना पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं.

तकनीकी ट्रायल और किराया व्यवस्था

ट्रेन की गति और इसकी तय दूरी को बढ़ाने के लिए इस समय तकनीकी ट्रायल जोर-शोर से चल रहे हैं। इन परीक्षणों के पूरी तरह सफल होने के बाद मिलने वाली रिपोर्ट के आधार पर ही आगे के नीतिगत निर्णय लिए जाएंगे और जल्द ही इसके रूट को विस्तार देने पर विचार किया जाएगा। दूसरी ओर, सोनीपत और गोहाना के बीच इस रूट पर यात्रियों की सुविधा के लिए बनाए गए कई हाल्ट फिलहाल बिल्कुल वीरान पड़े हैं। रभड़ा, लाठ और बड़वासनी जैसे हाल्ट स्टेशनों पर यात्रियों के लिए टिकट काउंटर या टिकट खरीदने की कोई व्यवस्था मौजूद नहीं है। इन तीनों प्रमुख हाल्ट स्टेशनों पर रेलवे प्रशासन की तरफ से टिकट बेचने के लिए किसी भी कर्मचारी की तैनाती नहीं की गई है। पूरे रूट पर सोनीपत और गोहाना के अलावा केवल मोहान स्टेशन पर ही टिकटिंग की उचित व्यवस्था उपलब्ध है, जहां इस हाइड्रोजन ट्रेन का ठहराव महज एक से दो मिनट के लिए ही होता है। खास बात यह है कि इस हाई-टेक ट्रेन में सफर करने के लिए बेहद किफायती किराया रखा गया है, जिसमें न्यूनतम किराया पांच रुपये और अधिकतम किराया 25 रुपये तय किया गया है.

सवाल-जवाब

देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन का शुभारंभ कब और कहां हुआ था?
इस हाइड्रोजन ट्रेन की शुरुआत 17 जुलाई को हरियाणा के जींद के पांडु-पिंडारा स्टेशन से की गई थी।
हाइड्रोजन ट्रेन रोजाना कितने यात्रियों को लेकर चल रही है?
इस ट्रेन की कुल क्षमता 2600 यात्रियों की है, लेकिन रोजाना औसतन केवल 80 यात्री ही इसमें सफर कर रहे हैं।
यह हाइड्रोजन ट्रेन किस रूट पर चलाई जा रही है?
यह ट्रेन लगभग 89 किलोमीटर लंबे जींद-गोहाना-सोनीपत रेल रूट के बीच संचालित की जा रही है।
ट्रेन का किराया कितना रखा गया है?
इस हाइड्रोजन ट्रेन में न्यूनतम किराया पांच रुपये और अधिकतम किराया 25 रुपये तय किया गया है।
कम यात्रियों की समस्या से निपटने के लिए रेलवे क्या योजना बना रहा है?
यात्रियों की संख्या बढ़ाने के लिए रेलवे अधिकारी इस ट्रेन के रूट को जींद-गोहाना-सोनीपत से आगे बढ़ाकर दिल्ली तक करने की योजना बना रहे हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Neha Verma@neha-verma·5 दिन पहले

ग्रीन टेक्नोलॉजी और सस्टेनेबल ट्रैवल आज की आधुनिक जीवनशैली का अहम हिस्सा बन चुके हैं, लेकिन किसी भी इको-फ्रेंडली पहल की सफलता उसकी व्यावहारिक उपयोगिता और यूज़र एक्सपीरियंस पर निर्भर करती है। केवल अत्याधुनिक तकनीक ला देने से यात्रियों की दैनिक जीवनशैली और आदतों में बदलाव नहीं आता; इसके लिए बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर, आसान टिकटिंग और सही रूट कनेक्टिविटी बेहद ज़रूरी है। यदि इस ट्रेन का दायरा दिल्ली जैसे बड़े शहरी केंद्रों तक बढ़ता है, तो यह सस्टेनेबल लाइफस्टाइल को लोगों की रोज़मर्रा की आवाजाही का हिस्सा बनाने में कहीं अधिक असरदार साबित हो सकता है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·5 दिन पहले

हरित तकनीक और आधुनिक बुनियादी ढांचे की यह पहल सराहनीय है, लेकिन यह रिपोर्ट नीतिगत क्रियान्वयन और योजना की कमियों को उजागर करती है। 2600 यात्रियों की क्षमता वाली ट्रेन का केवल 80 यात्रियों के साथ चलना दर्शाता है कि शुरुआत में जनसांख्यिकीय मांग का सही आकलन नहीं किया गया। साथ ही, बीच के स्टेशनों पर टिकटिंग सुविधाओं का न होना शासन स्तर पर प्रबंधन की ढिलाई को दिखाता है। इस हाइड्रोजन ट्रेन का दायरा दिल्ली तक बढ़ाना एक व्यावहारिक नीतिगत सुधार हो सकता है, जिससे हरित ऊर्जा तकनीक का सही इस्तेमाल सुनिश्चित हो सके।

Ravikash Gupta@ravikash·5 दिन पहले

अर्जुन जी का विश्लेषण बिल्कुल सटीक है। वित्तीय और आर्थिक दृष्टि से देखा जाए तो उच्च तकनीक वाले हरित बुनियादी ढांचे में पूंजीगत व्यय का लाभ तभी मिलता है जब परिसंपत्ति का उपयोग अधिकतम हो। 2600 की क्षमता के मुकाबले केवल 80 यात्रियों के साथ ट्रेन चलाना न केवल परिचालन लागत को बढ़ाता है बल्कि निवेश पर रिटर्न को भी प्रभावित करता है। बुनियादी ढांचे की टिकटिंग खामियों को दूर करने के साथ-साथ दिल्ली जैसे घने यातायात वाले कॉरिडोर तक विस्तार करना इस परियोजना को व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य बनाने के लिए अनिवार्य है, ताकि हरित ऊर्जा निवेश का उचित आर्थिक लाभ मिल सके।

Rohan Verma@rohan-verma·5 दिन पहले

हरित प्रौद्योगिकी आधारित यह महत्वाकांक्षी हाइड्रोजन ट्रेन परियोजना यह स्पष्ट करती है कि केवल आधुनिक तकनीक लाने से ही नीतिगत उद्देश्य पूरे नहीं होते, बल्कि जमीनी बुनियादी ढांचे की उपलब्धता उतनी ही जरूरी है। जब तीन-तीन हाल्ट स्टेशनों पर टिकट व्यवस्था ही उपलब्ध नहीं होगी और रूट कनेक्टिविटी सीमित रहेगी, तो विशाल क्षमता का ऐसा दोहन स्वाभाविक है। रेलवे को दिल्ली तक रूट विस्तार के साथ-साथ बुनियादी स्टेशन प्रबंधन में तत्काल सुधार करना होगा ताकि सार्वजनिक धन के इस निवेश से वास्तविक यात्रियों को लाभ मिल सके।

Karan Malhotra@karan-malhotra·5 दिन पहले

रोहन की बात सही है, लेकिन सार्वजनिक सुरक्षा के दृष्टिकोण से यह मामला अधिक गंभीर है। रभड़ा, लाठ और बड़वासनी जैसे हाल्ट स्टेशनों पर कर्मचारियों और टिकट प्रणाली का न होना केवल राजस्व का नुकसान नहीं है, बल्कि सुनसान पड़े ये स्टेशन यात्रियों, विशेषकर महिलाओं के लिए सुरक्षा का बड़ा खतरा बन सकते हैं। बिना किसी स्टेशन प्रबंधन या निगरानी के इतने बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर को छोड़ना प्रशासनिक लापरवाही को दर्शाते हुए अपराध के मुफीद माहौल को जन्म देता है। अगर इस रूट का विस्तार दिल्ली तक किया जाना है, तो रेलवे को पहले इन हाल्टों पर सुरक्षा व्यवस्था और टिकट काउंटरों की पुख्ता व्यवस्था करनी होगी ताकि यात्री निडर होकर सफर कर सकें।

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