देश के आम नागरिकों और करदाताओं की जेब पर सीधा असर डालने वाले दो बड़े आर्थिक घटनाक्रम लगातार दो दिनों में सामने आने वाले हैं। गवर्नर संजय मल्होत्रा के नेतृत्व में 7 अक्टूबर, बुधवार को मौद्रिक नीति समिति की बैठक में रेपो दर सहित विभिन्न वित्तीय पहलुओं पर निर्णय घोषित किया जाएगा, जिसका सीधा असर घर और गाड़ियों के लिए लिए गए कर्ज की मासिक किस्तों पर पड़ेगा। इसके ठीक अगले दिन यानी 8 अक्टूबर को केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण की अध्यक्षता में जीएसटी परिषद की 57वीं बैठक आयोजित होगी, जिसमें टैक्स नियमों को आसान बनाने, रिफंड जारी करने की रफ्तार बढ़ाने और करदाताओं की सहूलियत से जुड़े अहम सुधारों पर विचार किया जाना तय है।
कर्ज की ब्याज दरों और मासिक किस्तों पर नजर
केंद्रीय बैंक की ओर से 7 अक्टूबर को आने वाले मौद्रिक नीति के निर्णय पर घर और वाहन खरीदने वाले ग्राहकों की गहरी नजर टिकी हुई है। केंद्रीय बैंक रेपो रेट को लेकर जो भी नीतिगत रुख अपनाएगा, उससे तय होगा कि वाणिज्यिक बैंक अपने होम लोन और ऑटो लोन पर ब्याज दरें किस स्तर पर रखते हैं। यदि नीतिगत दरों में स्थिरता या राहत का संकेत मिलता है, तो कर्जदारों की मासिक किस्त यानी ईएमआई के बोझ पर अनुकूल प्रभाव पड़ सकता है। वित्तीय प्रणाली में नकदी के प्रवाह और खुदरा उधारी की लागत को संतुलित करने के नजरिए से यह समीक्षा बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
जीएसटी परिषद की बैठक और टैक्स रिफंड का 17 दिनों का नया खाका
केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण की अगुवाई में 8 अक्टूबर को जुटने वाली जीएसटी परिषद में विभिन्न राज्यों के वित्त मंत्री सदस्य के तौर पर हिस्सा लेंगे। इस उच्चस्तरीय बैठक के सामने सबसे बड़ा प्रस्ताव कारोबारियों और करदाताओं को मिलने वाले रिफंड की समयावधि को काफी कम करने का है। वर्तमान में जीएसटी रिफंड हासिल करने में 21 दिन से लेकर 45 दिन तक का लंबा वक्त लग जाता है, जिसे घटाकर कुल 17 दिन करने की तैयारी है। इस व्यवस्था के तहत रिफंड दावे की पुष्टि शुरुआती 10 दिनों के भीतर पूरी की जाएगी और उसके अगले 7 दिनों में राशि जारी कर दी जाएगी। यदि परिषद इस प्रस्ताव पर मुहर लगाती है, तो कारोबारियों की कार्यशील पूंजी लंबे समय तक फंसी नहीं रहेगी।
टैक्स दरों में संशोधन केवल नए वित्त वर्ष से लागू करने का विचार
परिषद की पिछली नीतिगत चर्चाओं में कर व्यवस्था को तर्कसंगत बनाने के तहत पूर्व के चार स्लैब (पांच, 12, 18 और 28 फीसदी) की जगह दो-दर वाली व्यवस्था (पांच और 18 फीसदी) को जमीन पर उतारा गया था। आगामी 57वीं बैठक के आधिकारिक एजेंडे में टैक्स दरों में कोई नया फेरबदल करने का प्रस्ताव शामिल नहीं है। इसके बजाय एक दीर्घकालिक व्यवस्था बनाने पर विचार चल रहा है, जिसके तहत कर दरों में बदलाव के प्रस्तावों पर पूरे साल में केवल एक बार ही मंथन किया जाए। इस व्यवस्था के अनुसार सभी दर संशोधनों को केवल 1 अप्रैल से, यानी नए वित्त वर्ष के आरंभ से ही प्रभावी बनाया जाएगा, ताकि उद्योगों और व्यापारियों को बार-बार दरों में बदलाव के झंझट से न जूझना पड़े। आगामी बैठक में केवल अस्पष्टताओं को सुलझाने और दरों को सुसंगत बनाने से जुड़े सीमित मामले ही सामने रखे जाएंगे।
नोटिस जारी करने के तय मानक और सुगम पंजीकरण प्रक्रिया
करदाताओं को अनावश्यक प्रशासनिक दबाव से बचाने के लिए भी परिषद कई ठोस कदम उठाने जा रही है। टैक्स अधिकारियों द्वारा भेजे जाने वाले नोटिस, व्यक्तिगत सुनवाई और अंतिम आदेश पारित करने की पूरी प्रक्रिया के लिए एकसमान मानक तय करने का प्रस्ताव है। इसके साथ ही एक निर्धारित मौद्रिक सीमा तय की जाएगी, जिससे कम राशि वाले मामलों में करदाताओं को किसी भी प्रकार का नोटिस जारी नहीं किया जाएगा। दूसरी ओर, जीएसटी पंजीकरण को भी और अधिक पारदर्शी बनाया जा रहा है। इस समय 61 फीसदी आवेदकों को किसी भी अधिकारी के दखल के बिना मात्र 3 कार्यदिवसों में नया जीएसटी नंबर मिल जाता है। शेष आवेदनों के लिए भी प्रक्रिया को इतना सरल किया जा रहा है कि गैर-जरूरी आपत्तियों और आवेदन निरस्त होने की संभावनाओं को समाप्त किया जा सके।
ई-कॉमर्स मंचों के जरिए आपूर्ति पर विशेष प्रावधान
डिजिटल कारोबार को राहत देने के मकसद से भी एक महत्वपूर्ण विकल्प पर चर्चा होगी। परिषद के सामने यह प्रस्ताव रखा गया है कि ई-कॉमर्स मंचों के माध्यम से की जाने वाली आपूर्ति पर इनपुट टैक्स क्रेडिट के लाभ के बिना 5 फीसदी की रियायती जीएसटी दर लागू करने की अनुमति दी जा सकती है। इससे छोटे ऑनलाइन विक्रेताओं के लिए अनुपालन का बोझ घटेगा और ई-कॉमर्स व्यवस्था में उत्पादों की आपूर्ति अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकेगी। इस प्रकार दोनों दिन होने वाले ये संस्थागत फैसले सीधे तौर पर आम उपभोक्ता, खुदरा कर्जदार और छोटे-बड़े सभी कारोबारियों के दैनिक वित्तीय प्रबंधन से जुड़े हुए हैं।













