राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र में प्रचलित गवरी की पहचान सिर्फ एक पारंपरिक लोकनाट्य या उत्सव तक सीमित नहीं है, बल्कि यह श्रद्धा, पौराणिक आस्था और कठोर संयम की एक दीर्घकालिक साधना है। इस पारंपरिक अनुष्ठान को देखने के लिए स्थानीय ग्रामीणों के साथ-साथ बाहरी पर्यटक भी भारी संख्या में एकत्रित होते हैं। इस आयोजन का हिस्सा बनने वाले कलाकार लगातार 40 दिनों तक अपने घरों और पारिवारिक बंधनों से दूर रहकर अत्यंत कड़े नियमों का पालन करते हैं। इस लंबी साधना की पूर्णाहुति 'ग्वालन' और 'वलावन' की रस्मों के जरिए होती है, जिसमें कलाकारों को जलती ज्वालाओं के बीच से गुजरते हुए अपनी निष्ठा प्रमाणित करनी पड़ती है।
चालीस दिनों तक सात्विक संयम और त्याग का कठोर नियम
गवरी के मंचन में भाग लेने वाले कलाकारों के लिए यह समय एक विस्तृत व्रत की तरह होता है। इस पूरी अवधि के दौरान वे अपने खान-पान और जीवनशैली में अत्यधिक अनुशासन बरतते हैं। इस 40 दिवसीय अनुष्ठान के दौरान हरी सब्जियों का उपयोग पूरी तरह प्रतिबंधित रहता है। इसके साथ ही मदिरा, मांस अथवा किसी भी प्रकार के नशे से पूरी तरह दूरी बनाए रखी जाती है। इस व्रत का नियम इतना कड़ा है कि कलाकार पूरे 40 दिनों तक पैरों में जूते अथवा चप्पल नहीं पहनते हैं और हर मौसम में नंगे पांव ही विचरण करते हैं। वे अपने परिवार से शारीरिक और मानसिक रूप से अलग रहते हुए पूरी तरह पवित्र दिनचर्या का पालन करते हैं। जब यह निरंतर साधना पूरी होती है, तब जाकर वलावन नामक विदाई अनुष्ठान की दिशा में कदम बढ़ाया जाता है।
रात्रि जागरण और मुख्य मंदिर में देव आज्ञा
वलावन की रस्मों के प्रारंभ होने से पूर्व रातभर चलने वाले एक विस्तृत जागरण का आयोजन किया जाता है। इस निशा में पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन पर देवी-देवताओं की स्तुति में भजन गाए जाते हैं, जिससे समूचा परिवेश आध्यात्मिक रंग में रंग जाता है। सुबह होते ही जिस गांव से गवरी का दल जुड़ा होता है, उसके सभी कलाकार एकजुट होकर गांव के प्रमुख देवालय में पहुंचते हैं। वहां भगवान शिव और माता पार्वती की विशेष पूजा-अर्चना संपन्न की जाती है। इस अनुष्ठान के जरिए कलाकार देवी-देवताओं से आगे की कठिन रस्मों को प्रारंभ करने की अनुमति मांगते हैं, जो श्रद्धालुओं और कलाकारों दोनों के लिए अत्यंत भावुक कर देने वाला क्षण होता है।
जलती ज्वालाओं के मध्य अग्नि परीक्षा का रहस्य
देवताओं से आज्ञा प्राप्त करने के तुरंत बाद इस पूरी परंपरा की सबसे रोमांचक रस्म आरंभ होती है। मिट्टी के बड़े-बड़े दीपकों में मोटी-मोटी बातियां रखकर उन्हें प्रज्वलित किया जाता है। इन प्रज्वलित दीपकों की धधकती ज्वालाओं के अत्यंत करीब जाकर कलाकार अपने शरीर को घुमाते हैं और नृत्य की मुद्राओं में अपनी निष्ठा को प्रदर्शित करते हैं। स्थानीय लोकमान्यता है कि यदि इन धधकती बातियों की आंच या लौ किसी कलाकार को छू ले अथवा जला दे, तो यह माना जाता है कि 40 दिनों के कठोर नियमों में उससे कोई न कोई गलती या चूक अवश्य हुई है। हालांकि पारंपरिक आस्था के अनुसार देवी-देवताओं के आशीष के चलते आमतौर पर किसी भी साधक को इस अग्नि परीक्षा में कोई शारीरिक क्षति नहीं पहुंचती है।
मिट्टी का गजराज और पवित्र जलाशय पर वलावन की पूर्णता
अग्नि परीक्षा का चरण निर्विघ्न संपन्न होने के उपरांत अगले दिवस वलावन की अंतिम प्रक्रिया पूरी की जाती है। इस अनुष्ठान में मिट्टी से एक विशाल हाथी का निर्माण किया जाता है। इस मिट्टी के हाथी के समक्ष भगवान शिव और माता पार्वती की पूरी शास्त्रीय विधि से आराधना की जाती है। पूजा संपन्न होते ही समूचा दल लोकगीत गाते और वाद्ययंत्र बजाते हुए किसी नजदीकी पावन नदी अथवा जलाशय के तट पर पहुंचता है। इसी तट पर 40 दिनों की यह निरंतर चलने वाली कठोर तपस्या अपने अंतिम चरण को छूती है।
मेवाड़ की पौराणिक धरोहर और आधुनिक दौर में अस्तित्व
गवरी के नाटकों में मुख्य रूप से भगवान शिव तथा माता पार्वती से जुड़े पौराणिक प्रसंगों और आख्यानों का ही मंचन किया जाता है। कलाकार भिन्न-भिन्न वेशभूषा धारण करके इन धार्मिक कथाओं को समाज के सामने प्रस्तुत करते हैं, जिसके चलते इसे मेवाड़ की लोक संस्कृति की धड़कन माना जाता है। लोक संस्कृति के मर्मज्ञ श्रीकृष्ण जुगुनू के अनुसार, गवरी की यह पावन परंपरा सदियों से मेवाड़ की धरती पर निरंतर प्रवाहित हो रही है। सामाजिक परिवेश और जीवनशैली में व्यापक बदलाव आने के बावजूद कलाकारों की यह निस्वार्थ निष्ठा और परंपरा के नियम आज भी बिना किसी बदलाव के जीवंत बने हुए हैं। वलावन की औपचारिक समाप्ति के पश्चात ही ये कलाकार अपने पारिवारिक जीवन में लौटते हैं और यह सांस्कृतिक उत्सव क्षेत्र की अमिट पहचान को और सुदृढ़ कर जाता है।



















