कर्नाटक के खेत में जुताई के दौरान निकला साढ़े चार सदी प्राचीन पत्थर, दान की भूमि हड़पने वालों को काशी में गोहत्या के पाप का डरबर्नपुर में सड़क सुरक्षा कार्यक्रम के दौरान बोलीं अग्निमित्रा पॉल, सीएजी रिपोर्ट से खुलेगा केंद्र की योजनाओं का सचपारिवारिक कलह में खूनी खेल: राजस्थान के बांसवाड़ा में तलवार से हमले के बाद उदयपुर ले जाते वक्त युवक अनिल की मौतजावेद अख्तर और फरहान अख्तर ने 25 साल में ऐसे बनाई सुपरहिट एक्शन फ्रेंचाइजी, रीमेक और संगीत का अनोखा सफरउत्तराखंड में सबसे ज्यादा व्यक्तिगत आयकर देने वाले करदाता बने ऋषभ पंत, वित्तीय वर्ष 2025 26 में चुकाए 23.84 करोड़ रुपयेयूएई से प्रत्यर्पित हुआ बंबीहा गैंग का सरगना गौरव गडोली, हरियाणा एसटीएफ को मिली बड़ी कामयाबीतमिलनाडु में टीवीके सरकार ने पेश किया पहला बजट, महिलाओं को सोने का सिक्का और 11वीं के छात्रों को मिलेगी आधुनिक साइकिलजम्मू-कश्मीर और लद्दाख में अनुच्छेद 370 हटने के 7 साल पूरे, राजनाथ सिंह ने बताया शांति का नया दौररोबोपे पार्टनरशिप से पाई नेटवर्क में तेजी के संकेत, जानिए किन टेक्निकल स्तरों पर टिकी है बाजार की नजरचंद्रमा के राशि परिवर्तन से वृषभ, कर्क और कुंभ राशि वालों को होगा बड़ा लाभ
कर्नाटक के खेत में जुताई के दौरान निकला साढ़े चार सदी प्राचीन पत्थर, दान की भूमि हड़पने वालों को काशी में गोहत्या के पाप का डरभारत
5 अग॰ 2026, 1:51 pm (1 घंटे पहले)· 2

कर्नाटक के खेत में जुताई के दौरान निकला साढ़े चार सदी प्राचीन पत्थर, दान की भूमि हड़पने वालों को काशी में गोहत्या के पाप का डर

कर्नाटक के चित्रदुर्ग जिले में किसानों को जुताई के दौरान कामगेति वंश के दौर का एक ऐतिहासिक शिलालेख मिला है, जिसमें राजा की ओर से दान की गई जमीन पर अवैध कब्जा करने पर काशी में गोहत्या जैसा महापाप लगने की बात दर्ज है।

कर्नाटक के चित्रदुर्ग जिले में कृषि कार्य के दौरान एक ऐतिहासिक धरोहर उजागर हुई है। यहाँ के हिरियूर तालुक अंतर्गत स्थित जावगोंडनहल्ली गांव में सर्वे नंबर 85 वाले एक खेत की जुताई करते समय किसानों को मिट्टी के नीचे दबा हुआ एक दुर्लभ पत्थर मिला। करीब साढ़े चार सौ साल पुराने माने जा रहे इस शिलालेख पर पुरानी कन्नड़ लिपि में पंक्तियां उकेरी गई हैं। इस पुरातात्विक अवशेष ने अपने अनोखे संदेश की वजह से लोगों का ध्यान खींचा है, क्योंकि इस पर जमीन हड़पने की नीयत रखने वाले लोगों के लिए एक अत्यंत कड़ा धार्मिक श्राप दर्ज किया गया है।

दान की जमीन हड़पने पर 'काशी में गोहत्या' के पाप की चेतावनी

इस पत्थर पर पुरानी कन्नड़ भाषा में कुल 17 पंक्तियां लिखी हुई हैं, जिनमें शासकीय आदेश के साथ एक चेतावनी दर्ज की गई है। शिलालेख में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि यदि कोई व्यक्ति राजा द्वारा भेंट में दी गई भूमि पर अनधिकृत कब्जा करने का प्रयास करेगा या उसे छीनेगा, तो उसे पवित्र नगरी काशी में गाय की हत्या करने के समान महापाप चढ़ेगा। इतिहासकारों के अनुसार सोलहवीं सदी के दौरान शाही फरमानों और भूमि दान को सुरक्षित रखने के लिए शिलापट्टों पर इस प्रकार के धार्मिक भय और नैतिक दंड का उल्लेख करना एक प्रचलित प्रशासनिक व्यवस्था थी, ताकि भावी पीढ़ियां धार्मिक आस्था के डर से दान की गई संपत्तियों का अतिक्रमण न करें।

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जनहित के निर्माण से प्रसन्न होकर राजा ने बख्शी थी उम्बली

अभिलेखीय अध्ययन से पता चलता है कि यह शिलालेख कामगेति वंश के राजा इम्मडी चिक्कन्ना नायक के शासनकाल का है, जिनका शासन समय 1575 से 1586 ईस्वी के बीच रहा। उस दौर में लक्काजिया के पुत्र डोड्डागौड़ा राजा के अधीन एक अधिकारी के रूप में कार्यरत थे। डोड्डागौड़ा ने जावगोंडनहल्ली गांव में आम जनता की सुविधा और सिंचाई व्यवस्था को सुचारू बनाने के उद्देश्य से एक विशाल झील का निर्माण करवाया था। अधिकारी के इस जनकल्याणकारी कार्य से अत्यधिक प्रसन्न होकर राजा ने उन्हें पुरस्कार स्वरूप 'उम्बली' यानी कर से पूरी तरह मुक्त भूमि प्रदान की थी।

शिलालेख की इबारत में यह व्यवस्था दी गई थी कि डोड्डागौड़ा के वंशज इस भूमि का उपभोग तब तक बिना किसी बाधा के करते रहेंगे जब तक आकाश में सूर्य और चंद्रमा का अस्तित्व कायम रहेगा। इसके साथ ही चेतावनी भी जोड़ी गई थी ताकि भविष्य में कोई भी शक्तिशाली व्यक्ति या प्रशासनिक अधिकारी इस शाही व्यवस्था को चुनौती देकर जमीन पर अवैध कब्जा न कर सके।

पुरातात्विक पड़ताल और तिथि निर्धारण की चुनौती

घटना की जानकारी मिलने के बाद पुरातत्व विभाग की टीम ने मौके पर पहुंचकर जांच-पड़ताल शुरू की। चित्रदुर्ग में स्थित पुरातत्व, संग्रहालय एवं विरासत विभाग के सहायक निदेशक प्रह्लाद जी के अनुसार प्राथमिक जांच के आधार पर इस शिलालेख की निर्माण तिथि वर्ष 1581 ईस्वी के आसपास बैठती है, हालांकि इसकी अंतिम और सटीक पुष्टि की प्रक्रिया अभी जारी है।

इतिहासकारों ने बताया कि शिलालेख पर निर्माण की तिथि कार्तिक शुक्ल दशमी दर्ज है, जो उस वर्ष गुरुवार के दिन पड़ी थी। हालांकि पत्थर का एक महत्वपूर्ण कोना टूटकर अलग हो जाने के कारण उस पर उकेरा गया शक संवत और संवत्सर का हिस्सा गायब हो चुका है, जिससे सटीक वर्ष का निर्धारण करने में कठिनाई आ रही है। इसके अलावा चार शताब्दियों से अधिक समय बीत जाने के कारण पत्थर की सतह कई जगह से घिस गई है तथा उस पर उकेरी गई लिखावट में कुछ लिपिकीय त्रुटियां भी पाई गई हैं।

संग्रहालय में संरक्षण और ऐतिहासिक महत्व

स्थानीय ग्रामीणों से सूचना प्राप्त होने के उपरांत इस बहुमूल्य पुरातात्विक धरोहर को खेत के सर्वे नंबर 85 से सुरक्षित निकालकर चित्रदुर्ग स्थित सरकारी संग्रहालय में पहुंचा दिया गया है, जहाँ इसे आगे के गहन अध्ययन के लिए संरक्षित रखा गया है। इसके साथ ही पुरातत्व विभाग इस बात की भी प्रामाणिक जांच कर रहा है कि क्या जिस खेत से यह शिलालेख बरामद हुआ है, वही वह वास्तविक भूमि है जिसे इम्मडी चिक्कन्ना नायक ने डोड्डागौड़ा के परिवार को दान में दिया था।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह पुरातात्विक खोज मध्यकालीन भारत की शासन प्रणाली, कामगेति राजवंश की प्रशासनिक परंपराओं, स्थानीय जल प्रबंधन और भूमि अनुदान नियमों को गहराई से समझने में बेहद मददगार साबित होगी। इससे यह भी सिद्ध होता है कि उस दौर के शासक न केवल जनहित के कार्यों को पुरस्कृत करते थे, बल्कि उन पुरस्कारों की भावी सुरक्षा के लिए मजबूत वैधानिक और सामाजिक उपाय भी सुनिश्चित करते थे।

सवाल-जवाब

यह प्राचीन शिलालेख कहाँ और कैसे मिला?
यह शिलालेख कर्नाटक के चित्रदुर्ग जिले के हिरियूर तालुक स्थित जावगोंडनहल्ली गांव में सर्वे नंबर 85 के एक खेत में किसानों द्वारा जुताई करने के दौरान मिला।
शिलालेख में किस बात की डरावनी चेतावनी लिखी गई है?
इसमें लिखा है कि जो व्यक्ति राजा द्वारा अधिकारी डोड्डागौड़ा और उनके वंशजों को इनाम में दी गई 'उम्बली' (कर-मुक्त जमीन) पर कब्जा करने या छीनने की कोशिश करेगा, उसे पवित्र काशी में गोहत्या करने के बराबर पाप लगेगा।
यह शिलालेख किस काल और राजा के शासन से संबंधित है?
यह शिलालेख करीब 450 साल पुराना माना जा रहा है, जो कामगेति वंश के शासक इम्मडी चिक्कन्ना नायक के शासनकाल (1575-1586 ई.) से संबंधित है।
डोड्डागौड़ा को राजा से जमीन इनाम में क्यों मिली थी?
राजा के अधीनस्थ अधिकारी डोड्डागौड़ा ने जावगोंडनहल्ली गांव के लोगों की सुविधा के लिए एक झील का निर्माण करवाया था, जिससे प्रसन्न होकर राजा ने उन्हें कर-मुक्त जमीन उपहार में दी थी।
अब इस प्राचीन शिलालेख को कहाँ रखा गया है?
ग्रामीणों द्वारा सूचना दिए जाने के बाद इस ऐतिहासिक शिलालेख को सुरक्षित रखरखाव और आगे के पुरातात्विक अध्ययन के लिए चित्रदुर्ग के सरकारी संग्रहालय में स्थानांतरित कर दिया गया है।
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