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दिल्ली मतदाता सूची पुनरीक्षण: 33 लाख से अधिक वोटरों को नोटिस, रेखा गुप्ता और अरविंद केजरीवाल का ब्योरा भी जांच के दायरे मेंभारत
19 सित॰ 2026, 10:59 pm (36 मिनट पहले)· 1

दिल्ली मतदाता सूची पुनरीक्षण: 33 लाख से अधिक वोटरों को नोटिस, रेखा गुप्ता और अरविंद केजरीवाल का ब्योरा भी जांच के दायरे में

दिल्ली में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन के तहत 33 लाख से ज्यादा मतदाताओं के रिकॉर्ड में विसंगतियां मिलने पर नोटिस जारी किए गए हैं। चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि नोटिस का अर्थ नाम कटना नहीं, बल्कि दस्तावेजों का सत्यापन है।

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष सघन पुनरीक्षण यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर प्रशासनिक और राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। निर्वाचन अधिकारियों की जांच प्रक्रिया के दौरान 33 लाख से अधिक मतदाताओं के विवरण में विसंगतियां या मैपिंग संबंधी खामियां सामने आई हैं। इन मतदाताओं को स्थिति स्पष्ट करने के लिए औपचारिक नोटिस भेजे गए हैं। इस प्रक्रिया के दायरे में दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल और पूर्व दिल्ली BJP अध्यक्ष वीरेंद्र सचदेवा जैसे कई प्रमुख चेहरे भी आ गए हैं। निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट किया है कि इस नोटिस का मतलब मतदाता सूची से नाम हटा दिया जाना कतई नहीं है, बल्कि यह केवल रिकॉर्ड को दुरुस्त करने के लिए की जा रही पड़ताल का हिस्सा है।

विशाल पुनरीक्षण अभियान और नोटिस का गणित

दिल्ली के मुख्य निर्वाचन कार्यालय की ओर से जुटाए गए आंकड़ों के मुताबिक, कुल 33,12,919 मतदाताओं को नोटिस की श्रेणी में दर्ज किया गया है। इन सभी मतदाताओं को दो अलग-अलग तकनीकी आधारों पर चिह्नित किया गया है। इनमें से 13,79,785 मतदाता ऐसे हैं जिनका डेटा साल 2002 में हुए पिछले स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन की पुरानी वोटर लिस्ट से सीधे तौर पर मेल नहीं खा सका। वहीं, दूसरी श्रेणी में 19,33,134 मतदाता शामिल हैं जिनके रिकॉर्ड में तार्किक अथवा कागजी विसंगतियां पाई गई हैं। निर्वाचन अधिकारियों का कहना है कि 31 अगस्त को जो ड्राफ्ट वोटर लिस्ट सार्वजनिक की गई थी, उसमें इन सभी नागरिकों के नाम अभी भी शामिल हैं। इसलिए किसी भी नागरिक को यह नहीं समझना चाहिए कि उनका मताधिकार तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दिया गया है।

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प्रमुख राजनीतिक हस्तियों के विवरण में मिली खामियां

इस प्रशासनिक सत्यापन की जद में सत्तापक्ष और विपक्ष के कई वरिष्ठ नाम भी आए हैं। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के मामले में निर्वाचन रिकॉर्ड में दर्ज उनके और उनके माता-पिता की उम्र के फासले को लेकर तार्किक विसंगति दर्ज की गई है। इसी प्रकार, पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का नाम उन लोगों की सूची में आया है जिनका वर्तमान ब्योरा साल 2002 की पुरानी सूची से मैप नहीं हो पा रहा है। अरविंद केजरीवाल के अलावा उनके परिवार के अन्य सदस्यों को भी नोटिस जारी हुआ है, जिनमें उनकी पत्नी सुनीता केजरीवाल, पिता गोविंद राम केजरीवाल, माता गीता देवी और पुत्र पुलकित केजरीवाल शामिल हैं। इसके साथ ही राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल का रिकॉर्ड भी वर्ष 2002 के पुराने रिवीजन डेटा से मेल न खाने के कारण जांच के दायरे में है। वहीं, पूर्व दिल्ली BJP अध्यक्ष वीरेंद्र सचदेवा के नाम की स्पेलिंग अथवा विवरण में विसंगति सामने आई है, जिसके चलते उन्हें और उनकी पत्नी दोनों को नोटिस भेजा गया है।

दावे, आपत्तियां और अंतिम सूची की समयसीमा

निर्वाचन प्रक्रिया के तय कार्यक्रम के तहत सभी प्रभावित मतदाताओं को अपनी बात रखने और दस्तावेज प्रस्तुत करने का पर्याप्त समय दिया जा रहा है। दिल्ली स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन में दावों और आपत्तियों को दर्ज कराने की आखिरी तारीख 30 सितंबर 2026 निर्धारित की गई है। यदि किसी योग्य नागरिक का नाम 31 अगस्त की ड्राफ्ट सूची में शामिल होने से पूरी तरह छूट गया है, तो वह फॉर्म-6 (Form-6) भरकर नाम जुड़वाने का औपचारिक दावा प्रस्तुत कर सकता है। इसके बाद सभी प्राप्त दावों, आपत्तियों और भेजे गए नोटिसों पर सुनवाई तथा उनके निस्तारण की विस्तृत प्रक्रिया 29 अक्टूबर तक चलेगी। संबंधित निर्वाचन अधिकारी सभी कागजात और पक्षों को सुनने के उपरांत अंतिम फैसला लेंगे, जिसके बाद 4 नवंबर 2026 को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की जाएगी।

नोटिस की प्रक्रिया और ड्राफ्ट सूची के आंकड़े

प्रशासनिक स्तर पर यह स्पष्ट किया गया है कि नोटिस मिलना एक सामान्य विधिक प्रक्रिया है ताकि मतदाता सूची पूरी तरह त्रुटिहीन और पारदर्शी बन सके। जिन लोगों को नोटिस मिला है, उन्हें तय सुनवाई के दौरान उपस्थित होकर या मांगे गए आवश्यक पहचान और पते के दस्तावेज दिखाकर अपनी स्थिति साफ करनी होगी। अधिकारी दस्तावेजों की पुष्टि के बाद ही यह निर्णय करेंगे कि नाम को अंतिम सूची में बनाए रखा जाए अथवा नहीं। आंकड़ों की दृष्टि से देखें तो इस सघन पुनरीक्षण से पहले दिल्ली में कुल पंजीकृत मतदाताओं की संख्या लगभग 1.45 करोड़ थी। 31 अगस्त को जारी की गई ड्राफ्ट सूची में करीब 97.54 लाख नाम दर्ज हैं, जबकि लगभग 47.57 लाख नाम इस प्रारंभिक ड्राफ्ट में शामिल नहीं हो सके हैं। जिन लोगों के नाम इस सूची से बाहर रह गए हैं, उनके पास भी 30 सितंबर तक अपने दावे और आपत्तियां दाखिल करने का पूरा कानूनी अवसर मौजूद है।

सवाल-जवाब

क्या नोटिस मिलने का मतलब मतदाता सूची से नाम कटना है?
नहीं, नोटिस का मतलब नाम कटना नहीं है बल्कि रिकॉर्ड में मिली विसंगति को दूर करने के लिए स्पष्टीकरण और दस्तावेज मांगना है।
दिल्ली में कितने मतदाताओं को जांच का नोटिस भेजा गया है?
दिल्ली में कुल 33,12,919 मतदाताओं को नोटिस की श्रेणी में रखा गया है।
दावे और आपत्तियां दर्ज कराने की अंतिम तिथि क्या है?
मतदाता अपने दावे और आपत्तियां 30 सितंबर 2026 तक जमा करा सकते हैं।
जिन लोगों का नाम ड्राफ्ट लिस्ट में नहीं है वे क्या कर सकते हैं?
जिनका नाम ड्राफ्ट सूची में नहीं है, वे फॉर्म-6 (Form-6) भरकर नाम जुड़वाने का दावा कर सकते हैं।
दिल्ली की अंतिम मतदाता सूची कब जारी की जाएगी?
सभी सुनवाई और आपत्तियों के निस्तारण के बाद 4 नवंबर 2026 को अंतिम वोटर लिस्ट प्रकाशित होगी।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·7 मिनट पहले

राजधानी में तीन लाख से अधिक मतदाताओं को नोटिस जारी होना और उसमें मुख्यधारा के शीर्ष राजनीतिक चेहरों का शामिल होना प्रशासनिक पारदर्शिता पर बड़े सवाल खड़े करता है। हालांकि चुनाव आयोग ने इसे महज डेटा सुधार बताया है, लेकिन आगामी चुनावों से ठीक पहले इस तरह की व्यापक प्रशासनिक प्रक्रिया से राजनीतिक गलियारों में सुगबुगाहट तेज हो गई है। यह देखना अहम होगा कि क्या निर्वाचन तंत्र तय समयसीमा में इतने बड़े पैमाने पर आपत्तियों का निस्तारण कर पाता है या नहीं।

Karan Malhotra@karan-malhotra·7 मिनट पहले

रोहन वर्मा के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, एक क्राइम और कानूनी मामलों के संवाददाता के रूप में मेरा मानना है कि 33 लाख से अधिक मामलों में इस तरह का तकनीकी सत्यापन कानून-व्यवस्था और डेटा सुरक्षा के लिहाज से एक संवेदनशील प्रशासनिक चुनौती है। चुनाव आयोग के लिए इतनी बड़ी संख्या में विसंगतियों को समयबद्ध तरीके से सुलझाना और यह सुनिश्चित करना कि किसी भी वैध नागरिक का मताधिकार प्रभावित न हो, एक बड़ी कानूनी और तार्किक परीक्षा होगी। इस प्रक्रिया के दौरान यदि निष्पक्षता और पारदर्शिता पर किसी भी स्तर पर सवाल उठे, तो यह प्रशासनिक मशीनरी पर बड़ा दबाव बना सकता है।

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