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लद्दाख में सरहद संभाल रहे नायब सूबेदार का फरीदाबाद वाला घर जमींदोज, बिलखती रहीं पत्नी और पल भर में मिट्टी हो गई 37 लाख की कमाईहरियाणा
24 जून 2026, 11:08 am (45 दिन पहले)· 7

लद्दाख में सरहद संभाल रहे नायब सूबेदार का फरीदाबाद वाला घर जमींदोज, बिलखती रहीं पत्नी और पल भर में मिट्टी हो गई 37 लाख की कमाई

फरीदाबाद के साहुपुरा में अवैध कॉलोनी पर चली तोड़फोड़ की चपेट में सेना के नायब सूबेदार रामकुमार का निर्माणाधीन मकान भी आ गया, जबकि वे इस वक्त लद्दाख में तैनात हैं। मकान बचाने की गुहार लगाती उनकी पत्नी रेखा चौहान को मौके पर हटा दिया गया।

एक तरफ देश की ऊंची बर्फीली सरहद पर माइनस तापमान में पहरा देता एक फौजी और दूसरी तरफ उसके सपनों का अधूरा घर, जिस पर पल भर में जेसीबी चल गई। फरीदाबाद के साहुपुरा गांव की राजस्व सीमा में अवैध कॉलोनी के खिलाफ चले तोड़फोड़ अभियान की चपेट में सेना के नायब सूबेदार रामकुमार का निर्माणाधीन मकान भी आ गया। यह कहानी सिर्फ एक मकान के गिरने की नहीं है, बल्कि उस परिवार की भी है जिसका एक बेटा देश के लिए शहीद हो चुका है और दूसरा अब भी वर्दी में खड़ा है।

जैसे ही मकान पर जेसीबी का पंजा पड़ा, रामकुमार की पत्नी रेखा चौहान रोते हुए घर बचाने की मिन्नतें करने लगीं। मौके पर तैनात महिला पुलिसकर्मियों ने उन्हें वहां से हटाया और काफी देर तक बहस और हंगामे का माहौल बना रहा।

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एक साल की मेहनत, मिनटों में खाक

रेखा चौहान बताती हैं कि यह मकान करीब एक साल पहले बनना शुरू हुआ था और अभी निर्माण चल ही रहा था। 97 गज के इस मकान को खड़ा करने में अब तक करीब 12 लाख रुपये लग चुके थे, जबकि जमीन 25 लाख रुपये में खरीदी गई थी। यानी कुल मिलाकर 37 लाख रुपये की पूंजी पल भर में मिट्टी में मिल गई।

उनके मुताबिक रामकुमार सेना में नायब सूबेदार हैं और इस समय लद्दाख में तैनात हैं। रेखा का आरोप है कि मकान गिराए जाने का विरोध करने पर महिला पुलिसकर्मियों ने उनके साथ धक्का-मुक्की की, जिससे उनके हाथ और सिर में चोट आ गई। वे कहती हैं कि उन्होंने सिर्फ इतनी गुजारिश की थी कि जितना हिस्सा टूट चुका है उतना ही सही, बाकी बचा हुआ हिस्सा छोड़ दिया जाए। कार्रवाई से पहले उन्हें कोई नोटिस तक नहीं दिखाया गया।

30 साल की सेवा, एक बेटा शहीद

रेखा की सास रामवती का दर्द भी कम नहीं है। वे बताती हैं कि उनके बेटे रामकुमार को सेना में करीब 30 साल हो चुके हैं। जमीन खरीदी गई थी और उससे जुड़े दस्तावेज भी उनके पास मौजूद हैं, लेकिन रजिस्ट्री इसलिए नहीं हो पाई क्योंकि उस वक्त रजिस्ट्री की प्रक्रिया बंद थी। रामवती के मुताबिक मकान गिराने से पहले कोई नोटिस नहीं दिया गया। उनके दो बेटे सेना में रहे हैं, जिनमें से एक ड्यूटी के दौरान शहीद हो चुका है, जबकि रामकुमार आज भी देश की सेवा में डटे हुए हैं।

दो साल पहले आया था परिवार

रामकुमार की बेटी इंजल चौहान बताती हैं कि परिवार को साहुपुरा आए करीब दो साल हुए हैं और इसी वजह से यहां अपना घर बनाने का फैसला लिया गया था। इंजल के मुताबिक उनकी मां रेखा चौहान ब्रेन ट्यूमर की मरीज हैं और उनका ऑपरेशन भी हो चुका है। सिर में 55 टांके लगे हैं और इलाज दिल्ली के आर्मी अस्पताल में चल रहा है। इंजल का आरोप है कि विरोध के दौरान महिला पुलिसकर्मियों ने उनकी मां को जमीन पर गिरा दिया, जबकि वे लगातार अपनी बीमारी के बारे में बताती रहीं।

इंजल कहती हैं कि परिवार को कोई नोटिस नहीं मिला और यह घर सेना की नौकरी से बचाए गए पैसों को जोड़कर बनाया गया था। रजिस्ट्री के लिए आवेदन और फीस भी जमा कराई जा चुकी है, बस प्रक्रिया में देरी चल रही है। उनके शब्दों में, एक तरफ पिता माइनस तापमान में देश की हिफाजत कर रहे हैं और इधर परिवार अपने सपनों का घर अपनी आंखों के सामने टूटता देखने को मजबूर हो गया।

सवाल-जवाब

यह घटना कहां हुई?
यह घटना हरियाणा के फरीदाबाद में साहुपुरा गांव की राजस्व सीमा में हुई, जहां अवैध कॉलोनी के खिलाफ तोड़फोड़ अभियान चलाया गया।
किसका मकान गिराया गया?
सेना के नायब सूबेदार रामकुमार का निर्माणाधीन मकान गिराया गया, जो इस समय लद्दाख में तैनात हैं।
मकान बनाने में कितना खर्च हुआ था?
97 गज के इस मकान को बनाने में करीब 12 लाख रुपये खर्च हुए थे, जबकि जमीन 25 लाख रुपये में खरीदी गई थी, यानी कुल करीब 37 लाख रुपये।
क्या परिवार को पहले नोटिस दिया गया था?
परिवार का कहना है कि मकान गिराने से पहले उन्हें कोई नोटिस नहीं दिया गया और न ही दिखाया गया।
रजिस्ट्री क्यों नहीं हो पाई थी?
परिवार के मुताबिक जमीन के दस्तावेज मौजूद हैं, लेकिन रजिस्ट्री इसलिए नहीं हो पाई क्योंकि उस वक्त रजिस्ट्री की प्रक्रिया बंद थी; आवेदन और फीस जमा करा दी गई थी पर प्रक्रिया में देरी थी।
रेखा चौहान की तबीयत को लेकर क्या जानकारी है?
रेखा चौहान ब्रेन ट्यूमर की मरीज हैं, उनका ऑपरेशन हो चुका है, सिर में 55 टांके लगे हैं और इलाज दिल्ली के आर्मी अस्पताल में चल रहा है।
परिवार साहुपुरा कब आया था?
रामकुमार की बेटी इंजल चौहान के मुताबिक परिवार को साहुपुरा आए करीब दो साल हुए हैं।
क्या परिवार के किसी सदस्य ने शहादत दी है?
हां, रामवती के दो बेटे सेना में रहे हैं, जिनमें से एक बेटा ड्यूटी के दौरान शहीद हो चुका है, जबकि रामकुमार अभी भी सेवा में हैं।
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