जलवायु में आने वाला बदलाव मानव शरीर की कार्यप्रणाली को सीधे तौर पर प्रभावित करता है, जिसके चलते खानपान और दिनचर्या में अनुकूल फेरबदल करना आवश्यक हो जाता है। अक्सर लोग मौसम के मिजाज में परिवर्तन आने के बाद भी अपने पुराने भोजन चक्र को बिना किसी बदलाव के जारी रखते हैं। इस असावधानी का प्रतिकूल प्रभाव शारीरिक स्वास्थ्य पर दिखने लगता है। ऐसे संधिकाल में पेट की गड़बड़ी, कमजोर पाचन क्रिया और सर्दी-जुकाम जैसी व्याधियां लोगों को तेजी से अपनी चपेट में ले लेती हैं। हरियाणा के अंबाला स्थित नागरिक अस्पताल में भी बदलते मौसम के दौरान विभिन्न प्रकार की शारीरिक समस्याओं और शिकायतों को लेकर लोग चिकित्सकीय परामर्श लेने पहुंच रहे हैं।
आयुर्वेद में ऋतु परिवर्तन और भोजन का नियम
अंबाला छावनी नागरिक अस्पताल के आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ. जितेंद्र वर्मा के अनुसार, आयुर्वेद पद्धति में प्रत्येक ऋतु के हिसाब से दैनिक दिनचर्या, खानपान और जीवनशैली के विशेष दिशा-निर्देश तय किए गए हैं। जब एक मौसम समाप्त होकर दूसरा मौसम दस्तक देता है, तो शरीर की आंतरिक प्रणाली को नई जलवायु परिस्थितियों के अनुकूल ढलने में थोड़ा समय लगता है। इसी वजह से इस संधिकाल के दौरान अपने आहार को लेकर अतिरिक्त सतर्कता बरतनी चाहिए।
डॉ. जितेंद्र वर्मा ने स्पष्ट किया कि एक ऋतु के समापन से लगभग 15 दिन पूर्व और आगामी नई ऋतु के शुरुआती 15 दिनों की अवधि बेहद संवेदनशील होती है। कुल मिलाकर यह एक महीने का समय खानपान के मामले में विशेष संयम रखने का होता है। उन्होंने परामर्श दिया कि इस बदलाव के समय अत्यधिक खटाई, चावल और दही का अत्यधिक या अनियंत्रित सेवन कम कर देना चाहिए अथवा इससे पूरी तरह दूरी बना लेनी चाहिए, ताकि शरीर का संतुलन न बिगड़े।
अदरक, लहसुन और गर्म मसालों से पाचन को मजबूती
पाचन शक्ति को दुरुस्त बनाए रखने के लिए डॉ. जितेंद्र वर्मा ने भोजन तैयार करते समय काली मिर्च और खड़े गर्म मसालों के संतुलित उपयोग की सलाह दी है। वर्तमान समय में मंडियों और बाजारों में नई अदरक उपलब्ध होने लगी है। ऐसे में भोजन में नियमित रूप से अदरक को शामिल करना स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध हो सकता है। अदरक जठराग्नि को प्रदीप्त करने में सहायक मानी जाती है, जिससे भोजन का पाचन सुचारू रूप से होता है।
इसी क्रम में लहसुन को भी इस संधिकाल के भोजन में उचित स्थान दिया जा सकता है। इसके विपरीत दही के उपयोग को लेकर चिकित्सक ने विशेष हिदायत दी है। उन्होंने रेखांकित किया कि मौसम के बदलाव वाले दिनों में दही के सेवन से हरसंभव बचना चाहिए। आयुर्वेद के सिद्धांतों के अनुसार दही का सेवन केवल अनुकूल ऋतु में ही हितकर होता है। यदि किसी को दही का सेवन करना भी हो, तो उसे केवल दोपहर के समय ही लेना चाहिए। इसके अलावा दही कभी भी खाली नहीं खाना चाहिए, बल्कि उसके साथ दाल अथवा पकी हुई सब्जी अवश्य शामिल होनी चाहिए।
मौसमी सब्जियों की स्वच्छता और ठंडे पेयों से दूरी
सब्जियों के चयन पर प्रकाश डालते हुए डॉ. वर्मा ने कहा कि हमेशा प्राकृतिक रूप से बाजार में उपलब्ध मौसमी सब्जियों को ही अपनी थाली का हिस्सा बनाना चाहिए। यदि घर में पर्याप्त स्थान उपलब्ध हो, तो अपने आंगन या किचन गार्डन में उगाई गई ताजी सब्जियों का उपयोग करना सबसे उत्तम विकल्प है। बाजार से खरीदी गई सब्जियों के संबंध में उन्होंने स्वच्छता के कड़े नियम अपनाने पर बल दिया। सब्जियों को पकाने से पहले अच्छी तरह साफ पानी से धोना चाहिए अथवा कुछ समय के लिए हल्के नमक वाले पानी में भिगोकर रखना चाहिए, जिससे उन पर मौजूद अशुद्धियां पूरी तरह हट जाएं।
बदलते परिवेश में ठंडी खाद्य सामग्रियों के उपभोग में कटौती करना अनिवार्य है। कई लोग इस मौसम में भी आइसक्रीम, अत्यधिक ठंडा पानी और कोल्ड शेक पीने की आदत बनाए रखते हैं, जो स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकती है। डॉ. जितेंद्र वर्मा ने केला शेक और पपीता शेक जैसे भारी व ठंडे पेय पदार्थों से फिलहाल पूरी तरह परहेज करने की सलाह दी है। ठंडी चीजों के स्थान पर गुनगुने पानी और गर्म दूध का सेवन करना श्रेयस्कर रहेगा। पानी को पहले अच्छी तरह उबालकर, फिर उसे सामान्य तापमान या हल्का गुनगुना रहने पर पीना स्वास्थ्य रक्षा के लिए एक बेहतरीन आदत है।
शारीरिक तासीर के आधार पर मेवों का चयन
सूखे मेवों के उपभोग के संदर्भ में डॉ. जितेंद्र वर्मा ने बताया कि ड्राई फ्रूट्स का चयन प्रत्येक व्यक्ति को अपने शरीर की मूल तासीर और व्यक्तिगत आवश्यकता के अनुसार ही करना चाहिए। इस अवधि में बादाम और अखरोट का सेवन किया जा सकता है। बादाम को हमेशा रातभर पानी में भिगोकर रखने के उपरांत सुबह अथवा किसी अन्य उपयुक्त समय पर खाना ज्यादा गुणकारी होता है। इसके साथ ही मुनक्का और अंजीर जैसे पोषक तत्वों से भरपूर मेवों को भी आहार योजना में शामिल किया जा सकता है। मौसम बदलने के नाजुक दौर में भोजन में किए गए ये छोटे-छोटे वैज्ञानिक बदलाव शरीर को बिना बीमार पड़े नई ऋतु में सहजता से प्रवेश कराने में सक्षम हैं।


















