डिजिटल स्पेस में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार ने कड़े कदम उठाए हैं। ऑनलाइन मंचों की स्वेच्छाचारिता पर लगाम लगाते हुए सरकार ने डिजिटल सुरक्षा तंत्र को मजबूत करने के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने संसद के निचले सदन यानी लोकसभा में इस विषय पर महत्वपूर्ण जानकारी प्रस्तुत की। उन्होंने स्पष्ट किया कि बच्चों के लिए हानिकारक सामग्री पर सोशल मीडिया कंपनियों को निरंतर निगरानी रखनी होगी। यदि किसी अदालत या प्रशासनिक प्राधिकरण का आदेश आता है, तो संबंधित प्लेटफॉर्म को आपत्तिजनक सामग्री को 3 घंटे की समयसीमा के भीतर हटाना अनिवार्य होगा। इसके साथ ही, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) से निर्मित फर्जी कंटेंट और डीपफेक पर भी नियम कड़े कर दिए गए हैं।
डिजिटल स्पेस को सुरक्षित बनाने का संकल्प और एआई कंटेंट पर पाबंदी
लोकसभा में चर्चा के दौरान सूचना और प्रसारण राज्य मंत्री डॉ एल मुरुगन ने सरकार के विजन को रेखांकित किया। उन्होंने कहा,
"भारत का इंटरनेट सुरक्षित और भरोसेमंद बनाया जाएगा।"उन्होंने आगे जोर देकर बताया कि सोशल मीडिया कंपनियों को एआई जनित भ्रामक कंटेंट के प्रसार को रोकने के लिए अपने तकनीकी तंत्र में आवश्यक बदलाव करने ही होंगे।
10 फरवरी 2026 से प्रभावी नए आईटी नियमों के अंतर्गत डीपफेक और फर्जी एआई कंटेंट के खिलाफ कठोर कानूनी प्रावधान किए गए हैं। इन नियमों का पालन न करने वाले डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को आईटी अधिनियम के तहत मिलने वाली मध्यस्थ कानूनी सुरक्षा (सेफ हार्बर) से वंचित कर दिया जाएगा। कानूनी सुरक्षा समाप्त होने के बाद ऐसी कंपनियों पर सीधे दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।
डीपीडीपी एक्ट 2023 और बच्चों की डिजिटल प्राइवेसी के सुरक्षात्मक प्रावधान
बच्चों की ऑनलाइन प्राइवेसी और सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट 2023 के तहत विशेष नियम लागू किए गए हैं। अब किसी भी बच्चे के डिजिटल डेटा को प्रोसेस करने से पूर्व उनके माता-पिता या कानूनी अभिभावक की स्पष्ट सहमति प्राप्त करना अनिवार्य बना दिया गया है।
इसके अतिरिक्त, इंटरनेट पर बच्चों की गतिविधियों की ट्रैकिंग और उनके ऑनलाइन व्यवहार की मॉनिटरिंग करने पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया है। बच्चों को केंद्रित करके दिखाए जाने वाले विज्ञापनों (टार्गेटेड ऐड्स) पर भी रोक लगा दी गई है। नए नियमों के अनुसार, सोशल मीडिया कंपनियों के लिए यह अनिवार्य कर दिया गया है कि यदि उनके प्लेटफॉर्म पर बच्चों से जुड़ा कोई अपराध सामने आता है, तो वे पॉक्सो एक्ट और भारतीय न्याय संहिता के तहत संबंधित जांच एजेंसियों को तुरंत सूचित करें।
राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर नए फीचर्स और गुमनाम शिकायत सुविधा
नागरिकों को साइबर अपराधों से बचाने के लिए नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP) पर आधुनिक तकनीकी सुविधाएं जोड़ी गई हैं। अब महिलाएं और बच्चे बिना अपनी पहचान उजागर किए गुमनाम रहकर इस पोर्टल पर साइबर सुरक्षा से जुड़ी शिकायतें दर्ज करा सकते हैं।
एनसीआरपी पोर्टल पर 'रिपोर्ट एंड चेक सस्पेक्ट' नाम से एक नया फीचर शामिल किया गया है। इस सुविधा के माध्यम से आम नागरिक किसी भी संदिग्ध वेबसाइट, ऑनलाइन लिंक या व्हाट्सएप नंबर की विश्वसनीयता की जांच आसानी से कर सकते हैं। इसके अलावा, टेलीग्राम हैंडल तथा डीपफेक से जुड़े सोशल मीडिया लिंक्स की शिकायत भी सीधे पोर्टल के जरिए की जा सकती है।
जन-जागरूकता अभियान, शैक्षणिक पाठ्यक्रम और बुनियादी ढांचे का विस्तार
साइबर सुरक्षा के प्रति नागरिकों को जागरूक करने के उद्देश्य से इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के ISEA कार्यक्रम के तहत देशभर में हजारों कार्यशालाओं का आयोजन किया गया है। इन जागरूकता कार्यक्रमों में अब तक 11 लाख से अधिक नागरिकों ने भाग लिया है। सरकार और CERT-In लगातार साइबर सुरक्षा से संबंधित मार्गदर्शिकाएं (हैंडबुक) और निर्देशात्मक वीडियो जारी कर रहे हैं। शिक्षा मंत्रालय और सीबीएसई ने भी इस विषय की महत्ता को समझते हुए साइबर सुरक्षा को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया है।
संस्थागत स्तर पर भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) ने एनसीसी और एनएसएस से जुड़े 2 लाख से अधिक विद्यार्थियों को साइबर सुरक्षा का व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान किया है। महिलाओं के विरुद्ध होने वाले साइबर अपराधों की रोकथाम के लिए राज्यों को 132 करोड़ रुपये से अधिक का वित्तीय आवंटन किया गया है। जांच क्षमता बढ़ाने के लिए देश के 33 स्थानों पर साइबर फॉरेंसिक प्रयोगशालाएं स्थापित की गई हैं, और 24 हजार से अधिक पुलिस अधिकारियों एवं कर्मियों को फॉरेंसिक तथा अपराध जांच में प्रशिक्षित किया जा चुका है।



















