भारत और म्यांमार मणिपुर से लगी अपनी साझा अंतरराष्ट्रीय सीमा के एक लंबित हिस्से को सुलझाने के लिए एक संभावित क्षेत्रीय अदला-बदली के विकल्प पर चर्चा कर रहे हैं। हालांकि भारत सरकार ने भूमि विनिमय से जुड़ी खबरों की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है, लेकिन विदेश मंत्रालय ने यह स्वीकार किया है कि सीमा के उन हिस्सों को लेकर दोनों देशों के बीच कूटनीतिक बातचीत जारी है, जहां अब तक अंतिम सीमांकन पूरा नहीं हो पाया है।
विदेश मंत्रालय का आधिकारिक बयान
नई दिल्ली में मंगलवार को आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल से मणिपुर सीमा पर प्रस्तावित भूमि अदला-बदली की खबरों पर सवाल पूछा गया। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए रणधीर जायसवाल ने कहा, "सीमा पर कुछ ऐसे क्षेत्र हैं, जिनका निर्धारण अभी बाकी है। उन सेक्टरों को लेकर दोनों देशों के बीच चर्चा जारी है।" विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने रिपोर्टों की सीधे तौर पर पुष्टि या खंडन नहीं किया, लेकिन उनके बयान से यह स्पष्ट हो गया कि दोनों पड़ोसी देशों के बीच लंबे समय से लंबित सीमा निर्धारण के मुद्दे पर बातचीत की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है।
प्रस्तावित भूमि विनिमय और प्रभावित क्षेत्र
एक आधिकारिक दस्तावेज, जिसकी तारीख 26 मई 2026 दर्ज है, के अनुसार मणिपुर की म्यांमार सीमा पर बॉर्डर पिलर 65 और बॉर्डर पिलर 68 के बीच लगभग 1.4 वर्ग मील क्षेत्र की अदला-बदली करके सीमांकन की प्रक्रिया को पूरा करने का प्रस्ताव विचाराधीन है। पिलर 65 और 68 के बीच की कुल दूरी लगभग 2.8 किलोमीटर लंबी है। यह प्रस्तावित इलाका मणिपुर के चंदेल जिले में स्थित है, जो म्यांमार के सागाइंग क्षेत्र की कबाव घाटी से सटा हुआ है। 26 मई 2026 के आधिकारिक दस्तावेज में अनुमान जताया गया था कि सीमांकन का यह कार्य तीन महीने की अवधि में यानी अगस्त के आसपास पूरा कर लिया जाएगा।
भारत-म्यांमार सीमा का भौगोलिक और प्रशासनिक संदर्भ
भारत और म्यांमार आपस में लगभग 1,643 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा साझा करते हैं। यह सीमा पूर्वोत्तर के चार राज्यों यानी अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर और मिजोरम से होकर गुजरती है। इनमें से मणिपुर के कुछ विशिष्ट हिस्सों में सीमा का अंतिम निर्धारण अब तक पूरा नहीं हो सका था, जिसके कारण क्षेत्रीय प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों को समय-समय पर विभिन्न चुनौतियों का सामना करना पड़ता रहा है। दोनों देशों के बीच जारी मौजूदा बातचीत का उद्देश्य इन अनसुलझे क्षेत्रों में स्पष्ट सीमांकन स्थापित करना है।



















