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मंडी जिले में ई-बसों ने 24 दिनों में कराई 19.31 लाख रुपये की बचत, सुक्खू सरकार की पहल से एचआरटीसी को मिला बड़ा वित्तीय लाभहिमाचल प्रदेश
21 सित॰ 2026, 2:44 pm (46 दिन पहले)· 1

मंडी जिले में ई-बसों ने 24 दिनों में कराई 19.31 लाख रुपये की बचत, सुक्खू सरकार की पहल से एचआरटीसी को मिला बड़ा वित्तीय लाभ

मंडी और सुंदरनगर डिपो में नई इलेक्ट्रिक बसों ने पारंपरिक डीजल के मुकाबले संचालन लागत काफी घटा दी है। महज 24 दिनों के भीतर हिमाचल पथ परिवहन निगम को 19.31 लाख रुपये से अधिक की सीधी वित्तीय बचत हुई है।

हिमाचल पथ परिवहन निगम के बेड़े में पर्यावरण अनुकूल वाहनों को जोड़ने की कवायद अब धरातल पर ठोस वित्तीय और पर्यावरणीय नतीजे दिखाने लगी है। मंडी जिले के सार्वजनिक परिवहन तंत्र को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से शामिल की गईं 25 नई इलेक्ट्रिक बसें स्थानीय यात्रियों को शांत और सुगम सफर देने के साथ-साथ निगम के वित्तीय घाटे को पाटने में भी मददगार साबित हो रही हैं। राज्य सरकार की मंशा आने वाले पांच वर्षों के दौरान परिवहन निगम को पूरी तरह से आत्मनिर्भर बनाने की है, और संचालन के शुरुआती आंकड़ों से स्पष्ट है कि यह बदलाव परिवहन व्यवस्था की दिशा बदल रहा है। पारंपरिक ईंधन की तुलना में ऊर्जा खपत पर होने वाला खर्च प्रति किलोमीटर लगभग 12 से 13 रुपये तक कम हो चुका है, जिससे निगम के दैनिक संचालन व्यय में भारी राहत दर्ज की गई है।

मंडी जिले में महत्वपूर्ण मार्गों पर दौड़ीं नई बसें

मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने 17 अगस्त को डिजिटल माध्यम से हरी झंडी दिखाकर मंडी जिले के लिए इन 25 ई-बसों के संचालन का शुभारंभ किया था। इसके तुरंत बाद जिला प्रशासन और डिपो प्रबंधन ने इन्हें प्रमुख अंतर-जिला मार्गों के साथ-साथ ग्रामीण व उप-शहरी संपर्कों पर तैनात कर दिया। लंबी दूरी के रूटों में मंडी से शिमला, मंडी से पालमपुर, मंडी से चंडीगढ़ तथा मंडी-शिमला-तुलाह मार्ग शामिल हैं। वहीं स्थानीय और ग्रामीण संपर्कों की बात करें तो मंडी से सुंदरनगर, मंडी से बटाहर, मंडी से तांदी, मंडी से पाली, मंडी से रोपा, मंडी से रिवालसर-नैनादेवी, मंडी से कोट, मंडी से कोटली, मंडी से माहन और मंडी से दुर्गापुर जैसे रूटों पर इन बसों ने नियमित फेरे लगाने शुरू कर दिए हैं।

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यात्रियों ने सराहा शोरमुक्त और आरामदायक अनुभव

इलेक्ट्रिक बसों के सड़कों पर उतरते ही दैनिक यात्रियों की प्रतिक्रिया बेहद सकारात्मक रही है। लंबे समय से डीजल बसों के शोर और कंपन से जूझ रहे मुसाफिरों के लिए यह सफर किसी सुखद बदलाव से कम नहीं है। मंडी के ज्वालापुर इलाके के निवासी इंद्र ठाकुर ने मंडी से शिमला तक का सफर इस बस से पूरा करने के बाद कहा, "सफर बहुत अच्छा और आरामदायक रहा। इससे पर्यावरण को नुकसान नहीं होता। राज्य सरकार का यह प्रयास सराहनीय है, इसके लिए मुख्यमंत्री और प्रदेश सरकार का आभार।" उन्होंने जोर देकर कहा कि प्रदूषण रहित सफर आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है।

दुर्गापुर रूट पर सफर करने वाली वंशिका जम्वाल ने भी अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि सामान्य बसों की तुलना में इन नई गाड़ियों की बैठक व्यवस्था काफी आरामदायक है और यात्रा पूरी तरह थकावट मुक्त रहती है। उन्होंने उम्मीद जताई कि प्रशासन जल्द ही अन्य ग्रामीण रूटों पर भी ऐसी ही गाड़ियां उतारेगा ताकि दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले आम नागरिकों को भी आधुनिक परिवहन का लाभ मिल सके। इसी तरह तुलाह जाने वाले जसवंत कुमार ने रेखांकित किया कि केबिन के भीतर इंजन की आवाज बिल्कुल न के बराबर है, जिससे यात्रा बेहद शांत रहती है। कोटली निवासी किरण राणा ने भी सरकार के कदम का स्वागत करते हुए कहा कि सीटों की बेहतर बनावट से बुजुर्गों और महिलाओं के लिए लंबी यात्राएं काफी सहज हो गई हैं।

मंडी डिपो में दर्ज हुआ 11.34 लाख रुपये का शुद्ध लाभ

वित्तीय आंकड़ों पर नजर डालें तो हरित परिवहन का यह मॉडल निगम के लिए अत्यंत लाभकारी साबित हुआ है। निगम के मंडलीय प्रबंधक उत्तम सिंह के विवरण के मुताबिक, 17 अगस्त 2026 से 10 सितम्बर 2026 तक के 24 दिनों में दोनों डिपो की ई-बसों का परिचालन प्रदर्शन बेहतरीन रहा है। मंडी डिपो को आवंटित 15 बसों ने इस दौरान कुल 60,060 किलोमीटर का फासला तय किया। इस दूरी को पूरा करने के लिए बिजली चार्जिंग पर कुल 7,95,795 रुपये का खर्च आया। यदि इन्हीं रूटों पर निगम की पुरानी डीजल बसें चलाई जातीं, तो ईंधन पर 19,30,055 रुपये खर्च होते। इस तरह मंडी यूनिट ने ईंधन के मद में सीधे 11,34,260 रुपये की शुद्ध बचत दर्ज की है।

सुंदरनगर इकाई में भी राजस्व को मिला सहारा

यही उत्साहजनक रुझान सुंदरनगर डिपो में भी देखने को मिला, जहां 10 इलेक्ट्रिक बसों को विभिन्न रूटों पर उतारा गया था। इन 10 बसों ने 24 दिनों की समान अवधि में कुल 35,044 किलोमीटर का सफर तय किया। इस संचालन के दौरान बिजली बिल और चार्जिंग का कुल व्यय मात्र 2,10,037 रुपये रहा, जबकि डीजल इंजन से इतनी दूरी तय करने पर 10,07,732 रुपये का तेल जल जाता। नतीजतन, सुंदरनगर डिपो को भी 7,97,695 रुपये का भारी मुनाफा हासिल हुआ। दोनों इकाइयों के आंकड़ों को मिला दिया जाए तो निगम ने इस छोटी सी अवधि में कुल 19,31,955 रुपये की ऐतिहासिक बचत की है।

चार्जिंग नेटवर्क का विस्तार और हरित परिवहन का लक्ष्य

इलेक्ट्रिक बेड़े के निर्बाध संचालन के लिए आधारभूत ढांचे को भी तेजी से तैयार किया जा रहा है। मंडी बस स्टैंड, मंडी वर्कशॉप तथा सुंदरनगर बस स्टैंड पर चार्जिंग स्टेशन स्थापित किए जा चुके हैं, जहां निर्धारित शेड्यूल के अनुसार गाड़ियों को चार्ज किया जाता है। इसके अतिरिक्त जंजैहली में भी एक नया चार्जिंग स्टेशन स्थापित करने की योजना प्रस्तावित है, जिसके पूरा होने पर पहाड़ी और ऊंचाई वाले इलाकों में भी ई-बसों का विस्तार आसान हो जाएगा। जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करके कार्बन उत्सर्जन घटाने का यह मॉडल हिमाचल प्रदेश को एक स्वच्छ और हरित राज्य बनाने के व्यापक संकल्प का अभिन्न हिस्सा बन चुका है।

सवाल-जवाब

मंडी जिले में कुल कितनी इलेक्ट्रिक बसें शामिल की गई हैं?
मंडी जिले के लिए 25 नई इलेक्ट्रिक बसें बेड़े में शामिल की गई हैं, जिन्हें मुख्यमंत्री ने 17 अगस्त को हरी झंडी दिखाई थी।
24 दिनों के संचालन में परिवहन निगम को कुल कितनी बचत हुई?
17 अगस्त 2026 से 10 सितम्बर 2026 तक के 24 दिनों में मंडी और सुंदरनगर डिपो को मिलाकर कुल 19,31,955 रुपये की बचत हुई है।
डीजल के मुकाबले इलेक्ट्रिक बस से प्रति किलोमीटर कितनी बचत हो रही है?
पारंपरिक डीजल बसों की तुलना में इलेक्ट्रिक बसों से ऊर्जा लागत में लगभग 12 से 13 रुपये प्रति किलोमीटर तक की बचत दर्ज की गई है।
मंडी और सुंदरनगर डिपो में अलग-अलग कितना मुनाफा दर्ज हुआ?
मंडी डिपो में 15 बसों ने 11,34,260 रुपये तथा सुंदरनगर डिपो में 10 बसों ने 7,97,695 रुपये की शुद्ध वित्तीय बचत हासिल की।
वर्तमान में चार्जिंग स्टेशन कहां-कहां स्थापित किए गए हैं और अगला कहां प्रस्तावित है?
मंडी बस स्टैंड, मंडी वर्कशॉप और सुंदरनगर बस स्टैंड में चार्जिंग स्टेशन काम कर रहे हैं, जबकि अगला स्टेशन जंजैहली में प्रस्तावित है।
ये इलेक्ट्रिक बसें किन प्रमुख लंबी दूरी के मार्गों पर चलाई जा रही हैं?
ये बसें मंडी से शिमला, मंडी से पालमपुर, मंडी से चंडीगढ़ और मंडी-शिमला-तुलाह जैसे प्रमुख लंबी दूरी के मार्गों पर संचालित हो रही हैं।
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टिप्पणियाँ 5

Sophie Laurent@sophie-laurent·46 दिन पहले

सार्वजनिक परिवहन का यह विद्युतीकरण भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में वित्तीय घाटे को कम करने का एक बेहतरीन मॉडल प्रस्तुत करता है। प्रति किलोमीटर 12 से 13 रुपये की बचत यह दर्शाती है कि हरित नीतियां दीर्घकालिक रूप से आर्थिक आत्मनिर्भरता का मजबूत आधार बन सकती हैं। यदि हिमाचल प्रदेश सरकार इस गति को बनाए रखती है, तो यह बदलाव परिवहन क्षेत्र के बजट संतुलन और कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर साबित होगा।

Ravikash Gupta@ravikash·46 दिन पहले

सार्वजनिक परिवहन का यह मॉडल वित्तीय मोर्चे पर एक सकारात्मक बदलाव की शुरुआत है। प्रति किलोमीटर 12 से 13 रुपये की बचत यह साबित करती है कि ई-मोबिलिटी सिर्फ पर्यावरण के लिए ही नहीं, बल्कि भारी कर्ज से जूझ रहे राज्य निगमों के वित्तीय स्वास्थ्य को सुधारने के लिए भी एक व्यावहारिक और जरूरी आर्थिक कदम है। आने वाले पांच वर्षों में आत्मनिर्भरता का यह लक्ष्य अन्य पहाड़ी राज्यों के लिए भी एक बिजनेस केस स्टडी बन सकता है, बशर्ते चार्जिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर और मेंटेनेंस का खर्च नियंत्रण में रहे।

Arjun Mehta@arjun-mehta·46 दिन पहले

मंडी जिले में ई-बसों के संचालन से मिली यह शुरुआती राहत दर्शाती है कि पहाड़ी भू-भाग में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी कितनी प्रभावी हो सकती है। प्रति किलोमीटर 12 से 13 रुपये की बचत और पांच साल में आत्मनिर्भरता का यह रोडमैप राज्य के वित्तीय घाटे को कम करने में मील का पत्थर साबित हो सकता है। हालांकि, लंबे पहाड़ी रास्तों और दूरदराज के इलाकों में निरंतर सेवा बनाए रखने के लिए तकनीकी रखरखाव और मजबूत चार्जिंग व्यवस्था पर लगातार नजर रखनी होगी, ताकि यह वित्तीय लाभ दीर्घकालिक और टिकाऊ बन सके।

Rohan Verma@rohan-verma·46 दिन पहले

सार्वजनिक परिवहन में ई-बसों का यह सफल प्रयोग पहाड़ी राज्यों के लिए एक बड़ा मॉडल बन सकता है, जहाँ डीजल वाहनों का संचालन खर्च और प्रदूषण दोनों अधिक होते हैं। यदि यह मॉडल ग्रामीण और सुदूर इलाकों में बिना किसी तकनीकी बाधा के पूरे पाँच साल तक टिक जाता है, तो यह अन्य पर्वतीय राज्यों के लिए सार्वजनिक उपक्रमों को घाटे से उबारने का एक अचूक आर्थिक फार्मूला साबित होगा।

Karan Malhotra@karan-malhotra·46 दिन पहले

रहन-सहन और परिवहन खर्च में यह कमी केवल आर्थिक लाभ तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे सार्वजनिक संसाधनों के कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार पर भी लगाम कसती है। जब डीजल की खपत कम होती है, तो ईंधन चोरी और फर्जी बिलिंग जैसी प्रशासनिक अनियमितताओं की गुंजाइश स्वतः समाप्त हो जाती है। यदि इस बेड़े का रख-रखाव पारदर्शी तरीके से हो और स्पेयर पार्ट्स की खरीद में भ्रष्टाचार न हो, तो परिवहन निगम का यह घाटा मुनाफे में तब्दील होने से कोई नहीं रोक सकता।

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