दिल्ली के जंतर मंतर पर नीट परीक्षा धांधली को लेकर हुए प्रचंड प्रदर्शनों के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी संगठनात्मक शैली और युवाओं से जुड़ने के तौर तरीकों में ऐतिहासिक फेरबदल के संकेत दिए हैं। इसी कड़ी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत गुरुवार को मुंबई में आयोजित एक विशेष संवाद सत्र में हिस्सा ले रहे हैं। इस कार्यक्रम में देश की नई पीढ़ी यानी Gen-Z और Gen-Alpha के हजारों छात्र शामिल होंगे। आईआईएमयूएन के बैनर तले आयोजित इस संवाद कार्यक्रम के जरिए संघ प्रमुख युवा वर्ग के नजरिए को गहराई से समझने की कोशिश करेंगे। देश के राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषक इस पहल को भारतीय संघ व्यवस्था के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देख रहे हैं। हाल के दिनों में छात्र असंतोष के बाद पैदा हुई परिस्थितियों में संघ के इस कदम को भविष्य की सामाजिक और राजनीतिक दिशा तय करने वाला माना जा रहा है।
जंतर मंतर के आंदोलन और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे का पृष्ठभूमि प्रभाव
हाल ही में राजधानी दिल्ली के प्रसिद्ध जंतर मंतर पर नीट परीक्षा में हुई कथित अनियमितताओं के खिलाफ देश भर के छात्रों और युवाओं ने अभूतपूर्व विरोध प्रदर्शन किया था। इस पूरे घटनाक्रम के दौरान Gen-Z की राजनीतिक सक्रियता, मुखरता और तीखे तेवर प्रमुखता से उभरकर सामने आए थे। यह आंदोलन किस स्तर तक प्रभावी रहा, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि छात्र आक्रोश के बीच शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था। हालांकि मंत्री के इस्तीफे के साथ प्रदर्शन भले ही समाप्त हो गया हो, लेकिन इसने संघ के नीति निर्धारकों और वैचारिक चिंतकों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि युवाओं और व्यवस्था के बीच संवाद में कहां चूक हुई थी। इसी चूक की भरपाई करने और युवाओं की वास्तविक आकांक्षाओं को समझने के उद्देश्य से अब यह संवाद सत्र आयोजित किया जा रहा है, जिस पर पूरे देश की निगाहें टिकी हुई हैं।
केवल आज्ञाकारिता का दौर समाप्त, संवाद की नई संस्कृति पर संघ प्रमुख का जोर
जंतर मंतर पर उभरे छात्र असंतोष पर विचार व्यक्त करते हुए संघ प्रमुख मोहन भागवत ने स्पष्ट किया था कि आज की युवा पीढ़ी मार्ग से भटकी हुई नहीं है, बल्कि उसे सही मार्गदर्शन और पारदर्शी संवाद की जरूरत है। उन्होंने खुलकर स्वीकार किया था कि अब युवाओं पर केवल नियम थोपने या आज्ञाकारिता की उम्मीद करने का पुराना दौर समाप्त हो चुका है। संघ प्रमुख के अनुसार, नई पीढ़ी से प्रभावी तालमेल बनाने के लिए सीधे सवाल जवाब करने और तार्किक चर्चा की संस्कृति को अंगीकार करना अनिवार्य हो गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का आकलन है कि विरोध की इस नई लहर के बाद संघ नेतृत्व को यह भली भांति समझ आ गया है कि पारंपरिक नारों या स्थापित विचारधारा के भरोसे नई पीढ़ी को साथ नहीं लाया जा सकता। युवाओं को जोड़ने के लिए उनके जमीनी सरोकारों जैसे कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, पारदर्शी एवं निष्पक्ष परीक्षाएं, रोजगार के अवसर और डिजिटल जीवनशैली से जुड़ी चुनौतियों पर खुलकर चर्चा करनी होगी।
शताब्दी वर्ष में संघ का वैचारिक बदलाव और कार्यशैली का आधुनिकीकरण
संघ की विचारधारा से जुड़े सुदीप सिंह का मानना है कि यह बदलाव कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं है, बल्कि 100 वर्षों से समय के साथ ढलने की संघ की पुरानी परंपरा का एक हिस्सा है। उनके अनुसार, संघ एक परिवर्तनशील संगठन रहा है जो समय की मांग के अनुरूप अपनी कार्यप्रणाली में संशोधन करता आया है। मोहन भागवत का यह जोर कि युवाओं से तर्कसंगत संवाद किया जाए, संघ की आंतरिक कार्यशैली में बड़े बदलावों को रेखांकित करता है। संघ का ध्यान अब व्यक्तिगत स्वतंत्रता, लैंगिक समानता और समाज के हर वर्ग के सम्मान जैसे आधुनिक विषयों पर केंद्रित हो रहा है। इसी क्रम में राजनीतिक विश्लेषक संजीव पांडेय का कहना है कि Gen-Z में बढ़ती स्क्रीन एडिक्शन और सोशल मीडिया की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए संघ अपनी पारंपरिक शाखाओं से आगे बढ़कर डिजिटल प्लेटफॉर्म और संवाद मंचों के माध्यम से युवाओं तक पहुंच बना रहा है। संघ अपने शताब्दी वर्ष 2025-26 में प्रवेश कर रहा है, ऐसे में नई पीढ़ी को अपने साथ जोड़ना संगठन की सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक आवश्यकता बन गया है।
2029 के आम चुनाव और राष्ट्र निर्माण में युवाओं की निर्णायक भूमिका
वैचारिक चिंतकों का तर्क है कि जिस तरह 1925 में संगठन की स्थापना के समय देश और समाज की आवश्यकताएं अलग थीं, उसी तरह 2026 के आधुनिक भारत में युवाओं की सोच, अपेक्षाएं और प्रश्न पूरी तरह बदल चुके हैं। जंतर मंतर पर हुए छात्र प्रदर्शनों ने यह साबित कर दिया है कि यदि संवाद में अंतर रहेगा तो असंतोष फूटना स्वाभाविक है। संघ प्रमुख का सीधे Gen-Z से मिलना यह प्रदर्शित करता है कि संगठन युवाओं की आवाज को दबाने की बजाय उन्हें सुनने और सही दिशा देने के लिए खुद को तैयार कर रहा है। भारत विश्व का सबसे युवा देश है और आगामी 2029 के आम चुनावों तक Gen-Z और Gen-Alpha के युवा देश के सबसे बड़े और निर्णायक मतदाता समूह के रूप में उभरेंगे। छात्र आंदोलनों से सत्ताधारी व्यवस्था और उससे जुड़ी संरचनाओं को मिलने वाले झटकों के बीच, संघ की कोशिश इस जन असंतोष को सकारात्मक, वैचारिक और राष्ट्र-प्रथम की भावना से जोड़ने की है ताकि युवाओं की ऊर्जा का उपयोग देश के निर्माण में किया जा सके।



















