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नई दिल्ली शिखर सम्मेलन से बांग्लादेशी नेतृत्व की दूरी ने कूटनीतिक गलियारों में छेड़ी नई बहसदिल्ली
21 सित॰ 2026, 2:26 pm (39 दिन पहले)· 0

नई दिल्ली शिखर सम्मेलन से बांग्लादेशी नेतृत्व की दूरी ने कूटनीतिक गलियारों में छेड़ी नई बहस

नई दिल्ली में संपन्न 18वें ब्रिक्स सम्मेलन में बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की गैरमौजूदगी ने पड़ोसी मुल्क की विदेश नीति की प्राथमिकताओं और रणनीतिक प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर किसी देश की उपस्थिति केवल औपचारिकता भर नहीं होती, बल्कि यह आर्थिक साझेदारी और भूराजनीतिक प्रभाव को विस्तार देने का सशक्त माध्यम मानी जाती है। नई दिल्ली के भीतर 12 और 13 सितंबर को आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की गैरमौजूदगी ने इसी कूटनीतिक समझ पर गंभीर विमर्श छेड़ दिया है। जहां दुनिया की सबसे तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं के शीर्ष नेता एक मेज पर बैठकर वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा, तकनीक, टिकाऊ विकास और बहुपक्षीय वित्तीय ढांचे पर साझा रणनीति तय कर रहे थे, वहीं ढाका की ओर से इस महामंच से दूरी बनाने का फैसला विश्लेषकों को हैरान कर रहा है। सम्मेलन के समापन पर जारी संयुक्त घोषणापत्र में अंतरराष्ट्रीय नियमों और रणनीतिक सहयोग की बात दोहराई गई, मगर इस अहम मौके पर पड़ोसी मुल्क ने अपनी बात रखने का अवसर गंवा दिया।

निमंत्रण का प्रारूप और ढाका का औपचारिक रुख

इस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि उस समय तैयार हुई जब भारत ने बांग्लादेशी प्रधानमंत्री को इस वैश्विक सम्मेलन के आउटरीच सत्र में शिरकत करने का बुलावा भेजा था। ढाका की ओर से इस आमंत्रण को स्वीकार करने के बजाय तकनीकी आपत्तियां उठाई गईं। 10 सितंबर को बांग्लादेश के विदेश राज्य मंत्री हुमायुन कबीर ने मीडिया के सामने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि उनके प्रधानमंत्री इस बैठक में हिस्सा नहीं लेंगे। उन्होंने दलील दी कि भारत की ओर से भेजा गया बुलावा बांग्लादेश के प्रधानमंत्री की स्वतंत्र हैसियत के बजाय बिम्सटेक संगठन के मौजूदा अध्यक्ष के रूप में आया था।

हुमायुन कबीर ने अपने बयान में जोर देकर कहा,

“जब प्रधानमंत्री को बांग्लादेश के प्रधानमंत्री के तौर पर निमंत्रण नहीं मिला तो सरकार BRICS में कैसे जाए।”

ढाका की इस प्रतिक्रिया के पीछे यह सोच दर्शाई गई कि नई दिल्ली की पहली यात्रा एक पूर्ण द्विपक्षीय राजकीय यात्रा के रूप में होनी चाहिए, न कि किसी बहुपक्षीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की छाया में। हालांकि, भारत के विदेश मंत्रालय ने इस स्थिति पर तस्वीर पूरी तरह साफ कर दी। विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने संवाददाताओं को बताया कि बांग्लादेशी नेतृत्व को वास्तव में दो अलग-अलग आमंत्रण भेजे गए थे, जिनमें एक स्वतंत्र द्विपक्षीय दौरे के लिए था और दूसरा बिम्सटेक अध्यक्ष की हैसियत से ब्रिक्स आउटरीच बैठक में सम्मिलित होने के लिए तय किया गया था। भारत ने दोनों आयोजनों के राजनयिक प्रोटोकॉल को पूरी तरह अलग रखा था, जिसके बाद ढाका के फैसले को लेकर कूटनीतिक हलकों में कई तरह की शंकाएं उठने लगीं।

प्रोटोकॉल की उलझन बनाम राष्ट्रीय हित का नुकसान

विदेश नीति में परिपक्वता इस बात से आंकी जाती है कि कोई देश किसी आमंत्रण की भाषा या प्रारूप से परे जाकर अपने दीर्घकालिक हितों को कितनी कुशलता से साधता है। नई दिल्ली में आयोजित इस सम्मेलन में भारत के अलावा चीन, रूस, ब्राजील, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया जैसे भारी वजन रखने वाले देशों के प्रमुख नेता जुटे हुए थे। ऐसे विशाल जमावड़े में शामिल होना किसी खास गुट या गठबंधन का हिस्सा बनना नहीं कहलाता, बल्कि यह व्यापार संवर्धन, द्विपक्षीय निवेश के नए रास्ते खोजने और अपनी वित्तीय प्राथमिकताओं को वैश्विक स्तर पर मजबूती से पेश करने का मौका देता है।

कूटनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि दो पड़ोसियों के बीच कुछ जटिल और संवेदनशील मुद्दों पर मतभेद मौजूद भी हों, तो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आमने-सामने आना संवाद के बंद पड़े रास्तों को खोलने का काम करता है। बहुपक्षीय आयोजनों को सिर्फ द्विपक्षीय तनाव के चश्मे से देखना किसी भी देश के कूटनीतिक विकल्पों को सीमित कर सकता है। ऐसे आयोजनों में शिरकत करने का अर्थ किसी के प्रभाव में आना नहीं, बल्कि वैश्विक पटल पर अपने देश के लिए आर्थिक व रणनीतिक संभावनाओं के नए द्वार खोलना होता है।

न्यू डेवलपमेंट बैंक के साथ साझेदारी और नीतिगत विरोधाभास

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि बांग्लादेश ब्रिक्स तंत्र के आर्थिक ढांचे से पहले ही गहराई से जुड़ा हुआ है। ढाका सितंबर 2021 में ब्रिक्स देशों द्वारा स्थापित न्यू डेवलपमेंट बैंक (एनडीबी) का औपचारिक सदस्य बना था। इस बहुपक्षीय बैंक की स्थापना का मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों में बुनियादी ढांचे और पर्यावरण-अनुकूल टिकाऊ विकास परियोजनाओं को वित्तीय पोषण देना है।

मौजूदा समय में भी बांग्लादेश के भीतर एनडीबी की आर्थिक सहायता से कई महत्वपूर्ण ढांचागत परियोजनाएं आगे बढ़ रही हैं। बैंक की आधिकारिक परियोजना सूची दर्शाती है कि वर्ष 2026 में ही बांग्लादेश के रायपुरा सोलर पावर प्लांट प्रोजेक्ट और नेस्को पावर डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम स्ट्रेंथनिंग प्रोजेक्ट को मंजूरी दी जा चुकी है। एक तरफ जहां देश ब्रिक्स से जुड़े विकास बैंक के भारी-भरकम वित्तीय सहयोग से अपनी ऊर्जा और बिजली वितरण प्रणाली को आधुनिक बना रहा है, वहीं दूसरी ओर उसी ब्रिक्स के रणनीतिक सम्मेलन से सिर्फ निमंत्रण के प्रारूप के नाम पर दूरी बना रहा है। यह दोहरा दृष्टिकोण नीतिगत विरोधाभास को साफ उजागर करता है।

बिम्सटेक की अध्यक्षता को सशक्त बनाने का चूका मौका

ढाका प्रशासन ने अपने रुख के बचाव में सबसे बड़ा तर्क यह दिया कि उन्हें केवल बिम्सटेक के अध्यक्ष के तौर पर आमंत्रित किया गया था। कूटनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, यह पद अपने आप में एक बहुत बड़ी रणनीतिक ताकत साबित हो सकता था। बिम्सटेक बंगाल की खाड़ी क्षेत्र के सात देशों का साझा मंच है, जिसमें बांग्लादेश, भारत, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, थाईलैंड और म्यांमार शामिल हैं।

यदि प्रधानमंत्री तारिक रहमान इस सम्मेलन में मंच साझा करते, तो वे केवल अपने देश की आवाज नहीं उठाते, बल्कि बंगाल की खाड़ी के इस पूरे महत्वपूर्ण भूभाग की प्राथमिकताओं को दुनिया की दिग्गज शक्तियों के समक्ष रख सकते थे। समुद्री सहयोग, क्षेत्रीय व्यापार संवर्धन, आपदा प्रबंधन, क्रॉस-बॉर्डर कनेक्टिविटी, स्वच्छ ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन से मुकाबला करने जैसे अहम मुद्दों पर बिम्सटेक के दृष्टिकोण को वैश्विक स्वीकृति दिलाई जा सकती थी। इस मंच के जरिए बांग्लादेश खुद को क्षेत्रीय नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित कर सकता था, लेकिन सम्मेलन से किनारा कर लेने से यह रणनीतिक अवसर हाथ से निकल गया।

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सवाल-जवाब

18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन कब और कहां आयोजित हुआ था?
18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित किया गया था।
बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान ब्रिक्स सम्मेलन में क्यों शामिल नहीं हुए?
बांग्लादेश सरकार के अनुसार, उन्हें यह निमंत्रण देश के प्रधानमंत्री के बजाय बिम्सटेक अध्यक्ष की हैसियत से दिया गया था, इसलिए उन्होंने इसमें न जाने का फैसला किया।
भारत के विदेश मंत्रालय ने निमंत्रण को लेकर क्या स्पष्टीकरण दिया था?
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने स्पष्ट किया कि भारत ने दो अलग आमंत्रण भेजे थे, एक द्विपक्षीय यात्रा के लिए और दूसरा बिम्सटेक अध्यक्ष के रूप में ब्रिक्स सम्मेलन के लिए।
बांग्लादेश का न्यू डेवलपमेंट बैंक से क्या संबंध है?
बांग्लादेश सितंबर 2021 में न्यू डेवलपमेंट बैंक का सदस्य बना था और वहां बैंक की वित्तीय सहायता से रायपुरा सोलर पावर प्लांट और नेस्को पावर डिस्ट्रीब्यूशन जैसी परियोजनाएं स्वीकृत हैं।
बिम्सटेक संगठन में कौन-कौन से देश शामिल हैं?
बिम्सटेक में बंगाल की खाड़ी क्षेत्र के सात देश शामिल हैं: बांग्लादेश, भारत, भूटान, नेपाल, म्यांमार, श्रीलंका और थाईलैंड।
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टिप्पणियाँ 5

Amit Patel@amit-patel·38 दिन पहले

ब्रिक्स जैसे वैश्विक मंच पर व्यापार, निवेश और बहुपक्षीय वित्तीय ढांचे पर सीधे फैसले होते हैं। प्रोटोकॉल की औपचारिकताओं को राष्ट्रीय आर्थिक हितों से ऊपर रखना ढाका के लिए भारी पड़ सकता है। इस कूटनीतिक दूरी का असर दोनों देशों के बीच भविष्य के तकनीकी सहयोग, ऊर्जा सुरक्षा और द्विपक्षीय निवेश समझौतों पर पड़ना तय है, जिससे बांग्लादेश के स्टार्टअप और उभरते उद्योगों को वैश्विक मंच पर जगह बनाने में नुकसान उठाना पड़ सकता है。

Arjun Mehta@arjun-mehta·38 दिन पहले

यह घटना दिखाती है कि कूटनीति में प्रक्रियागत आपत्तियों को राष्ट्रीय हितों से ऊपर रखना कितना नुकसानदेह हो सकता है। जब वैश्विक शक्तियां नई दिल्ली में आर्थिक और रणनीतिक मुद्दों पर भविष्य की रूपरेखा तय कर रही थीं, तब ढाका द्वारा प्रोटोकॉल के तकनीकी अंतर को आधार बनाकर शिखर सम्मेलन से दूरी बनाना एक रणनीतिक चूक है। भविष्य में इस तरह का वैचारिक संकोच क्षेत्रीय कूटनीति में देश की सौदेबाजी की क्षमता को कमजोर कर सकता है, जिससे द्विपक्षीय संबंधों और क्षेत्रीय मंचों पर इसके प्रभाव पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।

Riya Menon@riya-menon·38 दिन पहले

अर्जुन जी के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, जिस तरह से कूटनीति में 'खाने-पीने' और आतिथ्य सत्कार के सांस्कृतिक आयोजनों के जरिए अनौपचारिक संबंध मजबूत किए जाते हैं, ढाका ने ब्रिक्स मंच से दूरी बनाकर उस संवाद की मेज को ही छोड़ दिया है। वैश्विक बैठकों के इतर होने वाले भोज और अनौपचारिक मेलजोल ही अक्सर बंद दरवाजों के समझौतों की नींव रखते हैं। यदि क्षेत्रीय नेतृत्व ऐसे बहुपक्षीय आयोजनों में भोजन और संस्कृति की कूटनीति के माध्यम से आपसी दूरियां मिटाने से चूकेगा, तो पाककला और आतिथ्य जैसे सॉफ्ट पावर माध्यमों का लाभ पड़ोसी देशों तक नहीं पहुंच पाएगा, जिससे आर्थिक सहयोग की थाली हमेशा अधूरी रह जाएगी।

Karan Malhotra@karan-malhotra·38 दिन पहले

यह घटनाक्रम केवल कूटनीतिक औपचारिकता का मुद्दा नहीं है, बल्कि इससे क्षेत्रीय सुरक्षा, सीमावर्ती अपराध नियंत्रण और द्विपक्षीय संधियों पर असर पड़ सकता है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ऐसे संवादहीनता के दौर का लाभ आपराधिक और अवांछित तत्व उठा सकते हैं, जिससे सार्वजनिक सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की चुनौतियों से निपटने में आपसी तालमेल कमजोर हो सकता है। भविष्य में ऐसे निर्णयों से दोनों देशों के बीच खुफिया और सुरक्षा तंत्र के सहयोग पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका है।

Rohan Verma@rohan-verma·38 दिन पहले

वरिष्ठ संवाददाता होने के नाते मेरा मानना है कि इस प्रकार के संवादहीनता से उत्तर प्रदेश से सटी अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर सुरक्षा प्रबंधों और सीमावर्ती अपराधों पर लगाम कसने के प्रयासों को तगड़ा झटका लग सकता है। भारत और पड़ोसी देश के बीच खुफिया तंत्रों के साझा समन्वय पर इसका असर पड़ना तय है, जिससे संवेदनशील इलाकों में अवैध गतिविधियों और सुरक्षा चुनौतियों से निपटने में आपसी तालमेल कमजोर हो सकता है।

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