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पितृपक्ष 2026 की शुरुआत 27 सितंबर से, 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या पर होगा समापनराजस्थान
20 सित॰ 2026, 7:06 pm (5 दिन पहले)· 0

पितृपक्ष 2026 की शुरुआत 27 सितंबर से, 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या पर होगा समापन

साल 2026 में पितृपक्ष का आरंभ 27 सितंबर को प्रतिपदा श्राद्ध से होगा और 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ यह संपन्न होगा।

हिंदू परंपरा में अपने पूर्वजों और पितरों के प्रति आदर, कृतज्ञता और श्रद्धा अर्पित करने की पखवाड़े भर की अवधि यानी पितृपक्ष साल 2026 में 27 सितंबर से विधिवत शुरू होने जा रही है। इस पखवाड़े को आमतौर पर श्राद्ध पक्ष के रूप में भी जाना जाता है। इस समयावधि के दौरान परिवार अपने दिवंगत बुजुर्गों और पितरों की मृत्यु तिथि के आधार पर तर्पण, पिंडदान तथा श्राद्ध कर्म संपन्न करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार विधि-विधान और पूरी निष्ठा से किए जाने वाले इन अनुष्ठानों से पूर्वजों की आत्मा तृप्त होती है और कुल को उनका मंगलमय आशीर्वाद प्राप्त होता है।

पंचांग के अनुसार तिथियों का क्रम और समय सारिणी

वैदिक पंचांग की गणनाओं को देखें तो वर्ष 2026 में 26 सितंबर को भाद्रपद पूर्णिमा का श्राद्ध संपन्न किया जाएगा। इसके ठीक अगले दिन यानी 27 सितंबर को आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि के साथ मुख्य पितृपक्ष का प्रारंभ होगा। इसके पश्चात द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी और पंचमी से लेकर चतुर्दशी तक विभिन्न निर्धारित तिथियों पर पूर्वजों के निमित्त पिंडदान व श्राद्ध संपन्न किए जाएंगे। इस पूरे पावन पखवाड़े का समापन 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के महासंयोग के साथ होगा।

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तिथि के चयन और श्राद्ध अनुष्ठान की विधि

सनातन धर्म की मान्यताओं के तहत परिवार के किसी भी सदस्य या पूर्वज का जिस तिथि को देहावसान हुआ हो, श्राद्ध पक्ष में उसी विशिष्ट तिथि पर उनका तर्पण किया जाता है। यदि किसी कारणवश परिवार को अपने पूर्वज के निधन की निश्चित तिथि स्मरण न हो, तो उनके लिए शास्त्रों में सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्राद्ध कर्म करने का विधान बताया गया है। इस दिन सभी ज्ञात और अज्ञात पितरों के निमित्त सामूहिक रूप से पूजा, तर्पण और पिंडदान संपन्न किया जा सकता है।

करौली के कर्मकांड विशेषज्ञ पं. श्याम बाबू भट्ट के अनुसार, पितृपक्ष में जलांजलि, तिल अर्पण और पिंडदान को सबसे प्रमुख अनुष्ठान माना गया है। शुद्ध जल में काले तिल मिलाकर तर्पण करने से पूर्वजों का स्मरण किया जाता है और उनके प्रति वंशजों की कृतज्ञता प्रकट होती है। यह अनुष्ठान इस बात का प्रतीक है कि व्यक्ति अपने कुल की जड़ों और पुरखों के योगदान को कभी नहीं भूलता।

दान-पुण्य, गौ सेवा और देव पूजा से पहले पितृ पूजन का महत्व

श्राद्ध पक्ष के दौरान ब्राह्मणों को आदरपूर्वक सात्विक भोजन कराने और अपनी क्षमता के अनुरूप वस्त्र, अनाज तथा अन्य आवश्यक सामग्रियों का दान करने की परंपरा चली आ रही है। इसके साथ ही असहाय और जरूरतमंद लोगों की सहायता करना, गौशालाओं में जाकर गौ सेवा करना और अन्न दान करना अत्यंत पुण्यकारी माना गया है। पं. श्याम बाबू भट्ट स्पष्ट करते हैं कि श्राद्ध पक्ष के दौरान किसी भी नियमित देव पूजा से पहले साधकों को अपने पितरों का स्मरण और पूजन करना चाहिए, क्योंकि जब पूर्वज प्रसन्न और तृप्त होते हैं तो देवता भी स्वतः ही प्रसन्न होकर शुभ फल प्रदान करते हैं। भारतीय संस्कृति में यह व्यवस्था बनाई गई है कि व्यक्ति जीवित रहते हुए अपने माता-पिता और वरिष्ठजनों का आदर-सत्कार करे और उनके इस संसार से चले जाने के बाद श्राद्ध कर्मों के जरिए उनके प्रति आदर भाव बनाए रखे।

सर्वपितृ अमावस्या का महत्व और कुल परंपरा का संदेश

आगामी 10 अक्टूबर को आने वाली सर्वपितृ अमावस्या इस पूरे पितृपक्ष का सबसे महत्वपूर्ण और अंतिम दिन रहेगी। यह अवसर उन सभी पूर्वजों के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है। धार्मिक दृष्टि से यह दिन परिवार की सभी पुरानी पीढ़ियों को एक साथ याद करने, उनके प्रति सम्मान व्यक्त करने और उनकी स्मृतियों को संजोने का एक गहरा सामाजिक और आध्यात्मिक माध्यम है। इसी भाव के साथ श्रद्धालु पूरे पखवाड़े अपनी सामर्थ्य अनुसार दान, सेवा और तर्पण के कार्यों में संलग्न रहते हैं।

सवाल-जवाब

वर्ष 2026 में पितृपक्ष कब से शुरू होकर कब समाप्त होगा?
साल 2026 में पितृपक्ष 27 सितंबर को प्रतिपदा श्राद्ध के साथ शुरू होगा और 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ समाप्त होगा।
भाद्रपद पूर्णिमा का श्राद्ध किस तारीख को किया जाएगा?
हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद पूर्णिमा का श्राद्ध 26 सितंबर 2026 को संपन्न होगा।
यदि किसी पूर्वज के निधन की तिथि मालूम न हो तो श्राद्ध कब करना चाहिए?
यदि पूर्वज की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है, तो उनका श्राद्ध 10 अक्टूबर 2026 को पड़ने वाली सर्वपितृ अमावस्या के दिन किया जा सकता है।
पितृपक्ष के दौरान कौन से मुख्य धार्मिक कर्म किए जाते हैं?
इस पखवाड़े में काले तिल और जल से तर्पण, पिंडदान, ब्राह्मण भोजन, गौ सेवा तथा जरूरतमंदों को वस्त्र व अन्न दान जैसे कार्य प्रमुखता से किए जाते हैं।
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टिप्पणियाँ 5

Ayesha Siddiqui@ayesha-siddiqui·4 दिन पहले

दक्षिण एशियाई समाज और सांस्कृतिक विरासत के नजरिए से, पितृपक्ष जैसी परंपराएं केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं हैं, बल्कि यह उपमहाद्वीप के साझा इतिहास और सामाजिक ताने-बाने को भी दर्शाती हैं। पाकिस्तान के सिंध जैसे क्षेत्रों में रहने वाले अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय भी इन सांस्कृतिक जड़ों से गहराई से जुड़े हैं। इस तरह के सांस्कृतिक रीति-रिवाज सीमाओं के पार साझा विरासत को याद दिलाते हैं। धार्मिक पर्यटन और सांस्कृतिक संरक्षण के दृष्टिकोण से इन ऐतिहासिक रीति-रिवाजों को सहेजना पूरे दक्षिण एशिया में आपसी समझ बढ़ाने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·4 दिन पहले

धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों का सामाजिक और प्रशासनिक महत्व भी होता है। पितृपक्ष के दौरान दान-पुण्य, असहायों की सहायता और गौ-सेवा जैसी परंपराएं सीधे तौर पर सामाजिक कल्याण और स्थानीय अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करती हैं। नीतिगत दृष्टिकोण से, ऐसे बड़े आयोजनों के समय स्थानीय प्रशासन और नागरिक निकायों को बुनियादी ढांचे तथा नागरिक सुविधाओं को सुव्यवस्थित करने के लिए पहले से तैयारी करनी चाहिए, ताकि श्रद्धालु बिना किसी बाधा के इन सामाजिक-धार्मिक कर्तव्यों का निर्वाह कर सकें।

Ravikash Gupta@ravikash·4 दिन पहले

अर्जुन की बात को आगे बढ़ाते हुए, आर्थिक दृष्टि से देखें तो पितृपक्ष केवल एक आध्यात्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि ग्रामीण और अर्ध-शहरी सूक्ष्म-अर्थव्यवस्था को गति देने वाला एक बड़ा कारक भी है। इस पखवाड़े के दौरान अनाज, तिल, वस्त्रों और गौ-सेवा से जुड़ी सामग्रियों की मांग में आने वाली तेजी स्थानीय खुदरा बाजार और कृषि-संबद्ध क्षेत्रों को सीधा प्रोत्साहन देती है। इस अवधि में होने वाला दान-पुण्य एक प्रकार के अनौपचारिक वित्तीय प्रवाह को जन्म देता है, जिससे शहरी क्षेत्रों से पूंजी का प्रवाह ग्रामीण पुरोहितों, गौशालाओं और स्थानीय कारीगरों की ओर होता है। यह सांस्कृतिक चक्र भारत की जमीनी स्तर की चक्रीय अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करता है।

Rohan Verma@rohan-verma·4 दिन पहले

उत्तर प्रदेश के सामाजिक और प्रशासनिक ढांचे के लिहाज से पितृपक्ष केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक बड़ा नागरिक प्रबंधन का अवसर है। वाराणसी, प्रयागराज और अयोध्या जैसे पावन स्थलों पर इस अवधि में लाखों श्रद्धालुओं का आगमन होता है। ऐसे में स्थानीय प्रशासन को सुरक्षा, घाटों की सफाई, और भीड़ नियंत्रण के लिए समय रहते पुख्ता तैयारी करनी होगी। यह आयोजन राज्य की स्थानीय धार्मिक अर्थव्यवस्था और पर्यटन को भी बड़ी गति देता है, जिस पर बुनियादी ढांचे के स्तर पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·4 दिन पहले

रोहन की बात को आगे बढ़ाते हुए, सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के लिहाज से इतने बड़े जमावड़े में भीड़ नियंत्रण और सार्वजनिक सुरक्षा सबसे बड़ी चुनौती है। प्रयागराज और वाराणसी के घाटों पर श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए जल पुलिस की तैनाती और गहरे पानी में बैरिकेडिंग बेहद जरूरी है। ऐसे आयोजनों में जेबकतरी और ठगी जैसे अपराधों को रोकने के लिए सादे कपड़ों में पुलिस बल की तैनाती और सीसीटीवी से सख्त निगरानी आवश्यक है। भगदड़ जैसी अनहोनी से बचने के लिए सुगम मार्ग और त्वरित चिकित्सा सहायता की उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए।

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