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राजस्थान की झुग्गी-झोपड़ी से निकला पारंपरिक ममीरा सुरमा, सोशल मीडिया के दम पर बना सुशीला सपेरा का ग्लोबल ब्रांडराजस्थान
15 सित॰ 2026, 6:56 pm (10 दिन पहले)· 2

राजस्थान की झुग्गी-झोपड़ी से निकला पारंपरिक ममीरा सुरमा, सोशल मीडिया के दम पर बना सुशीला सपेरा का ग्लोबल ब्रांड

सीकर की रहने वाली सुशीला सपेरा अपने दादाजी से सीखी पारंपरिक आयुर्वेदिक विधि से 'ममीरा' सुरमा तैयार करती हैं, जिसकी मांग अब सोशल मीडिया के दम पर देश-विदेश तक फैल चुकी है।

किसी व्यक्ति का हुनर उसकी असली ताकत होता है, जो उसे कठिन से कठिन परिस्थितियों से बाहर निकालकर एक नई पहचान दिला सकता है। राजस्थान के सीकर जिले की रहने वाली सुशीला सपेरा ने इस बात को पूरी तरह सच साबित कर दिखाया है। एक समय था जब वह झुग्गी-झोपड़ी में रहकर बेहद साधारण जीवन व्यतीत कर रही थीं, लेकिन आज उनके हाथों से तैयार होने वाले पारंपरिक सुरमे की गूंज विदेशों तक सुनाई दे रही है। सुशीला ने अपनी मेहनत और कला के बल पर न केवल अपनी जिंदगी बदली है, बल्कि अपने सपेरा समाज का नाम भी ऊंचा किया है। खाटूश्याम जी से रींगस रोड की तरफ जाने वाले मार्ग पर, जांगिड़ सेवा सदन के ठीक सामने उनका यह सफल उद्यम संचालित होता है, जहां वह आयुर्वेदिक पद्धति से 'ममीरा' नाम का विशेष पारंपरिक सुरमा तैयार करती हैं।

विरासत में मिली पारंपरिक कला और कारोबार की शुरुआत

सुशीला सपेरा मूल रूप से चौमूं पुरोहितान की रहने वाली हैं। उन्होंने सुरमा बनाने की इस खास और दुर्लभ कला को कहीं बाहर से नहीं सीखा, बल्कि यह उनके परिवार की पीढ़ियों पुरानी थाती है। सुशीला बताती हैं कि उन्होंने सुरमा बनाने की पूरी आयुर्वेदिक विधि अपने दादाजी शौकीन नाथ से सीखी थी। उनके परिवार में यह ज्ञान एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को मिलता आया था। सुशीला ने इस पारिवारिक हुनर को महज एक शौक तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे अपनी आजीविका और रोजगार का मुख्य जरिया बनाने का फैसला किया। आज उनके द्वारा तैयार किए जाने वाले आयुर्वेदिक सुरमा ममीरा की मांग बाजार में लगातार तेजी से बढ़ती जा रही है। राजस्थान के स्थानीय इलाकों से शुरू हुआ यह सफर अब देश के अलग-अलग राज्यों तक फैल चुका है, जहां लोग इस पारंपरिक सुरमे को काफी पसंद कर रहे हैं।

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सोशल मीडिया की ताकत से वैश्विक स्तर पर मिली पहचान

सुशीला के इस पारंपरिक व्यवसाय को आसमान की बुलंदियों तक पहुंचाने में आधुनिक तकनीक और सोशल मीडिया ने बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आज के डिजिटल युग का सही इस्तेमाल करते हुए उन्होंने अपने उत्पादों को ऑनलाइन मंच पर पेश किया। वर्तमान में सोशल मीडिया पर सुशीला के लगभग 16 लाख फॉलोअर्स हैं। इस विशाल इंटरनेट कम्युनिटी के जरिए देश-विदेश के लोग उनके काम को देखते हैं, उनकी पारंपरिक सुरमा बनाने की विधि से परिचित होते हैं और ऑनलाइन ऑर्डर भी देते हैं। यही वजह है कि सीकर की एक झुग्गी से शुरू हुआ यह सुरमा अब केवल भारत के राज्यों तक ही सीमित नहीं रह गया है। सुशीला के अनुसार, अब उनके पास ऑस्ट्रेलिया, कैलिफोर्निया, दुबई और कनाडा जैसे विकसित देशों से भी ममीरा सुरमा के भारी ऑर्डर आ रहे हैं।

आँखों की सेहत और रोशनी को लेकर बड़े दावे

सुशीला सपेरा द्वारा बनाया जाने वाला 'ममीरा सुरमा' अपनी खास जड़ी-बूटियों और निर्माण की शुद्ध पारंपरिक विधि के लिए जाना जाता है। उनका दावा है कि यह सुरमा आंखों की कई तरह की समस्याओं को दूर करने में अत्यधिक असरदार और उपयोगी है। इसे नियमित रूप से लगाने से आंखों से लगातार पानी आने की शिकायत, आंखों में जाला पड़ने की समस्या, कम रोशनी और नाखूना जैसी बीमारियों में लोगों को बहुत आराम मिला है। इसके अलावा, कई ग्राहकों ने यह भी अनुभव साझा किया है कि इसके लगातार इस्तेमाल से उनकी आंखों की कमजोरी दूर हुई है और उन्हें चश्मा लगाने की जरूरत भी काफी हद तक कम हो गई है। इसी भरोसे और गुणवत्ता के कारण आज हर रोज बड़ी संख्या में लोग सुशीला के केंद्र पर आते हैं और खुद अपने लिए यह सुरमा खरीदकर ले जाते हैं।

महिला सशक्तिकरण और दूसरों के लिए रोजगार की राह

सुशीला की यह सफलता केवल एक उत्पाद बेचने या व्यक्तिगत मुनाफा कमाने तक ही सीमित नहीं है। उन्होंने अपने इस छोटे से घरेलू हुनर को एक व्यवस्थित बिजनेस मॉडल में बदल दिया है, जिससे आज कई अन्य लोगों को भी काम मिल रहा है। सुशीला का मानना है कि हालात चाहे जितने भी विपरीत हों, अगर इंसान अपने हुनर पर पूरा भरोसा रखे और बिना थके लगातार मेहनत करता रहे, तो सफलता और पहचान एक दिन खुद-ब-खुद आपके कदम चूमती है। एक झुग्गी-झोपड़ी के आशियाने से शुरू हुआ उनका यह संघर्षपूर्ण सफर आज अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच चुका है। खास बात यह है कि इस व्यवसाय को चलाने में अब न केवल उनके परिवार के सदस्य बल्कि एक पूरी टीम उनके साथ मिलकर काम कर रही है, जिससे उनके समाज और आसपास के लोगों को आत्मनिर्भर बनने में मदद मिल रही है।

सवाल-जवाब

सुशीला सपेरा कौन हैं और वह कहां की रहने वाली हैं?
सुशीला सपेरा चौमूं पुरोहितान, सीकर (राजस्थान) की रहने वाली हैं, जो पारंपरिक आयुर्वेदिक सुरमा ममीरा बनाती हैं।
सुशीला ने सुरमा बनाने की आयुर्वेदिक विधि किससे सीखी थी?
सुशीला ने सुरमा बनाने की यह पारंपरिक आयुर्वेदिक विधि अपने दादाजी शौकीन नाथ से सीखी थी।
सुशीला का उद्यम सीकर में किस स्थान पर संचालित होता है?
उनका उद्यम सीकर में खाटूश्याम जी से रींगस रोड जाने वाले मार्ग पर जांगिड़ सेवा सदन के सामने स्थित है।
सुशीला के सुरमे ममीरा की मांग किन विदेशी देशों में है?
उनके बनाए ममीरा सुरमे की मांग ऑस्ट्रेलिया, कैलिफोर्निया, दुबई और कनाडा जैसे देशों से आ रही है।
सोशल मीडिया पर सुशीला के कितने फॉलोअर्स हैं?
सोशल मीडिया पर सुशीला के लगभग 16 लाख फॉलोअर्स हैं, जो उनके बिजनेस को बढ़ाने में मदद करते हैं।
सुशीला के सुरमे 'ममीरा' को लेकर क्या दावे किए गए हैं?
उनके अनुसार, यह सुरमा आंखों से पानी आना, जाला, नजर की कमजोरी और नाखूना जैसी बीमारियों में राहत देता है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Ravikash Gupta@ravikash·8 दिन पहले

यह मामला ग्रामीण भारत में 'क्रिएटर इकोनॉमी' और D2C मॉडल की उस क्षमता को रेखांकित करता है, जो पारंपरिक ज्ञान को सीधे वैश्विक बाजार से जोड़ रही है। सोशल मीडिया की मदद से बिचौलियों को हटाकर अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों तक पहुंच बनाना सूक्ष्म-उद्यमियों के लिए एक नया कारोबारी खाका पेश करता है। हालांकि, आयुष और वेलनेस श्रेणी के उत्पादों के लिए वैश्विक स्तर पर लंबे समय तक टिके रहने हेतु गुणवत्ता मानकीकरण और नियामक अनुपालन बेहद महत्वपूर्ण साबित होंगे।

Sneha Kulkarni@sneha-kulkarni·8 दिन पहले

रविकश की बात को आगे बढ़ाते हुए देखें तो यह सफलता प्रामाणिक विजुअल स्टोरीटेलिंग की ताकत को दर्शाती है। सुशीला सपेरा ने केवल उत्पाद नहीं बेचा, बल्कि अपनी पारंपरिक प्रक्रिया और पारिवारिक विरासत को सोशल मीडिया पर स्वाभाविक रूप से पेश किया। आज का डिजिटल मीडिया परिदृश्य ऐसे सांस्कृतिक नैरेटिव को तेजी से अपनाता है। यदि पारंपरिक कारीगरों को सही डिजिटल पैकेजिंग, बौद्धिक संपदा सुरक्षा और ब्रांडिंग का सहयोग मिले, तो लोक कला और हुनर को नए दौर के क्रिएटर इकोसिस्टम में एक टिकाऊ व्यावसायिक पहचान मिल सकती है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·9 दिन पहले

सुशीला सपेरा की यह सफलता दर्शाती है कि कैसे जमीनी स्तर पर डिजिटल समावेशन और सरकारी योजनाओं का सही उपयोग पारंपरिक कारीगरों की तकदीर बदल सकता है। जब ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सोशल मीडिया का ऐसा अनूठा संगम होता है, तब वोकल फॉर लोकल जैसे विजन को वास्तविक धरातल पर गति मिलती है। यह मॉडल देश के अन्य पारंपरिक हुनरमंदों के लिए भी एक नजीर है जो वैश्वीकरण के इस दौर में अपनी आजीविका को सशक्त कर रहे हैं।

Karan Malhotra@karan-malhotra·9 दिन पहले

यह सफलता दर्शाती है कि सोशल मीडिया ने कैसे पारंपरिक ग्रामीण हुनर को वैश्विक बाजार से जोड़ दिया है। हालाँकि, इस सफलता के साथ विधिक और नियामक चुनौतियाँ भी आ सकती हैं। जब कोई उत्पाद बिना किसी प्रमाणित लैब्स के आयुर्वेदिक दावों के साथ ऑस्ट्रेलिया, कैलिफोर्निया, दुबई और कनाडा जैसे देशों में निर्यात होता है, तो अंतरराष्ट्रीय उपभोक्ता संरक्षण और स्वास्थ्य कानूनों का अनुपालन करना अनिवार्य हो जाता है। भविष्य में इस ब्रांड के स्थायित्व के लिए गुणवत्ता नियंत्रण और कानूनी मानकीकरण बेहद जरूरी होगा।

Rohan Verma@rohan-verma·9 दिन पहले

करण मल्होत्रा के इस विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, यह समझना आवश्यक है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और लोक कलाओं के संवर्धन के लिए डिजिटल माध्यम कितने प्रभावी साबित हो रहे हैं। जब पारंपरिक ज्ञान इंटरनेट के जरिए वैश्विक फलक पर पहुंचता है, तो यह केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि पूरे समुदाय के आर्थिक सशक्तिकरण का मार्ग प्रशस्त करता है। हालांकि, सुशीला सपेरा जैसे पारंपरिक कारीगरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बड़े पैमाने पर उत्पादन के दौरान अपनी इस दुर्लभ विधा की मौलिकता और गुणवत्ता को बरकरार रखने की होती है।

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