राजस्थान के शहरों में नगरीय निकाय चुनाव की प्रक्रिया पूरी होने के बाद अब प्रदेश का सियासी पारा गांवों की चौपालों पर चढ़ने जा रहा है। आगामी चार से पांच दिनों के भीतर ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायती राज चुनावों की आधिकारिक घोषणा होने की संभावना बन चुकी है। इस संभावित ऐलान को देखते हुए सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस दोनों ने ही पूरी ताकत झोंक दी है। शहरों में जीत दर्ज कर आत्मविश्वास से लबरेज सत्ता पक्ष अपनी उसी गति को गांवों तक खींचने की योजना पर काम कर रहा है, जबकि विपक्षी खेमा शहरी मैदान में हुए नुकसान की भरपाई अपने पारंपरिक ग्रामीण जनाधार के सहारे करने की कोशिश में जुटा है।
14403 पंचायतों और लाखों पदों पर जन प्रतिनिधियों का फैसला
आगामी पंचायत चुनाव का दायरा हाल ही में निपटे निकाय चुनावों की तुलना में कहीं अधिक व्यापक और बड़ा है। राज्य में हालिया परिसीमन की कवायद पूरी होने के बाद ग्राम पंचायतों और पंचायत समितियों की संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है। सूबे में कुल ग्राम पंचायतों की संख्या 14 हजार की सीमा को पार करते हुए अब 14403 पर पहुंच चुकी है। इसका सीधा मतलब यह है कि इस चुनावी मुकाबले में पूरे प्रदेश से 14403 ग्राम प्रधान यानी सरपंच सीधे तौर पर चुने जाएंगे। सिर्फ इतना ही नहीं, इन सभी ग्राम पंचायतों के तहत आने वाले 136000 वार्डों में वार्ड पंचों के चुनाव के लिए भी मतदान होगा।
मध्यम और शीर्ष स्तर की ग्रामीण संस्थाओं पर नजर डालें तो प्रदेश में कुल 457 पंचायत समितियां हैं, जहां प्रमुख पदों का चुनाव होना है। इन 457 पंचायत समितियों के भीतर कुल 8245 वार्ड सदस्य अपनी किस्मत आजमाएंगे। इसी तरह जिला स्तर पर 41 जिला परिषदों में जिला प्रमुख चुने जाने हैं, जिनके दायरे में कुल 1403 वार्ड सदस्यों का निर्वाचन किया जाना है। इस तरह विशाल भौगोलिक क्षेत्र में चुने जाने वाले कुल जनप्रतिनिधियों की संख्या बहुत बड़ी हो जाती है।
डबल इंजन के विकास मॉडल बनाम परिसीमन विवाद की जंग
निकाय चुनावों की अपेक्षा इन ग्रामीण चुनावों में मतदाताओं की तादाद भी कई करोड़ में दर्ज है, जिससे दोनों पक्षों के मुद्दे भी बिल्कुल अलग तरह से गढ़े जा रहे हैं। सत्तारूढ़ दल इन चुनावों में अपनी डबल इंजन सरकार के विकास मॉडल को केंद्र में रखकर मतदाताओं के बीच जाने की तैयारी कर चुका है। इसके विपरीत विपक्षी खेमा प्रशासनिक व्यवस्था की कथित खामियों और सबसे बढ़कर परिसीमन के मुद्दे को लेकर जनता के बीच उतरेगा। विपक्षी दल का स्पष्ट आरोप है कि परिसीमन की आड़ में पंचायतों और पंचायत समितियों के पुनर्गठन में भारी मनमानी बरती गई है।
बीते दिनों प्रदेश के कई ग्रामीण इलाकों में सीमाओं के फेरबदल को लेकर विरोध की आवाजें भी मुखर हुई थीं, जहां स्थानीय निवासियों ने नई सीमाओं के निर्धारण का तीखा विरोध दर्ज कराया था। विपक्षी दल इसी ग्रामीण असंतोष को संगठित कर चुनावी लाभ में बदलने की कोशिश में जुटा हुआ है।
कोर वोटर पर भरोसा और राजधानी में रणनीति का मंथन
विपक्षी दल का मुख्य वोट बैंक लंबे समय से ग्रामीण अंचलों में सक्रिय रहा है, इसलिए उसे भरोसा है कि परिसीमन को लेकर उपजी नाराजगी का असर सीधे तौर पर मतदान के रुझानों में दिखेगा। इसके साथ ही विपक्ष ने निकाय चुनावों में व्यापक स्तर पर धांधली किए जाने के आरोप भी लगाए हैं और उसके नेता लगातार विभिन्न मंचों पर इस मामले को उठा रहे हैं। इन कथित अनियमितताओं के आरोपों को लेकर भी जनता के बीच जाने का मानस तैयार किया गया है।
दूसरी ओर सत्ता पक्ष चुनावी तैयारियों के मामले में तेजी दिखाते हुए शुक्रवार यानी 25 सितंबर से अपनी चुनावी रणनीति को अंतिम रूप देने जा रहा है। इस अहम कवायद के केंद्र में पार्टी अध्यक्ष नितिन नवीन रहेंगे। नितिन नवीन गुरुवार की शाम राजधानी जयपुर पहुंच रहे हैं, जिसके बाद शुक्रवार को वे पार्टी के सांसदों, विधायकों और प्रमुख संगठन पदाधिकारियों के साथ एक अहम रणनीतिक बैठक की अध्यक्षता करेंगे। इस बैठक में पंचायत चुनावों की जमीनी रूपरेखा तय कर कार्यकर्ताओं और नेताओं को विजय के सूत्र समझाए जाएंगे।
























