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नीम गिलोय के पारंपरिक औषधीय फायदे, पाचन और इम्युनिटी के लिए ऐसे करें उपयोगउत्तराखंड
4 सित॰ 2026, 3:19 pm (20 मिनट पहले)· 2

नीम गिलोय के पारंपरिक औषधीय फायदे, पाचन और इम्युनिटी के लिए ऐसे करें उपयोग

आयुर्वेद में नीम गिलोय को एक बेहद गुणकारी औषधीय बेल माना गया है, जिसका उपयोग इम्युनिटी बढ़ाने और पाचन सुधारने के लिए किया जाता है। हालांकि, किसी भी गंभीर बीमारी में डॉक्टर की सलाह लेना बेहद जरूरी है।

आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में नीम गिलोय को एक असाधारण औषधीय बेल के रूप में मान्यता प्राप्त है, जिसे गुडूची और अमृता के नाम से भी पुकारा जाता है। आमतौर पर यह बेल विभिन्न पेड़ों के सहारे आगे बढ़ती है, लेकिन जब यह नीम के पेड़ पर फैलती है, तो इसका औषधीय महत्व पारंपरिक रूप से और अधिक बढ़ जाता है। इस पौधे की तनेनुमा डंडी का इस्तेमाल काढ़ा, रस और चूर्ण तैयार करने में प्रमुखता से किया जाता है। डॉक्टर ऐजल पटेल का कहना है कि यह वनस्पति शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने, पाचन क्रिया को दुरुस्त रखने और समग्र स्वास्थ्य के लिहाज से काफी फायदेमंद मानी जाती है। हालांकि, इसके किसी भी प्रकार के औषधीय प्रयोग से पहले पेशेवर चिकित्सकीय परामर्श लेना बेहद आवश्यक है।

जीवनशैली में बदलाव और रोग प्रतिरोधक क्षमता

भागदौड़ भरी और बदलती जीवनशैली के इस दौर में लोग अपनी इम्युनिटी को मजबूत बनाए रखने के लिए प्राकृतिक और आयुर्वेदिक औषधियों की तरफ रुख कर रहे हैं, जिनमें गिलोय का नाम सबसे ऊपर आता है। आयुर्वेद इसे शरीर की आंतरिक रक्षा प्रणाली को संबल देने वाली प्रमुख वनस्पति मानता है। विशेष तौर पर नीम के पेड़ पर पनपने वाली गिलोय से पारंपरिक तरीके से काढ़ा और रस बनाकर इसका सेवन किया जाता है। फिर भी, यह समझना जरूरी है कि गिलोय को किसी भी प्रकार की बीमारी का अचूक और निश्चित इलाज नहीं माना जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित है, गर्भावस्था के दौर से गुजर रहा है या नियमित रूप से अन्य दवाएं ले रहा है, तो गिलोय का सेवन शुरू करने से पहले किसी योग्य चिकित्सक से राय लेना अनिवार्य है।

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पाचन तंत्र को स्वस्थ रखने में भूमिका

प्राचीन काल से ही नीम गिलोय का उपयोग आयुर्वेद में विभिन्न स्वास्थ्य संबंधी विकारों को दूर करने के लिए किया जाता रहा है, और पेट से जुड़ी समस्याओं में इसे काफी उपयोगी माना गया है। इसकी डंडी को उबालकर या पीसकर तैयार किया जाने वाला काढ़ा और रस पाचन तंत्र को सुचारू रूप से चलाने में मददगार साबित हो सकता है। इसके बावजूद, किसी भी घरेलू नुस्खे या आयुर्वेदिक उपाय को किसी चिकित्सकीय उपचार का विकल्प नहीं समझा जाना चाहिए। पेट से जुड़ी कोई भी समस्या यदि लंबे समय तक बनी रहती है, तो तुरंत डॉक्टर से संपूर्ण जांच करवाना समझदारी है। इसके अलावा, गिलोय का सेवन हमेशा तय मात्रा में और विशेषज्ञ के मार्गदर्शन में ही किया जाना चाहिए ताकि किसी प्रकार की असुविधा न हो।

बुखार और संक्रमण के मामलों में सावधानी

पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों में गिलोय का उपयोग बुखार समेत कई अन्य शारीरिक कष्टों को दूर करने के लिए लंबे समय से होता आ रहा है। आम तौर पर लोग सामान्य बुखार के दौरान राहत पाने के लिए गिलोय का काढ़ा या रस पीना पसंद करते हैं। हालांकि, यह दावा करना पूरी तरह गलत होगा कि डेंगू, मलेरिया या अन्य किसी भी गंभीर संक्रमण का इलाज केवल गिलोय के जरिए संभव है। शरीर में अत्यधिक तेज बुखार, कमजोरी, बदन दर्द या अन्य गंभीर लक्षण प्रकट होने पर बिना देर किए चिकित्सकीय जांच करवाना बेहद जरूरी है। गिलोय को कभी भी मुख्य उपचार के विकल्प के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि इसे केवल एक पूरक उपाय के रूप में ही देखना चाहिए।

लीवर के स्वास्थ्य और सुरक्षा के पहलू

आयुर्वेद के जानकारों के अनुसार गिलोय कई प्रकार के औषधीय गुणों से भरपूर होती है और पारंपरिक चिकित्सा में इसका प्रयोग शरीर के तमाम अंगों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने के लिए किया जाता है। इसे लीवर के कामकाज के लिए भी बहुत गुणकारी बताया गया है, जिसके लिए इसकी डंडी से काढ़ा, रस या चूर्ण तैयार किया जाता है। हालांकि, लीवर से जुड़ी कोई भी बीमारी होने पर केवल गिलोय के भरोसे रहना या अन्य इलाज बंद करना बिल्कुल उचित नहीं है। लीवर की गंभीर समस्याओं के लिए डॉक्टर की देखरेख में पूरी जांच और सटीक चिकित्सकीय उपचार की आवश्यकता होती है, जिसमें लापरवाही भारी पड़ सकती है।

ब्लड शुगर नियंत्रण और मधुमेह के मरीजों के लिए निर्देश

पारंपरिक आयुर्वेदिक मान्यताओं में गिलोय को रक्त शर्करा यानी ब्लड शुगर के स्तर को नियंत्रित रखने में सहायक माना गया है, और इसी वजह से तमाम लोग इसका रस, काढ़ा या चूर्ण नियमित रूप से लेते हैं। हालांकि, मधुमेह से पीड़ित मरीजों को अपनी डॉक्टर द्वारा निर्धारित दवाइयां कभी बंद नहीं करनी चाहिए और सिर्फ गिलोय के भरोसे नहीं रहना चाहिए। रक्त शर्करा का स्तर अचानक बहुत कम या बहुत अधिक होना बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। इसलिए शुगर के मरीजों को सलाह दी जाती है कि वे गिलोय का सेवन शुरू करने से पहले अपने चिकित्सक से परामर्श लें और नियमित अंतराल पर अपने शुगर स्तर की जांच करवाते रहें।

नीम गिलोय की डंडी का पारंपरिक सेवन विभिन्न तरीकों से किया जाता है, जिसमें पानी में उबालकर काढ़ा बनाना सबसे आम घरेलू तरीका है, जबकि कुछ लोग बाजार में मिलने वाले रेडीमेड उत्पादों का भी उपयोग करते हैं। हालांकि, इसकी सही खुराक व्यक्ति की उम्र, उसकी शारीरिक स्थिति और चल रही अन्य दवाओं पर निर्भर करती है। इसलिए बिना पूरी जानकारी के अत्यधिक मात्रा में गिलोय का सेवन करना सेहत के लिए नुकसानदायक हो सकता है। इंटरनेट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर अक्सर गिलोय को कई गंभीर बीमारियों का रामबाण इलाज बताने वाले दावे प्रसारित होते रहते हैं, जिन पर आंख मूंदकर भरोसा करने से बचना चाहिए। किसी भी चिकित्सीय स्थिति या नियमित दवा के सेवन के दौरान डॉक्टर या योग्य आयुर्वेद विशेषज्ञ की सलाह लेकर ही इसका उपयोग करना सबसे सुरक्षित तरीका है।

सवाल-जवाब

नीम गिलोय को आयुर्वेद में किन अन्य नामों से जाना जाता है?
आयुर्वेद में नीम गिलोय को मुख्य रूप से गुडूची और अमृता के नामों से जाना जाता है।
नीम पर चढ़ी गिलोय को विशेष क्यों माना जाता है?
जब गिलोय नीम के पेड़ पर चढ़कर बढ़ती है, तो पारंपरिक रूप से इसे सामान्य गिलोय की तुलना में अधिक गुणकारी माना जाता है।
क्या गिलोय डेंगू या मलेरिया का पक्का इलाज है?
नहीं, डेंगू या मलेरिया जैसी गंभीर बीमारियों का इलाज केवल गिलोय से किया जा सकता है, ऐसा दावा पूरी तरह गलत है।
क्या मधुमेह के मरीज अपनी दवा छोड़कर गिलोय ले सकते हैं?
बिल्कुल नहीं, मधुमेह रोगियों को अपनी निर्धारित दवाएं बंद नहीं करनी चाहिए और गिलोय का सेवन डॉक्टर की सलाह से ही करना चाहिए।
गिलोय का सेवन किन रूपों में किया जाता है?
गिलोय की डंडी से पारंपरिक रूप से काढ़ा, ताजा रस या चूर्ण तैयार किया जाता है, और बाजार में इसके उत्पाद भी मिलते हैं।
गिलोय का उपयोग मुख्य रूप से किस स्वास्थ्य लाभ के लिए होता है?
गिलोय का उपयोग मुख्य रूप से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और पाचन तंत्र को बेहतर रखने में सहायक माना जाता है।
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टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·3 मिनट पहले

एक क्राइम और कानून-व्यवस्था के रिपोर्टर के रूप में, यह ध्यान रखना आवश्यक है कि स्वास्थ्य से जुड़े मामलों में बिना प्रमाणित वैज्ञानिक या चिकित्सकीय प्रमाण के किसी भी वनस्पति को अंतिम इलाज बताना कानूनी और जनस्वास्थ्य दोनों दृष्टियों से भ्रामक हो सकता है। यद्यपि यह लेख पारंपरिक आयुर्वेदिक उपयोगों की बात करता है, लेकिन यह जरूरी है कि उपभोक्ता भ्रामक विज्ञापनों या नीम गिलोय जैसे नुस्खों को गंभीर चिकित्सा उपचार का विकल्प न समझें, अन्यथा यह सार्वजनिक सुरक्षा और उपभोक्ता संरक्षण के नियमों के दायरे में आ सकता है।

Rohan Verma@rohan-verma·2 मिनट पहले

एक वरिष्ठ संवाददाता के रूप में मेरा मानना है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े विषयों पर रिपोर्टिंग करते समय केवल पारंपरिक दावों तक सीमित रहना पर्याप्त नहीं है। इस लेख में गिलोय के औषधीय गुणों का उल्लेख है, लेकिन यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि बिना डॉक्टर की देखरेख के इनका अंधाधुंध सेवन गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकता है। उपभोक्ता संरक्षण और जनहित के दृष्टिकोण से यह जरूरी है कि ऐसे लेख भ्रामक प्रचार से बचें और पाठकों को तथ्यात्मक एवं पेशेवर चिकित्सा सलाह लेने के लिए प्रेरित करें, ताकि किसी भी आपात स्थिति में अनहोनी से बचा जा सके।

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