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मिट्टी को बनाया ज्वेलरी, रांची की पुष्पा की कारीगरी अब बड़े शहरों की पसंदझारखंड
7 सित॰ 2026, 1:23 pm (1 घंटे पहले)· 2

मिट्टी को बनाया ज्वेलरी, रांची की पुष्पा की कारीगरी अब बड़े शहरों की पसंद

रांची की 20 साल की पुष्पा ने आर्थिक तंगी के बीच फाइन आर्ट्स की पढ़ाई की और मिट्टी से बने गहनों का अपना ब्रांड खड़ा किया, जिसकी मांग अब बड़े शहरों तक पहुंच गई है.

झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली 20 साल की पुष्पा ने मिट्टी जैसी मामूली चीज़ को अपनी कमाई का जरिया बना लिया है. आज उनकी बनाई ज्वेलरी और पेंटिंग्स की मांग सिर्फ रांची तक सीमित नहीं, बल्कि देश के बड़े शहरों तक पहुंच गई है.

घर की तंगी से शुरू हुआ फाइन आर्ट्स का सफर

पुष्पा के माता-पिता खेती करते हैं और घर की आर्थिक हालत मजबूत नहीं थी. यही वजह रही कि उन्हें कम उम्र में ही कुछ कमाने की जरूरत महसूस हुई, ताकि परिवार को सहारा मिल सके. इसी सोच के साथ उन्होंने फाइन आर्ट्स में दाखिला लिया और बारह महीने का यह कोर्स पूरा किया. इस दौरान उन्होंने पेंटिंग बनाना, मूर्तियां तैयार करना और गहने डिजाइन करना सीखा. कोर्स खत्म होते ही नौकरी की तलाश करने के बजाय उन्होंने अपने नाम से एक ब्रांड शुरू करने की ठानी.

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मिट्टी से बने गहनों को मिली अलग पहचान

पुष्पा अपने हाथों से मिट्टी के नेकलेस और इयररिंग्स तैयार करती हैं. इन गहनों को खास बनाने के लिए वे इन पर ऑर्गेनिक रंगों से पेंटिंग करती हैं. ये रंग किसी केमिकल से नहीं बल्कि फल और सब्जियों से बनाए जाते हैं, जिससे न सिर्फ उत्पाद टिकाऊ रहते हैं बल्कि उनका रंग भी आकर्षक बना रहता है.

सोहराई और वर्ली कला भी कलेक्शन में शामिल

पुष्पा के कलेक्शन में गहनों के अलावा सोहराई शैली और वर्ली अंदाज़ की पेंटिंग्स भी शामिल हैं. ये दोनों पारंपरिक कला रूप आदिवासी संस्कृति की झलक दिखाते हैं, जिन्हें पुष्पा अपने नजरिए से तैयार करती हैं.

सरकार से मिलते ऑर्डर, बड़े शहरों की महिलाओं की पहली पसंद

पुष्पा बताती हैं कि उन्हें सरकार की तरफ से भी ऑर्डर मिलते रहते हैं. इसके अलावा अमीर तबके की कई महिलाएं भी उनकी पेंटिंग, कलाकृति और ज्वेलरी को खासतौर पर पसंद करती हैं. कई ग्राहक अपनी पसंद के मुताबिक कस्टमाइज्ड प्रोडक्ट बनवाने की मांग भी करते हैं, जिसे पुष्पा पूरा करती हैं.

200 रुपये से 5000 रुपये के बीच है कीमत

अगर कीमत की बात करें तो पुष्पा के गहनों के दाम 200 रुपये से 1000 रुपये के बीच रहते हैं. वहीं पेंटिंग और अन्य क्राफ्ट आइटम के लिए ग्राहकों को 250 रुपये से 5000 रुपये तक चुकाने पड़ते हैं. इस तरह कम बजट में भी लोग उनकी कला के जरिए घर या खुद को सजा सकते हैं.

सवाल-जवाब

पुष्पा कहां की रहने वाली हैं और उनकी उम्र कितनी है?
वह झारखंड की राजधानी रांची से हैं और उनकी उम्र 20 साल है.
पुष्पा के माता-पिता क्या काम करते हैं?
उनके माता-पिता किसान हैं.
पुष्पा ने क्या पढ़ाई की है?
उन्होंने एक साल का फाइन आर्ट्स कोर्स पूरा किया, जिसमें पेंटिंग, मूर्ति बनाना और ज्वेलरी डिजाइन करना सिखाया जाता है.
पुष्पा किस तरह की ज्वेलरी बनाती हैं?
वह मिट्टी से नेकलेस और इयररिंग्स बनाती हैं, जिन्हें फल-सब्जियों से बने ऑर्गेनिक रंगों से पेंट किया जाता है.
उनके गहनों की कीमत कितनी है?
उनके गहनों की कीमत 200 रुपये से 1000 रुपये के बीच है.
पेंटिंग और क्राफ्ट की कीमत कितनी है?
पेंटिंग और अन्य क्राफ्ट आइटम की कीमत 250 रुपये से 5000 रुपये तक होती है.
पुष्पा को ऑर्डर कहां से मिलते हैं?
उन्हें सरकार की तरफ से भी ऑर्डर मिलते हैं और अमीर तबके की महिलाएं भी उनके प्रोडक्ट पसंद करती हैं.
क्या पुष्पा कस्टमाइज्ड प्रोडक्ट भी बनाती हैं?
हां, कई ग्राहक अपनी पसंद के मुताबिक कस्टमाइज्ड प्रोडक्ट बनवाने का अनुरोध करते हैं और पुष्पा उन्हें पूरा करती हैं.
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टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·54 मिनट पहले

पुष्पा की यह सफलता ग्रामीण और अर्ध-शहरी अर्थव्यवस्था में कौशल विकास के प्रभाव को स्पष्ट रूप से दर्शाती है। यदि पारंपरिक सोहराई और वर्ली कला को ग्रामीण स्वरोजगार अभियानों और डिजिटल मार्केटिंग से ठीक से जोड़ दिया जाए, तो यह मॉडल झारखंड और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के अन्य युवाओं के लिए भी आजीविका का एक मजबूत और आत्मनिर्भर माध्यम बन सकता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·54 मिनट पहले

रोहन वर्मा के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, इस तरह के स्व-रोजगार मॉडल का एक महत्वपूर्ण कानूनी और प्रशासनिक पहलू यह भी है कि पारंपरिक और जैविक उत्पादों को 'जीआई टैग' और औपचारिक बौद्धिक संपदा अधिकारों से जोड़ा जाए। जब स्थानीय कारीगरों के ऐसे उत्पाद बड़े महानगरों तक पहुँचते हैं, तो उनकी कलात्मक और सांस्कृतिक धरोहर के व्यावसायिक शोषण को रोकने के लिए उचित ट्रेडमार्क और महिला उद्यमियों के लिए उपलब्ध सरकारी योजनाओं का कानूनी संरक्षण बेहद जरूरी हो जाता है, जिससे वे आर्थिक रूप से पूरी तरह सुरक्षित रह सकें।

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