पारंपरिक खानपान में सब्जी के रूप में उपयोग होने वाली सहजन की फली और इसकी हरी पत्तियां केवल स्वाद तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह पोषण और स्वास्थ्य की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। आमतौर पर मुनगा के नाम से पहचानी जाने वाली यह वनस्पति भारतीय चिकित्सा पद्धति में अपने औषधीय गुणों के लिए जानी जाती है। बिलासपुर स्थित गवर्नमेंट आयुर्वेद डिस्पेंसरी जॉनी लाइन की आयुर्वेद मेडिकल ऑफिसर डॉ आस्था मिश्रा ने इसके विभिन्न चिकित्सीय पहलुओं और शारीरिक लाभों पर प्रकाश डाला है। उनके अनुसार, यह प्राकृतिक आहार जरूरी खनिजों और विटामिनों का एक समृद्ध स्रोत है, जो शरीर के आंतरिक संतुलन को मजबूत बनाए रखने में सहायक होता है।
सहजन में मौजूद जरूरी पोषक तत्व
सहजन के पौधे के विभिन्न भाग पोषक तत्वों से भरे होते हैं। इसमें प्रचुर मात्रा में विटामिन ए, विटामिन सी, आयरन, फोलेट, कैल्शियम और मैग्नीशियम मौजूद रहते हैं। पोषण विशेषज्ञों के मुताबिक, भोजन में ऐसे तत्वों की नियमित उपस्थिति शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने और बुनियादी शारीरिक क्रियाओं को सुचारू रखने के लिए बेहद आवश्यक होती है। सूक्ष्म पोषक तत्वों की प्रचुरता के चलते यह दैनिक आहार का एक प्रमुख और पौष्टिक अंग बन सकता है।
रक्त की कमी और हड्डियों के विकार में उपयोगिता
आयरन और फोलेट से भरपूर होने के कारण सहजन उन व्यक्तियों के लिए उपयोगी आहार सिद्ध हो सकता है जो शरीर में खून की कमी यानी एनीमिया की समस्या से जूझ रहे हैं। हालांकि, डॉ आस्था मिश्रा ने यह स्पष्ट किया है कि केवल मुनगा खाने से इस बीमारी का पूर्ण निदान संभव नहीं है, बल्कि गंभीर स्थिति में सही चिकित्सकीय परीक्षण और उचित इलाज कराना अनिवार्य होता है। इसके अतिरिक्त, इसमें हड्डियों को सुदृढ़ बनाने वाले कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे मिनरल्स भी मौजूद हैं। आयुर्वेद में अस्थि स्वास्थ्य से जुड़ी जटिलताओं और ऑस्टियोपोरोसिस जैसी परिस्थितियों में सहजन के प्रयोग का विशेष महत्व बताया गया है।
दर्द और सूजन घटाने में सहायक गुण
आयुर्वेदिक सिद्धांतों के अनुसार, सहजन को शूलहर और शोथहर गुणों वाला द्रव्य माना गया है। आयुर्वेद की शब्दावली में शूल का अर्थ दर्द तथा शोथ का आशय सूजन से होता है। जोड़ों में दर्द, मांसपेशियों की जकड़न अथवा शरीर के किसी हिस्से में सूजन आने पर आयुर्वेदिक परामर्श के तहत मुनगे का उपयोग किया जा सकता है। यह शरीर की विभिन्न पीड़ाओं को कम करने में एक प्राकृतिक सहयोगी के रूप में काम करता है।
पाचन क्रिया और दोषों के संतुलन पर प्रभाव
पाचन तंत्र को दुरुस्त रखने में भी सहजन का विशेष योगदान माना जाता है। डॉ आस्था मिश्रा के अनुसार, इसमें दीपन और पाचन के गुण पाए जाते हैं, जो जठराग्नि को प्रदीप्त कर भोजन के सही पाचन में सहायता करते हैं। जिन व्यक्तियों को अपच या पाचन संबंधी समस्याएं रहती हैं, वे इसे अपने भोजन में शामिल कर सकते हैं। इसके स्वाद और तासीर की बात करें तो मुनगे का रस कटु-तिक्त यानी कड़वा-तीखा और इसका वीर्य उष्ण यानी गर्म माना जाता है। यह शरीर में वात और कफ से जुड़ी विषमताओं को संतुलित करने में प्रभावी भूमिका निभाता है।
एंटीऑक्सीडेंट प्रभाव और शारीरिक सुरक्षा
सहजन में पाए जाने वाले एंटीऑक्सीडेंट्स इसे और अधिक गुणकारी बनाते हैं। डॉ मिश्रा ने उल्लेख किया कि ये एंटीऑक्सीडेंट तत्व शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस के कारण उत्पन्न होने वाले फ्री रेडिकल्स के नकारात्मक प्रभावों को घटाने का काम करते हैं। कोशिकाओं को स्वस्थ रखने और समय पूर्व होने वाले शारीरिक नुकसान से बचाव के लिए एंटीऑक्सीडेंट्स का नियमित सेवन जरूरी होता है, जिसमें मुनगा काफी मददगार साबित होता है।
कुपोषण के खिलाफ छत्तीसगढ़ का व्यापक अभियान
मुनगे के इन असाधारण पोषक गुणों को ध्यान में रखते हुए छत्तीसगढ़ सरकार ने राज्य से कुपोषण और एनीमिया के उन्मूलन के उद्देश्य से ‘हर घर मुनगा, घर-घर मुनगा’ अभियान शुरू किया है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत लोगों को मुनगा यानी सहजन के पौधे मुफ्त वितरित किए जा रहे हैं और बड़े पैमाने पर पौधारोपण किया जा रहा है। राज्य के 52,553 आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से लगभग 7.88 लाख परिवारों को इस जन-कल्याणकारी पहल से जोड़ने का लक्ष्य तय किया गया है।
इस अभियान का मुख्य जोर महिलाओं, किशोरियों और बच्चों के पोषण स्तर में सुधार करने पर है, जिसके लिए हर आंगनबाड़ी क्षेत्र में पौधे लगाए जा रहे हैं। इसी क्रम में रायपुर जिले में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के निर्देश पर मात्र एक ही दिन में 50000 मुनगा पौधे लगाने का बड़ा अभियान आयोजित किया गया। लगाए गए पौधों की सुरक्षा, उचित देखरेख और विकास पर नजर रखने के लिए एक विशेष डिजिटल डैशबोर्ड भी विकसित किया गया है।
























