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सुचिता साहू फरीदाबाद में फलों के छिलकों से बना रही हैं 13 अलग-अलग सफाई उत्पादहरियाणा
5 सित॰ 2026, 9:15 pm (16 दिन पहले)· 2

सुचिता साहू फरीदाबाद में फलों के छिलकों से बना रही हैं 13 अलग-अलग सफाई उत्पाद

फरीदाबाद की 54 साल की सुचिता साहू घर और जूस की दुकानों से मिलने वाले फलों के छिलकों से बायो एंजाइम बनाकर टॉयलेट क्लीनर से लेकर लॉन्ड्री वॉश तक 13 तरह के उत्पाद तैयार कर रही हैं, और अब तक एक हजार से ज्यादा लोगों को यह हुनर सिखा चुकी हैं.

फरीदाबाद के घरों में रोज निकलने वाले संतरे, नींबू, मौसमी, केले और आम के छिलके आमतौर पर बाकी कचरे के साथ सीधे कूड़ेदान में चले जाते हैं, लेकिन शहर की 54 साल की सुचिता साहू ने इन्हीं फेंके जाने वाले छिलकों को काम की चीज बनाने का तरीका खोज निकाला है. वे इन छिलकों से बायो एंजाइम तैयार करती हैं और फिर उसी तरल से घर की सफाई में इस्तेमाल होने वाले कई तरह के उत्पाद बनाती हैं. उनकी अपनी रसोई से शुरू हुई यह कोशिश अब सिर्फ उनके घर तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि कई और लोग भी उनसे यही हुनर सीखकर अपने लिए कमाई का जरिया बना चुके हैं.

छिलकों से कैसे तैयार होता है बायो एंजाइम

सुचिता बताती हैं कि यह छिलके सिर्फ उनके अपने घर से ही नहीं आते. आसपास की जूस की दुकानों से मिलने वाले छिलके भी इकट्ठा किए जाते हैं, क्योंकि वहां भी यह बड़ी मात्रा में फेंके जाते हैं. बायो एंजाइम बनाने के लिए सामान्य तौर पर 300 ग्राम छिलके, एक लीटर पानी और 100 ग्राम गुड़ का इस्तेमाल किया जाता है. जो लोग घर पर रोजमर्रा के बर्तनों से इसका अंदाजा लगाना चाहें, वे एक कटोरी गुड़, तीन कटोरी छिलके और 10 कटोरी पानी का अनुपात इस्तेमाल कर सकते हैं, जिससे जरूरत के हिसाब से मात्रा घटाई या बढ़ाई जा सकती है.

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इन तीनों चीजों को अच्छी तरह मिलाकर प्लास्टिक के जार में भर दिया जाता है और जार को कसकर बंद करके सीधी धूप से बचाते हुए छांव वाली जगह पर रखा जाता है. शुरुआती 20 से 25 दिनों के दौरान मिश्रण के अंदर गैस बनने लगती है, इसलिए हर दिन ढक्कन को थोड़ा ढीला करके अंदर बनी गैस बाहर निकालनी पड़ती है, वरना जार के फटने का खतरा बना रहता है. करीब 90 दिन बीत जाने के बाद जार में तैयार हो चुके तरल को छानकर अलग कर लिया जाता है, और यही तैयार तरल आगे इस्तेमाल के लिए तैयार बायो एंजाइम बन जाता है.

लाइब्रेरियन की नौकरी में मिली बायो एंजाइम की जानकारी

सुचिता का कहना है कि पर्यावरण से जुड़ा काम करने में उनकी दिलचस्पी बचपन से ही रही है. वे पहले भी घर में जैविक कचरे से खाद बनाया करती थीं, और आज भी रसोई से निकलने वाले छिलकों से खाद तैयार करती हैं. उन्होंने लाइब्रेरियन के तौर पर भी नौकरी की है, और इसी नौकरी के दौरान उन्हें पहली बार बायो एंजाइम के बारे में पता चला. इसके बाद उन्होंने बेंगलुरु की एक संस्था से ऑनलाइन प्रशिक्षण लेकर विधिवत तरीके से इसे बनाना सीखा.

12 से 13 तरह के प्रोडक्ट, कीमत 100 रुपये से शुरू

आज सुचिता इसी एक बायो एंजाइम से 12 से 13 तरह के अलग अलग सफाई उत्पाद तैयार कर रही हैं. इनमें टॉयलेट क्लीनर, सरफेस क्लीनर, ग्लास क्लीनर और लॉन्ड्री वॉश के साथ साथ चीटियों, छिपकलियों और कॉकरोच को घर से दूर रखने वाला सामान भी शामिल है. उन्होंने पालतू जानवरों के आसपास सुरक्षित तरीके से छिड़काव किए जाने वाला एक अलग लिक्विड भी तैयार किया है. इन सभी उत्पादों की कीमत 100 रुपये से शुरू होती है, जबकि लॉन्ड्री वॉश की एक लीटर बोतल अकेले 230 रुपये में मिलती है. फर्श, टॉयलेट, कांच और घर की दूसरी सतहों की सफाई के लिए बनाया गया यह सामान उन रासायनिक उत्पादों की जगह ले लेता है जिन पर ज्यादातर घर निर्भर रहते हैं, जिससे कचरे और रसायनों दोनों का इस्तेमाल एक साथ कम हो जाता है.

हजार से ज्यादा लोगों को सिखाया हुनर, बना रोजगार का जरिया

सुचिता अब तक हजारों किलो छिलकों का इस्तेमाल कर चुकी हैं और एक हजार से ज्यादा लोगों को अपने हाथों से बायो एंजाइम बनाने की यह पूरी प्रक्रिया सिखा चुकी हैं. उनका कहना है कि प्रशिक्षण लेने वाले कई लोग अब इसी काम से अपनी कमाई भी कर रहे हैं. सुचिता के मुताबिक, उन्होंने यह काम कभी पैसे कमाने की नीयत से शुरू नहीं किया था, बल्कि उनका मकसद घर से निकलने वाले कचरे का दोबारा इस्तेमाल करना और पर्यावरण को बचाना था. आज यही छोटी सी कोशिश चुपचाप दूसरे लोगों के लिए भी रोजगार का जरिया बन चुकी है. सुचिता कहती हैं कि नई शुरुआत के लिए उम्र कभी आड़े नहीं आती, अगर सीखने की सच्ची इच्छा हो तो इंसान किसी भी उम्र में अपने काम से अपनी नई पहचान बना सकता है.

सवाल-जवाब

सुचिता साहू कौन हैं?
सुचिता साहू फरीदाबाद की रहने वाली 54 साल की महिला हैं, जो फलों के छिलकों से बायो एंजाइम बनाकर घर की सफाई के उत्पाद तैयार करती हैं.
बायो एंजाइम बनाने के लिए क्या-क्या चाहिए?
300 ग्राम छिलके, एक लीटर पानी और 100 ग्राम गुड़ चाहिए, या घर पर एक कटोरी गुड़, तीन कटोरी छिलके और 10 कटोरी पानी के अनुपात में भी बनाया जा सकता है.
बायो एंजाइम बनने में कितना समय लगता है?
मिश्रण को तैयार होने में करीब 90 दिन लगते हैं, इस दौरान शुरुआती 20-25 दिनों में रोज जार का ढक्कन ढीला कर गैस निकालनी पड़ती है.
सुचिता कौन-कौन से उत्पाद बनाती हैं?
वे टॉयलेट क्लीनर, सरफेस क्लीनर, ग्लास क्लीनर, लॉन्ड्री वॉश और चीटियों, छिपकलियों व कॉकरोच को दूर रखने वाला सामान समेत 12 से 13 तरह के उत्पाद बनाती हैं.
इन उत्पादों की कीमत क्या है?
उत्पादों की कीमत 100 रुपये से शुरू होती है, जबकि लॉन्ड्री वॉश की एक लीटर बोतल 230 रुपये में मिलती है.
सुचिता ने यह हुनर कहां से सीखा?
लाइब्रेरियन की नौकरी के दौरान उन्हें बायो एंजाइम के बारे में पता चला, जिसके बाद उन्होंने बेंगलुरु की एक संस्था से ऑनलाइन प्रशिक्षण लिया.
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टिप्पणियाँ 4

Arjun Mehta@arjun-mehta·16 दिन पहले

सुचिता साहू की यह पहल मात्र एक कचरा प्रबंधन का उदाहरण नहीं है, बल्कि यह सर्कुलर इकोनॉमी और स्थानीय स्तर पर हरित शासन का एक सशक्त मॉडल प्रस्तुत करती है। जब नागरिक खुद इस तरह के पर्यावरणीय समाधानों को अपनाते हैं और आजीविका से जोड़ते हैं, तो यह सरकारी नीतियों और स्वच्छता अभियानों को ज़मीनी स्तर पर टिकाऊ बनाने का सबसे प्रभावी मार्ग बनता है। भविष्य में इस तरह के मॉडल सूक्ष्म उद्यमों के रूप में विकसित होकर महिला सशक्तिकरण और पर्यावरणीय स्थिरता दोनों के लिए नीतिगत प्रेरणा बन सकते हैं।

Ravikash Gupta@ravikash·16 दिन पहले

सहकर्मी अर्जुन मेहता के इस विश्लेषण को वित्तीय और बाजार दृष्टिकोण से आगे बढ़ाते हुए, यह पहल 'वेस्ट-टू-वेल्थ' और सस्टेनेबल कंज्यूमरिज्म का एक बेहतरीन सूक्ष्म आर्थिक उदाहरण है। वर्तमान में वैश्विक और भारतीय बाज़ार में पर्यावरण-अनुकूल और ऑर्गेनिक घरेलू उत्पादों की माँग तेज़ी से बढ़ रही है। ऐसे कम लागत वाले और उच्च मार्जिन वाले घरेलू स्टार्टअप्स यदि स्थानीय आपूर्ति श्रृंखला और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से जुड़ जाएं, तो यह महिलाओं के नेतृत्व वाले सूक्ष्म उद्यमों के लिए एक बड़े आर्थिक अवसर में बदल सकते हैं, जो सर्कुलर इकोनॉमी को वास्तविक वित्तीय गति देगा।

Karan Malhotra@karan-malhotra·16 दिन पहले

अपशिष्ट प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण के इस सराहनीय प्रयास का कानूनी और प्रशासनिक पहलू भी महत्वपूर्ण है। कचरे का इस तरह का वैज्ञानिक पुनर्चक्रण नगर निगमों पर बोझ कम करता है और सार्वजनिक स्वास्थ्य व स्वच्छता से जुड़े नियमों के पालन में मदद करता है। यदि ऐसे घरेलू और स्थानीय उद्यमों को सरकारी स्तर पर छोटे उद्योगों के रूप में मान्यता और प्रोत्साहन मिले, तो यह कचरा प्रबंधन कानूनों को प्रभावी बनाने के साथ-साथ महिला सशक्तिकरण और स्थानीय आजीविका का एक मजबूत कानूनी मॉडल बन सकता है.

Rohan Verma@rohan-verma·16 दिन पहले

सुचिता साहू का यह मॉडल दिखाता है कि कैसे नागरिक स्तर पर अपशिष्ट प्रबंधन शासन व्यवस्था की मदद कर सकता है। उत्तर प्रदेश जैसे घनी आबादी वाले राज्यों के शहरी स्थानीय निकायों के लिए भी यह एक बेहतरीन मिसाल है, जहां गीले कचरे और फलों के छिलकों का सुरक्षित निपटान एक बड़ी चुनौती है। यदि प्रशासन इन महिला उद्यमियों को कम ब्याज पर ऋण और स्थानीय बाजारों तक पहुंच प्रदान करे, तो यह ज़मीनी पहल स्वच्छता अभियानों को स्थायी रोजगार से जोड़ सकती है।

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